गौरव का सम्मान
   Date27-Apr-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
सि कंदर ने भारत पर आक्रमण कर दिया। पुरु का सामना करने से पूर्व कई छोटे-बड़े राज्यों से उसे युद्ध करना पड़ गया। एक छोटा-सा राज्य मार्ग में पड़ा, उसके राजा के पास बहुत थोड़ी-सी सेना थी। तब भी वह सिकंदर से युद्ध करने रणक्षेत्र में कूद पड़ा। वही हुआ, जिसका भय था, राजा युद्ध हार गया। विजय के पश्चात राजा को सपरिवार कुलगुरु के साथ सिकंदर के समक्ष लाया गया। सिकंदर ने क्रोध में कुलगुरु से कहा- 'मुझे बताया गया है कि तुमने राजा को सीख दी कि वह युद्ध करे। जब पराजय निश्चित थी, तो ऐसी मूर्खतापूर्ण शिक्षा किस काम की!Ó कुलगुरु ने उत्तर दिया-'सिकंदर! निश्चित तो मृत्यु भी है, तो क्या मनुष्य जीना भी छोड़ दे। अरे! मैंने राजा को यही सिखाया कि जियो भी सम्मानपूर्वक और मरो भी सम्मानपूर्वक। मुझे गर्व है कि राजा हारा जरूर, पर अपने सम्मान की रक्षा करते हुए। मनुष्य के साथ जय-पराजय नहीं, गौरव व सम्मान जाता है।Ó सिकंदर को तब ही अनुभव हो गया कि भारतवासी किसी और मिट्टी के बने हैं।