भारत की दृढ़ तटस्थता...
   Date29-Apr-2022

vishesh lekh
रूस-यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर भारत ने एक बार फिर दृढ़ता के साथ अपने तटस्थ रुख को उचित करार देकर पश्चिमी देशों के दबाव में नहीं आने का संदेश दे दिया है... दिल्ली में चल रहे रायसीना संवाद में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कहा कि भारत किसी खेमे का हिस्सा बनने के बजाय तत्काल जंग रोकने और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए शांति कायम करने का पक्षधर है और वह इसी नीति पर चलेगा... भारत का यह रुख उचित और तार्किक इसलिए भी है कि अगर रूस-यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर खेमेबाजी बढ़ती गई तो जंग खत्म होने के बजाय और बढ़ती ही जाएगी और हर पक्ष दूसरे को सबक सिखाने की रणनीति पर चलता रहेगा... वैश्विक राजनीतिक मसलों पर हर साल होने वाला रायसीना संवाद इस बार ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए भी हो गया है कि इसमें यूक्रेन का मुद्दा ही प्रमुखता से छाया हुआ है... यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के प्रतिनिधि भारत की तटस्थता की नीति को लेकर सवाल तो पहले से ही उठा रहे हैं... हाल के दिनों में एक के बाद विदेशी नेताओं के दिल्ली के दौरे यह बताने के लिए काफी हैं कि मौजूदा हालात में भारत की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो गई है... रायसीना संवाद में रूस-यूक्रेन युद्ध का मुद्दा जिस तरह से छाया हुआ है, उससे यह साफ हो गया है कि यूरोपीय संघ अपने हितों को लेकर ज्यादा परेशान है... शायद इसीलिए यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला लेयन ने यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर जो चिंता जताई है, उसमें उन्होंने भारत की सुरक्षा को लेकर संभावित खतरों को भी रेखांकित किया... यूरोपीय संघ भारत को यह बताना चाह रहा है कि यूक्रेन जैसे खतरे हिंद-प्रशांत में भी हैं और भविष्य में भारत को इनसे रूबरू होना पड़ सकता है... निश्चित ही उनका इशारा चीन की ओर है... हिंद और प्रशांत महासागर में चीन की सैन्य गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ी हैं, उससे अमेरिका सहित दुनिया के ज्यादातर देश परेशान हैं... हिंद महासागर में यह संकट भारत के लिए भी कम गंभीर नहीं है... चीन इन दोनों महासागरों में अपनी ताकत बढ़ाकर दुनिया के बड़े समुद्री मार्ग पर अपना दबदबा बनाने की रणनीति पर चल रहा है... दक्षिण चीन सागर में तो उसने समुद्री परिवहन के अपने नियम लागू कर दिए हैं... अमेरिका और यूरोपीय संघ इसे आने वाले वक्त के बड़े खतरे के रूप में देख रहे हैं... हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर यूरोपीय संघ की चिंता के जवाब में भारत ने जो मुद्दा उठाया और तार्किक जवाब दिया, उसके बाद तो पश्चिमी देशों को भारत के रुख के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाना चाहिए...
दृष्टिकोण
बिजली संकट का समाधान...
हर साल की तरह इस बार भी देश में बिजली का संकट गहराने लगा है... कई राज्य बिजली की भारी कमी से जूझ रहे हैं... रोजाना आठ-दस घंटे की बिजली कटौती हो रही है... सिर्फ घरों को ही नहीं, उद्योगों तक को बिजली नहीं मिल रही... बिजली के बिना किसान भी खेतों में काम नहीं कर पा रहे हैं... कोयले की भारी कमी की बात कहकर बिजलीघरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं... यानी अब आने वाले दिनों में बिजली की कटौती और पसीने निकालेगी... हालात बता रहे हैं कि यह संकट आसानी से खत्म नहीं होने वाला... जैसे ही गर्मी का मौसम शुरू होता है, बिजली की मांग बढऩे लगती है और बिजलीघर कोयले की कमी का रोना रोने लगते हैं... पर हैरानी की बात यह है कि इसका स्थायी समाधान निकालने की दिशा में कुछ होता दिखा नहीं है... सवाल तो इस बात का है कि जब सरकार को पता है कि पिछले कई सालों से यह समस्या बनी हुई है, तो फिर इससे निपटने के लिए अब तक ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए..? क्या बिजली संकट का मुद्दा प्राथमिकता में नहीं होना चाहिए..? जब अंधेरे में डूबने की नौबत आने लगती है, तभी हमारी आंखें क्यों खुलती हैं..? जिन राज्यों में बिजली संकट ज्यादा है, उनमें पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र प्रमुख हैं... गर्मी के मौसम में बिजली की मांग बढऩा कोई नई बात नहीं है... पिछले कुछ सालों के मुकाबले इस साल बिजली की मांग में भारी बढ़ोतरी की बात कही जा रही है... बताया जा रहा है कि पिछले अड़तीस साल में पहली बार इस वर्ष अप्रैल में बिजली की सबसे ज्यादा मांग बढ़ी... पर संकट की जड़ें बिजली की मांग में नहीं, उसके उत्पादन में हैं... जिस तेजी से शहरी आबादी बढ़ रही है, उसे देखते हुए तो बिजली की मांग बढ़ेगी ही... फिर घरों में एसी से लेकर बिजली से चलने वाली तमाम चीजें उपयोग में होती हैं... दूसरी ओर, उद्योगों को पर्याप्त बिजली चाहिए... वरना कारखाने और फैक्ट्रियों में उत्पादन होगा कैसे..?