राजनीति के भूगोल के बीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
   Date29-Apr-2022

yh5
बलबीर पुंज
क्या देश में 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रताÓ और मजहबी आजादी के मापदंड सभी नागरिकों के लिए समान हैं? टुकड़े-टुकड़े गैंग द्वारा वर्ष 2016 में दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 'भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाहÓ इंशा अल्लाहÓ जैसे नारे लगाए गए थे। तब कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, वामपंथी नेता सीताराम येचुरी, डी.राजा आदि ने देशविरोधी नारे लगाने वालों का यह कहकर समर्थन किया था कि छात्र तो संविधान प्रदत्त 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रताÓ के अधिकार का उपयोग कर रहे थे। भारत में 3,00,000 से अधिक सक्रिय मस्जिदें हैं, जो कि अधिकांश घोषित इस्लामी देशों से अधिक हैं। न तो देश में कोई नई मस्जिद बनाने पर प्रतिबंध है और न ही उसमें नमाज पढऩे पर पाबंदी। फिर भी सार्वजनिक स्थानों पर सैकड़ों-हजार की संख्या में मुसलमान जुमे की नमाज अदा करने हेतु एकत्र हो जाते हैं। चाहे इससे सड़कों पर सामान्य यातायात बाधित हो जाए, दोपहर के समय स्कूलों से घर लौट रहे छात्र फंस जाएं या कोई रोगी समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने से दम तोड़ दे- उसके बाद भी खुली सड़क, उद्यान या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर मोमिनों द्वारा नमाज पढऩे की हठ का देश में एक वर्ग खुला समर्थन करता है। यदि इससे असुविधा होने पर गैर-मुस्लिम समाज- विशेषकर हिन्दू अपने विरोध का प्रकटीकरण करता है, तो उसी वर्ग के लिए यह सब एकाएक 'इस्लामोफोबियाÓ और 'देश की शांति और समरसता पर खतराÓ का पर्याय बन जाता है। बीते दिनों गुरुग्राम का घटनाक्रम- इसका प्रमाण है।
इस पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र में राणा दम्पति के साथ क्या हुआ? अमरावती से निर्दलीय सांसद नवनीत राणा और बडनेरा विधानसभा से उनके निर्दलीय विधायक पति रवि राणा ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पैतृक घर- मातोश्री के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ करने की बात कही थी, जो ठाकरे परिवार के दल- शिवसेना ने नहीं होने दिया। इस पर 23 अप्रैल को दिनभर राणा दम्पति के घर के बाहर हंगामा होता रहा और शाम होते-होते पुलिस ने राणा दम्पति को गिरफ्तार कर लिया। दोनों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 153 के अंतर्गत राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया है और 6 मई तक न्यायिक हिरासत में रहेंगे।
आखिर राणा दम्पति का अपराध क्या था? उन्होंने मातोश्री, जो कि आधिकारिक मुख्यमंत्री आवास नहीं है- उसके सामने हनुमान चालीसा का पाठ करने आह्वान किया था, जिसमें पांच मिनट का समय भी नहीं लगता, परंतु ऐसा करना महाराष्ट्र की महाविकास अघाड़ी सरकार के लिए देशद्रोह हो गया। यहां तक, इसके लिए राणा दम्पति को 20 फीट जमीन के नीचे गाडऩे की धमकी तक दी जाने लगी। स्मरण रहे कि उद्धव ठाकरे की सरकार भले ही तथाकथित और स्वघोषित सेकुलर दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के समर्थन से चल रही हो, किंतु उसे वर्ष 2019 में जनादेश भाजपा नीत राजग गठजोड़ के बल पर मिला था।
वास्तव में, यह घटनाक्रम देश के स्वयंभू सेकुलरवादियों की तीन कड़वी सच्चाइयों को प्रकट करता है। पहला- भारत में तथाकथित सेकुलर दलों की दृष्टि में सेकुलरवाद का अर्थ इतना विकृत है कि इनके अनुसार, सार्वजनिक स्थानों पर नमाज अदा करने के लिए हर सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए, किंतु हनुमान चालीसा का पाठ या कोई भी अन्य हिन्दू कर्मकांड का सार्वजनिक प्रदर्शन साम्प्रदायिक और देशद्रोह है। दूसरा- इन्हें देश के अस्तित्व और अस्मिता को लेकर किसी भी प्रकार के खिलवाड़ और भारत-हिन्दू के लिए अमर्यादित शब्दों का उपयोग करने की स्वतंत्रता चाहिए, परंतु प्रतिकूल प्रतिक्रिया और राजाज्ञा के बिना हनुमान चालीसा का पाठ करना गंभीर अपराध की श्रेणी में आ जाता है। तीसरा- हिन्दुओं को अपने घरों या फिर मन में हनुमान चालीसा का पाठ करने का सुझाव देने वाले सुबह-शाम प्रत्येक दिन मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से सभी को अजान सुनाने का समर्थन करते हैं। राणा दम्पति इसी विकृत नैरेटिव का शिकार हुए हैं।
महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार में इस प्रकार का कोई पहला मामला नहीं है। फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत का मुंबई स्थित कार्यालय तोड़े जाने के अतिरिक्त 11 सितंबर 2020 को पूर्व सैन्य अधिकारी मदन शर्मा को उनके घर में घुसकर शिवसेना कार्यकर्ताओं ने इसलिए पीट दिया था, क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर व्यंग्य करता कार्टून संदेश फॉरवर्ड किया था। यही नहीं, ठाकरे सरकार के निर्देश पर 4 नवंबर 2020 में प्रख्यात पत्रकार अर्नब गोस्वामी को उनके मुंबई स्थित आवास से किसी आतंकवादी की भांति दबोच लिया गया था। तब गोस्वामी की गिरफ्तारी को दो वर्ष पुराने इंटीरियर डिज़ाइनर अन्वय नाइक की आत्महत्या से जुड़ा होना बताया था, किंतु सच तो यह था कि गोस्वामी तब खुलकर महाराष्ट्र के पालघर में दो हिन्दू संतों की भीड़ द्वारा हत्या और फिल्म अभिनेता सुशांत राजपूत आत्महत्या मामलों को लेकर आक्रमक रिपोर्टिंग कर रहे थे।
बात केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं। पश्चिम बंगाल और केरल में दशकों से राजनीतिक विरोधियों से शत्रुवत व्यवहार किया जा रहा है। इन दोनों प्रदेशों में सरकार के वैचारिक अधिष्ठान से असहमति रखने वालों- विशेषकर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की सरेआम निर्मम हत्या कर दी जाती है, जिसका आरोप अकसर वामपंथियों और जिहादियों पर लगता है। स्वघोषित सेकुलर जमात के लिए अखलाक, जुनैद, पहलु खां, तबरेज आदि मुस्लिमों की निंदनीय हत्याएं घृणा प्रेरित अपराध है, जिससे सेकुलरवाद-लोकतंत्र खतरे में आ जाता है, किंतु कुशीनगर निवासी बाबर अली के साथ कश्मीर के सज्जाद अहमद, आरिफ अहमद, वसीम अहमद बारी आदि की हत्याओं से देश का सेकुलरवाद जीवित रहता है। जानते हैं क्यों? क्योंकि यह सभी भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता थे।
बीते दिनों हनुमान जयंती और रामनवमी पर हिन्दुओं द्वारा निकाली गई शोभायात्राओं पर कई स्थानों में पथराव हुआ। इसपर स्वयूं सेकुलरवादियों ने प्रश्न उठाया कि आखिर मुस्लिम बहुल क्षेत्र या मस्जिद के पास से हिन्दू जुलूस निकालने की क्या आवश्यकता थी। इस मानसिकता की बाबा साहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अपने लेखन कार्य- 'पाकिस्तान या भारत का विभाजनÓ में आलोचना करते हुए कहा था, 'सभी मुस्लिम देशों में किसी मस्जिद के सामने से गाजे-बाजे के साथ बिना आपत्ति के गुजर सकते हैं। यहां तक कि अफगानिस्तान में भी, जहां की व्यवस्था सेकुलर नहीं है- मस्जिदों के पास गाजे-बाजे पर आपत्ति नहीं होती है, किंतु भारत में मुसलमान इस पर आपत्ति करते हैं, केवल इसलिए, क्योंकि हिन्दू इसे उचित मानते हैं।Ó
(लेखक स्तंभकार हैं)