कर्म का विधान
   Date30-Apr-2022

fg2
प्रेरणादीप
महर्षि माण्डव्य का गुरुकुल श्रेष्ठ शिक्षा-संस्कारों एवं अनुशासन को प्रदान करने के लिए विख्यात था। गुरुकुल के निवासियों पर कोई किसी तरह का शक नहीं करता था। इसी प्रामाणिकता का लाभ उठाकर एक बार कुछ डाकू उनके आश्रम में छिप गए। राजसैनिकों को इसका पता चला तो वे डाकुओं को पकडऩे आए और महर्षि को उन्हें छिपाने का दोषी मानकर साथ ले गए। राजा को महर्षि के विषय में ज्यादा परिचय न था। उसने जो सजा डाकुओं को सुनाई, वही सजा महर्षि को भी सुनाई। नगरवासियों को जब यह समाचार मिला तो उन्होंने राजा को वस्तुस्थिति से अवगत कराया। राजा को जब महर्षि का सत्य परिचय मिला तो उसे अत्यधिक ग्लानि हुई और उसने उनसे क्षमा मांगी। महर्षि बोले-'राजन्! इसमें आपकी कोई गलती नहीं है, मैंने पूर्वजन्मों में निरपराध पशु-पक्षियों को प्रताडि़त किया है और आज उसी पापकर्म के दंडस्वरूप मुझे सजा मिली, पर इस जन्म के पुण्यों ने मुझे सुरक्षित कर लिया। जीवन शुभ-अशुभ कर्मों का परिणाम है।Ó