कामगार हाथों को मिले रोजगार की गारंटी...
   Date01-May-2022

parmar shakti
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
कि सी भी तरह की उत्पत्ति या उत्पादन बिना समय व श्रम के संभव नहीं है... समय, श्रम, धन और श्रमिक एक-दूसरे के पूरक भी हैं... इसमें से किसी भी अंग के कमजोर होने पर वांछित लक्ष्य की प्राप्ति कठिन ही नहीं, असंभव-सी है... क्योंकि जब किसी परिवार, समाज, संस्था, संगठन, राज्य या राष्ट्र की उपलब्ध श्रमशक्ति को पर्याप्त रूप से समय पर अपने योगदान का अवसर नहीं मिलेगा, तो उसके दुष्परिणाम ही सामने आएंगे... देशकाल व परिस्थिति के मान से श्रम से संबंधित कार्य-नीति बदलती है और उसका दायरा भी बदलता चला जाता है... कई बार समय-श्रम व धन का आपसी सामंजस्य नए नवाचार की नींव रखता है... इस नवाचार के कारण उत्पादन का लक्ष्य तो हासिल होता है, लेकिन उसके चलते कई बार श्रम की जो चुनौती है, वह व्यक्ति या पूरे समूह को किस तरह से प्रभावित करती है, यह भी हमें ध्यान आता है... जब हम दो वर्षों से कोरोना महामारी की विभीषिका से लड़ते हुए अपने समय-श्रम और धन के संतुलन को बैठाने में लगे रहे... यह अपने आप में एक बड़ा नवाचारी बदलाव माना जा सकता है कि कई बार महामारियां या आपदाएं विकट संकटों के साथ संभावनाएं व सुधारवादी बदलाव लेकर भी आती हैं... कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 में लाखों श्रमिकों ने घर से काम करके अपने उत्पाद व सेवाओं की आपूर्ति निर्बाध रखी... यह बदलते दौर की वह आधुनिक श्रमशैली है, जो व्यक्ति को शारीरिक रूप से तो आराम प्रदान करती है, लेकिन तकनीक व अन्य मशीनी कार्यों के कारण मानसिक श्रम कई गुना बढ़ा देती है...
आज देशभर में श्रमिक दिवस (मजदूर दिवस) पर श्रमिकों के अधिकारों, सुविधाओं और उनसे जुड़ी विकट चुनौतियों को लेकर मंचों से, सभागृहों से चिंतन-मनन की एक बड़ी ध्वनि प्रतिवर्ष की भांति उठेगी, लेकिन यह अपने साथ श्रमिकों की समस्याओं का समाधान करने में हर बार की तरह कितनी सफल होगी..? इसमें संदेह है... क्योंकि साधारण बोलचाल की भाषा में हम श्रम का अर्थ किसी कार्य को करने के लिए किए गए प्रयासों से लगाते हैं... अर्थशा में श्रम मनुष्य के उन सभी शारीरिक-मानसिक प्रयासों को परिभाषित या प्रतिध्वनित करता है, जो धनोत्पादन की दृष्टि से एक नई संभावनाओं को मूर्तरूप देते हैं... अर्थशा में तो वास्तविकता में मनुष्य के प्रयत्नों से किया गया कार्य ही श्रम की श्रेणी में आता है, पशु-मशीन या तकनीक द्वारा किए गए उत्पादन-निर्माण को श्रम की श्रेणी से वह बाहर रखता है... जिस तरह से मनुष्य का खेलना, मनोरंजन, संगीत सुनना, तैरना और घर का काम करना श्रम की श्रेणी में नहीं आता... क्योंकि ये कार्य धन उपार्जन का लक्ष्य निर्धारित नहीं करते... अर्थात श्रम की साधना और साध्य स्पष्ट होना चाहिए...
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने समय-श्रम व धन को लेकर वैचारिक वक्तव्य में कहा था कि - मेरी आपत्ति मशीन से नहीं, मशीन के प्रति सनक को लेकर है... इसी सनक का नाम श्रम से बचाने वाली मशीनें हैं... हम उस सीमा तक श्रम की बचत करते जाएंगे, जब तक कि हजारों लोग बेरोजगार होकर भूखों मरने के लिए सड़कों पर नहीं फेंक दिए जाते... विचार कीजिए... बापू का यह विचार दशकों बाद भी कितना प्रासंगिक है... मनमोहन सरकार 100 दिन की रोजगार की गारंटी देने वाला 'मनरेगा कानूनÓ लेकर आई थी... आज उसी कानून के चलते कम से कम ग्रामीण भारत में तो सारे श्रम मशीनों अर्थात जेसीबी, डम्पर, ट्रैक्टर, क्रेन के द्वारा ही हो रहे हैं... इन सारे कार्यों में लगने वाली मनुष्यों की श्रमशक्ति कितनी घट गई है..? यह विचारणीय तथ्य है... कुछ लोग इस पर तपाक से कह देते हैं कि निर्माण और उत्पादन की गति भी बढ़ी है... लेकिन जिन श्रमिकों को बिना श्रम के तकनीकी व मशीनी सहयोग से रोजगार नहीं अर्थ में से बंटवारा मिल रहा है..! क्या वे श्रम-धन के वास्तविक अधिकारी हैं..? ऐसा ही हो रहा है तभी तो मनरेगा का बजट 2020 की तुलना में आज 35 प्रतिशत तक घट चुका है...
आधुनिक दौर में श्रम की शक्ति एक विनियोग योग्य विधा के रूप में स्थापित हो रही है... अगर कहें कि श्रम को मानवीय पूंजी के रूप में मजबूती से देखा जा रहा है, लेकिन उसका तरीका बदल गया है... तो उससे जुड़ी चुनौतियों और भविष्य की गड़बडिय़ों का समाधान भी समय रहते करना होगा... कारखानों में निर्मित उत्पादों तथा मशीनों के क्रय से जो आय प्राप्त होती है, उसी प्रकार मनुष्य की शिक्षा, कार्य-कुशलता आदि बातों की प्राप्ति के लिए श्रम के व्यय करने से भी आय की प्राप्ति होती है... ये दोनों ही आय प्राप्ति की दृष्टि से पूंजी लगाने में समानता रखते हैं... लेकिन यहां पर जो ज्वंलत विषय है, वह यही है कि आज कारखानों, फैक्ट्रियों और उत्पादन स्थलों पर मनुष्य के शारीरिक श्रम के बजाय मशीनी श्रम का दायरा कितना भयावह बढ़ा है, उस मान से मनुष्य की श्रमशक्ति कितनी अद्यतन हुई है..? क्योंकि जब व्यक्ति श्रम से बचता रहेगा और उसकी जीविका उपार्जन की पूर्ति का जरिया सरकारों द्वारा चलाई जाने वाली लोकलुभावन और मुफ्तखोरी वाली योजनाएं बनने लगेगी, तो उसका सामाजिक दायरे में अनेक तरह की विकृतियों के रूप में भी दुष्परिणाम आएगा..! इसलिए श्रम की साधना में तकनीक व मशीन के जरिए जो व्यवधान पैदा किया जा रहा है, वह कुशल-योग्य कामगार हाथों के भविष्य के लिए बड़ा खतरा है..!
भारत में रोजगार व श्रम की प्रकृति बहुमुखी एवं बहुआयामी है... देश की आर्थिक व्यवस्था को गति देने में भारत के परंपरागत पर्व-उत्सव और तीज-त्योहार यहां तक कि राष्ट्रीय उत्सवों की बड़ी भूमिका है... इन उत्सवों के चलते कुछ श्रमिक तो वर्षभर रोजगार प्राप्त करते हैं, लेकिन श्रमिकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिसको साल में दो-चार महीने ही श्रम का अवसर मिलता है... लेकिन वे इसे ही वर्षभर की अपनी आजीविका के रूप में लेकर कार्य करते हैं और उसका उन्हें प्रतिसाद भी मिलता है... याद करें दीपावली के दीपक, रांगोली और होली के लिए रंग-पिचकारी बनाने वाले हाथों को..? फिर उन मजदूरों की भी बड़ी संख्या है, जो फसलों, फलों व अन्य तरह के उत्पादनों की दृष्टि से एक क्षेत्र से दूसरे और एक राज्य से दूसरे राज्य में विस्थापित होकर अपने वर्षभर की श्रम साधना से जीविकोपार्जन का लक्ष्य तय करते हैं... क्या इस तरह से कार्य करने वाले श्रमिकों को भी एक निश्चित अधिकार, सुविधा के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए..? क्योंकि इन कुशल हाथों को भी तकनीकि-मशीनी नजर खाए जा रही है..! 2017-18 में भारत की कुल श्रमशक्ति का आकार लगभग 471 मिलियन आंका गया था... जिसमें से संपूर्ण देश में ी-पुरुष 34.7, ग्रामीणों में 35.0 और शहर में 33.9 फीसदी है... यानी भारत में श्रमशक्ति में पुरुषों की बहुलता है... श्रमबल में लगभग 70 प्रतिशत पुरुष तथा शेष महिलाएं हैं... जो महिलाएं घरों में खाना बनाने, दूर से पानी लाने, ईंधन के लिए लकड़ी-कंडा बीनने के साथ दूध दुहाती, गोबर फेंकती हैं और खेतों में भी काम करती हैं, उन्हें इस कार्य का नकदी के रूप में श्रम-धन नहीं मिलता... कोई भुगतान नहीं होता... जबकि अर्थशा की दृष्टि से घर एवं खेत में संयुक्त रूप से काम करने वाली महिलाओं को श्रमिक मानकर उनके अधिकारों का संरक्षण होना चाहिए... कितना विडंबनापूर्ण है कि हम आएदिन पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनने का दावा करते हैं, लेकिन देश के एक बड़े कामगार वर्ग के कुशल-अकुशल हाथों को निश्चित रोजगार की गारंटी अर्थात श्रम का पूर्ण अवसर एवं पूर्ण भुगतान करने में हम आज भी विफल हैं...
समय-श्रम-धन और श्रमिक के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती तकनीक, मशीन द्वारा पैदा किए गए उस रिक्त स्थान की है, जो उन्हें तेजी से श्रम से दूर कर रहा है... बदले में समाज व सरकार उनके लिए उनकी श्रम-साधना के एवज में कोई नया सृजनशील श्रम क्षेत्र निर्मित करने में विफल है... यह कितनी बड़ी विडंबना है कि खेती-किसानी, दुग्ध पालन व अन्य व्यवसाय में काम करने वाली बड़ी श्रमशक्ति आज तकनीक व मशीन के दुष्चक्र में अपना श्रम क्षेत्र खो रही है... ऐसे कुशल हाथों को महज मुफ्त का कुछ राशन व कुछ नकदी देकर अकर्मण्य बनाने का सिलसिला लगातार जारी है... फिर दिल्ली से लेकर पंजाब तक जिस तरह से मुफ्तखोरी की योजनाएं लाई जा रही हैं, वह भी श्रमिकों को श्रम से दूर करने का कारण बन रही हैं... श्रम से दूर करके तकनीक व मशीन ने व्यक्ति को शारीरिक श्रम से तो मुक्त किया, लेकिन मानसिक श्रम बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है... फिर मुफ्तखोरी ने इसमें व्यसन संबंधित नई-नई विकृतियों को भी फैलाया है, क्या देश की श्रमशक्ति को बचाने का प्रयास आज से अभी से नहीं होना चाहिए..?