दूरियां घटाना प्राथमिकता...
   Date27-Apr-2022

vishesh lekh
धरती का स्वर्ग जम्मू-कश्मीर का पुरावैभव लौटाने के प्रयास वृहद स्तर पर हो रहे हैं और उसी का सकारात्मक परिवर्तन यह दिखाई दे रहा है कि राज्य में अब पर्यटक ही नहीं, सामान्यजन भी शांति की अनुभूति कर रहे हैं... 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर को उन बेजा प्रावधानों या कहें कंटीले बंधनों से मुक्ति मिली थी, जिसके कारण जम्मू-कश्मीर की न केवल सांसें बाधित हो रही थी, बल्कि पूरी आबोहवा भी गोलियों की गंध के कारण विषैली होती जा रही थी... अनुच्छेद 370 एवं 35ए का खात्मा करके केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को वास्तविकता में आजादी के उस सूर्योदय के दर्शन कराए, जिसका वह भारत की आजादी के बाद से सतत इंतजार करता रहा... लेकिन भारत के अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर को इन्हीं बेजा प्रावधानों की ढाल बनाकर सत्ता के लिए अपने स्वार्थ की राजनीति करने वाले नेता-दलों ने हमेशा दुरुपयोग ही किया... परिणामत: जम्मू-कश्मीर की पहचान आतंकवाद पीडि़त क्षेत्र के रूप में विश्व में होने लगी... स्थिति यहां तक पहुंच गई कि बर्बर कट्टरपंथी धड़ों की साजिशों के चलते जम्मू-कश्मीर विशेष रूप से कश्मीर घाटी को हिन्दूविहीन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई... लेकिन अब जम्मू-कश्मीर अनुच्छेद 370 एवं 35ए से मुक्त होने के बाद लोकतंत्र की अनुभूति के साथ एक शांतिपूर्ण स्थिति को प्राप्त करने की ओर बढ़ रहा है... जब प्रधानमंत्री ने अनुच्छेद 370, 35ए के खात्मे के बाद संबोधित किया था, तब उन्होंने वादा किया था कि वे जम्मू-कश्मीर की दिल्ली से दूरियां खत्म करना अपनी प्राथमिकता रखेंगे... और वही हुआ, आज पंचायती राज व्यवस्था जम्मू-कश्मीर में आकार ले रही है... यह कहीं न कहीं जम्मू-कश्मीर की जड़ों तक लोकतंत्र के पहुंचने की वह प्रतिध्वनि है, जो न केवल बर्बर कट्टरपंथी धड़ों को आईना दिखा रही है, बल्कि जम्मू-कश्मीर को लेकर आत्मविश्वास गंवा चुके देशवासियों को भी एक नया उत्साहजनक संदेश मिला है कि कश्मीर अब मुख्यधारा में आकर राष्ट्र के विकास का द्योतक ही नहीं बनेगा, बल्कि एक नई पहचान के साथ अपनी नैसर्गिक सौंदर्यता को देश-दुनिया में नए तरीके से विस्तारित करने में भी सफल होगा... प्रधानमंत्री ने पंचायत राज दिवस के अवसर पर जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 एवं 35ए के खात्मे के बाद पहली बार जाकर संबोधित किया... 20 हजार करोड़ रुपए की परियोजनाओं का शुभारंभ व शिलान्यास किया... 38 हजार करोड़ का निजी निवेश जम्मू-कश्मीर में इन दो वर्षों में होना यह बताता है कि जम्मू-कश्मीर में न केवल लोकतंत्र बहाल हो रहा है, बल्कि संवैधानिक ढांचे के अनुरूप सारी व्यवस्थाएं मजबूत तरीके से आकार ले रही हैं...
दृष्टिकोण
दल-बदल पर उचित सलाह...
एक तरफ तो हम लोकतंत्र की मजबूती के साथ संवैधानिक दायरे में विधायिका के दायित्वों का बार-बार उदाहरण देते हैं, तो दूसरी तरफ जब हमारे जनता के द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि ही अपने निर्धारित पैमाने पर खरे नहीं उतरते या फिर उन्हें जिस दल, विचारधारा एवं उद्देश्य के लिए चुना है, उसी को ठेंगा दिखाकर वे दूसरे पाले में जब जा बैठते हैं, तो इस तरह का दल-बदल न तो लोकतंत्र के लिए और न ही संविधान के लिए शुभ माना जा सकता है... क्योंकि जनता ने जिसे चुना है, उसको लेकर उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था... लेकिन दल-बदलने वाला जनप्रतिनिधि क्या अपने दृष्टिकोण को इतनी जल्दी तिलांजलि देने को तैयार है, तो इसका स्वार्थ की राजनीति से नाता क्या दूर-दूर तक नजर नहीं आता... दल-बदल कानून किसी भी दल में और किसी भी स्तर पर हो, वह संविधान के लिए और लोकतांत्रिक प्रावधानों के लिए कतई उचित नहीं है... जो दल-बदल करते हैं, उन्हें अपने पुराने दल या चुने गए पद से इस्तीफा देकर दल-बदल करना चाहिए... यही लोकतंत्र सम्मत माना जा सकता है... देश के उपराष्ट्रपति एम.वैंकेया नायडू ने गत दिनों बेंगलुरु प्रेस क्लब की 50वीं वर्षगांठ पर नए भारत में मीडिया की भूमिका पर व्याख्यान देते हुए दल-बदल रोधी कानून में संशोधन की पैरवी करते हुए जो बातें कहीं, वह बहुत गंभीर हैं... उपराष्ट्रपतिजी ने स्पष्ट तौर पर माना है कि दल-बदल रोधी कानून में खामियां हैं, जिन्हें दूर करने की जरूरत है... ताकि जनप्रतिनिधियों के दल-बदल को रोका जा सके... यह एक साथ व्यापक संख्या में दल-बदल की अनुमति देता है, लेकिन कुछ संख्या में दल-बदल की नहीं, इसलिए अनेक बार नेता या दल संख्या जुटाने की कोशिश करते हैं, इसी में जोड़-तोड़ भी होती है और खरीद-फरोख्त भी... इस तरह की खामियों को दूर करने के लिए और इसे प्रभावी बनाने के लिए कदम उठाना चाहिए... इसका सबसे बेहतर तरीका तो यही है कि एक दल से दूसरे दल में जाने के पूर्व चुने हुए सांसद, विधायक कम से कम अपने पद से इस्तीफा दें...