एकांत का अर्थ एकांकी होना नहीं
   Date30-Apr-2022

dharmdhara
धर्मधारा
एकांत एक वरदान है, तो एक अभिशाप भी है। एकांत मन की प्रकृति के अनुरूप परिभाषित और परिलक्षित होता है। एक साधक एवं योगी के लिए एकांत के क्षण ध्यान एवं समाधि का सोपान है, एक भक्त के लिए भगवान से मिलन का मधुर अनुभव और एक वैज्ञानिक एवं चिंतक के लिए ये ही शोध एवं विचार के क्षण हैं, परंतु कुछ लोगों के लिए ये ही क्षण अकेलेपन के बोझ की तरह हो जाते हैं। एकांत हमें आनंदित भी करता है और डराता भी है। अकेले में कोई हर्षविभोर होकर कीर्तन करता है तो कोई इससे भागकर किसी अन्य साथी-सहचर की भीड़ तलाश करता है। आखिर ऐसा क्यों है? क्या इसका मनोविज्ञान है कि एकांकीपन का अनुभव अलग-अलग लोगों को अलग-अलग प्रतीत होता है? दरअसल हमारा मन ही है इसके केंद्र में। यदि मन स्वस्थ, सुदृढ़ एवं शांत होता है तो एकांकीपन हमारा सबसे बड़ा मित्र एवं शुभेच्छु बन जाता है, परंतु रूग्ण एवं दुर्बल मन के लिए अकेलापन किसी दु:स्वप्न के समान भीषण एवं डरावना लगता है। ऐसे में हम एकांकीपन से डरते-घबराते और भीड़ की ओर भागते हैं और भीड़ में सुकून प्राप्त करते हैं। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो एकांकीपन में हमारे अचेतन में दबी कड़वी यादें एकाएक उजागर हो जाती हैं-प्रकट हो जाती हैं, जिनको हम कभी याद नहीं करना चाहते और न ही उनका सामना करना चाहते हैं। जिन कड़वी एवं कटु यादों से हम बचना एवं भागना चाहते हैं, वे हमारे अचेतन में दबी-छिपी रहती हैं और एकांत मिलते ही अपने अस्तित्व का आभास करा देती हैं। अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार, दरअसल जिससे हम डर रहे हैं और जो हमें डरा रहा है, वह कोई और नहीं, बल्कि हमारे अतीत के नकारात्मक कर्मों का परिणाम अर्थात हमारा प्रारब्ध है। हम अकेले में किसी और से नहीं, बल्कि स्वयं से डरते हैं। इस डर से बचने के लिए हम अपने मित्र, साथी, सहपाठी की ओर दौड़ते हैं। समाज या परिवार की भीड़ में ये यादें दब जाती हैं, परंतु समाप्त नहीं होती हैं। मनोवैज्ञानिक इसी खालीपन के पक्ष की ओर संकेत करते हैं। इनके अनुसार हम अधिकतर गलतियां एवं अपराध इसी अवस्था में करते हैं। इस संदर्भ में उनका कहना है कि अकेलेपन में बुरी आदतें अपने पूरे वेग से हमें आक्रांत कर लेती हैं।