शिक्षा में विद्या का समावेश आवश्यक
   Date29-Apr-2022

dharmdhara
धर्मधारा
शि क्षा आंतरिक अंकुरण है, बाहरी आरोपण नहीं। शिक्षा आंतरिक प्रतिभा, ज्ञान एवं मूल्यों में वर्धन करने का एक सर्वोत्तम माध्यम है। शिक्षा नए मनुष्य को गढऩे वाले जीवन मूल्यों को अर्थ प्रदान करती है। मनुष्य जीवन के हर तल पर अपरिमित ऊर्जा समाई है। देह, प्राण, मन, बुद्धि के छोटे-छोटे हिस्सों में संभावनाओं के महासागर भरे पड़े हैं। शिक्षा इनकी सही और सटीक अभिव्यक्ति की कला खोजती है, परंतु वर्तमान शिक्षा केवल बाहरी आरोपण का माध्यम बनी हुई है। महत्वाकांक्षी किंतु श्रम, साहस और संकल्प से विहीन बेरोजगारों की बढ़ती भीड़ आज की शिक्षा का वर्तमान है। शिक्षा का वर्तमान जगजाहिर है। सभी इसके वर्तमान स्वरूप से सुविदित एवं सुपरिचित हैं। कभी मैकाले ने जो बीज बोए थे, आज उनकी कंटीली फसल से समूचा देश लहूलुहान हो रहा है, पर मैकाले से मुकाबला कौन करे? यह सवाल आज के दौर में कुछ उसी तरह से है, जिस तरह से कभी चूहों के झुंड में यह सवाल उठता था कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? नुकसान से सभी परिचित हैं, पर समाधान का साहस कौन करे? आज की शिक्षा में कुंठा, निराशा और हताशा की पर्याय बनी कुछ डिग्रियां, उपाधियों के छोटे-बड़े ढेर बचे हैं।
शिक्षा का मूल उद्देश्य है-मनुष्य को उसकी बाहरी और आंतरिक आवश्यकताओं से परिचित कर उनको पूरा करने की कला प्रदान करना। शिक्षा जीवन की भौतिक जरूरतें, जैसे-व्यवसाय, नौकरी एवं सुरक्षा आदि की पूर्ति के साथ ही बौद्धिक, नैतिक एवं आत्मिक मूल्यों की पहचान एवं इनके अभिवर्धन की कला प्रदान करती है, मनुष्य के सर्वांगपूर्ण विकास की राह दिखाती है, परंतु दुर्भाग्य से शिक्षा को एकांगी बना दिया गया है। इसे केवल जीविकोपार्जन एवं व्यवसाय प्राप्त करने का एकमात्र जरिया बना दिया गया है और इसी कारण शिक्षा के व्यवसायीकरण का दौर प्रारंभ हुआ।