पारदर्शिता का योगी मंत्र...
   Date30-Apr-2022

vishesh lekh
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निर्देश दिया है कि प्रदेश के सभी मंत्री और अधिकारी अपनी और अपने परिजनों की चल-अचल संपत्ति का ब्योरा दें..,जिसे सरकारी पोर्टल पर सार्वजनिक किया जाए...साथ ही उन्होंने कहा कि मंत्री और अधिकारी अपने परिजनों को सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप न करने दें...उन्होंने सीख दी कि हमें अपने आचरण से आदर्श प्रस्तुत करना है...हालांकि यह कोई नई बात नहीं है...मंत्रियों और अधिकारियों को अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने का बाकायदा नियम है...इसके पहले भी सरकारें इस तरह की नसीहत अपने नेताओं और अधिकारियों को देती रही हैं...सरकारी पोर्टल पर इन लोगों की संपत्ति के ब्योरे डाले भी जाते रहे हैं..,मगर व्यवहार में इसके उलट ही नजर आता है...छिपी बात नहीं है कि हर नेता की चल-अचल संपत्ति में एक से दूसरे चुनाव तक पहुंचते-पहुंचते कई गुना बढ़ोतरी हो जाती है...इसके प्रमाण खुद उन्हीं के चुनावी हलफनामे में मौजूद हैं...यही हाल अधिकारियों का है..,मगर योगी आदित्यनाथ ने अगर इस प्रवृत्ति को समाप्त करने का विचार किया है..,तो यह केवल मंत्रियों, अफसरों के अपनी संपत्ति का स्वत: विवरण दर्ज कराने की सद्इच्छा से नहीं होगा...पिछले कार्यकाल में योगी सरकार के कई अफसरों पर भारी भ्रष्टाचार के आरोप लगे...कोरोनाकाल में दवाइयों और उपकरणों की खरीद में धांधली के आरोप लगे...अब भी कई विभागों के अफसर संदेह से परे नहीं हैं...ऐसे में मुख्यमंत्री ने इन आरोपों के निराकरण के मकसद से उनकी संपत्ति आदि के ब्योरे दर्ज करने का निर्देश दिया होगा..,मगर अधिकारियों और मंत्रियों के भ्रष्ट आचरण पर तब तक लगाम लगने का भरोसा पैदा नहीं होता..,जब तक कि उनसे आय से अधिक संपत्ति जमा करने को लेकर जवाब न मांगे जाएं...यह उम्मीद कर लेना कि नसीहतभर से वे अपने आचरण से आदर्श प्रस्तुत करने लगेंगे..,एक खामखयाली ही होगी...दरअसल, भ्रष्ट आचरण एक प्रकार की आदत है...यह आदत अचानक नहीं बदलती..,इसके लिए कड़ाई करनी पड़ती है...उत्तरप्रदेश में प्रशासनिक अधिकारियों का एक संघ है.., जो हर साल अपने तईं सर्वेक्षण कराता और सूची जारी करता है...जिसमें भ्रष्ट अधिकारियों के बाकायदा नाम दिए जाते हैं..,मगर विचित्र है कि कोई भी सरकार उन अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने का प्रयास करती नहीं दिखी... फिर यह भरोसा भी कैसे किया जा सकता है कि मंत्री और अफसर अपनी और अपने परिजनों की संपत्ति का जो ब्योरा पेश करेंगे.., वह बिल्कुल सही ही होगा... गलत तरीके से संपत्ति जुटाने वाले सबसे पहले उन्हें छिपाए रखने का उपाय तलाशते हैं...
दृष्टिकोण
टीके का सुरक्षा चक्र...
इसमें कोई संदेह नहीं कि सफल टीकाकरण अभियान से भारत ने कोरोना महामारी पर काफी हद तक काबू पाने में कामयाबी हासिल की...टीकाकरण की बदौलत ही बच्चों से लेकर बड़ों और वृद्धों तक को महामारी के खतरे से बचाया जा सका...हालांकि बच्चों के टीकाकरण का काम पिछले महीने ही शुरू हुआ है..,पर अब तक करोड़ों बच्चों को टीके लग चुके हैं...बच्चों के सफल टीकाकरण की बड़ी वजह यह भी है कि पिछले कुछ महीनों में कई टीके बाजार में आ गए हैं...अब भारत के औषधि महानियंत्रक (डीसीडीआई) ने बच्चों के लिए कुछ और टीकों को हरी झंडी दे दी है...भारत बायोटेक का बनाया कोवैक्सीन छह से बारह साल के बच्चों को लगाया जाएगा...इसके अलावा पांच से बारह साल के बच्चों के लिए कोर्बेवैक्स और बारह साल से अधिक के बच्चों को लिए जायकोव-डी को मंजूरी दी गई है...हालांकि ये सभी टीके आपात इस्तेमाल के लिए ही होंगे...वैसे अभी कई टीका निर्माता कंपनियां अलग-अलग आयुवर्ग के बच्चों के लिए टीकों के विकास में लगी हैं...ये टीके जितने जल्द आएंगे..,टीकाकरण की रफ्तार भी उतनी तेज होगी...गौरतलब है कि देश में टीकाकरण की शुरुआत पिछले साल जनवरी के मध्य में हुई थी...तब टीकों की भारी कमी थी और लक्ष्य था पूरी आबादी के टीकाकरण का..,तब टीके भी कुछ ही कंपनियां विकसित कर पाई थीं...इसलिए तब प्राथमिकता के आधार पर टीकाकरण शुरू किया गया था...सबसे पहले स्वास्थ्यकर्मियों और कोरोना योद्धाओं को टीके लगे...इसके बाद बुजुर्ग और पहले से गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीजों और फिर वयस्क आबादी की बारी आई...जब किशोरवय आबादी और बच्चों के टीके भी विकसित हो गए..,तो इन्हें भी टीकाकरण अभियान में शामिल कर लिया गया...बच्चों की चिंता ज्यादा इसलिए भी बनी रही..,क्योंकि महामारी की दूसरी और तीसरी लहर को लेकर विशेषज्ञ पहले से ही आगाह करते रहे थे कि बच्चों को संक्रमण का खतरा ज्यादा हो सकता है..,फिर लंबे समय के प्रतिबंध के बाद जब स्कूलों के खुलने की बात आई तो सबसे पहली जरूरत यही समझी गई कि किशोर आबादी का टीकाकरण हो...