अफगान में बम धमाकों पर इस्लामी पैरोकारों की चुप्पी क्यों?
   Date27-Apr-2022

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डॉ. बचन सिंह सिकरवार
अ फगानिस्तान में सत्ता पर तालिबान काबिज है और शरीयत का निजाम भी है। इस मुल्क के ज्यादातर बाशिंदे भी एक मजहब को मानने वाले हैं। फिर भी रमजान के पाक महीने में इस्लामिक कट्टरपंथी दहशतगर्द संगठन 'इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासानÓ (आई.एस.के.) द्वारा सिलसिलेवार बम विस्फोटों के जरिए हममजहबियों का खून बहाने और उनकी जान ली जा रही है। फिर भी भारत समेत दुनिया में किसी इस्लामिक मजहबी रहनुमाओं द्वारा उनकी इन बेजा हरकतों की मजम्मत नहीं किया जाना न सिर्फ बेहद दु:खद है, बल्कि उनका यह रवैया इनके असल चेहरे को भी बेनकाब करता है। इनकी खामोशी की असल वजह मजहबी फिरकापरस्ती है। ये इस्लाम के तमाम फिरकों में से बस कुछ को ही तस्लीम करते हैं और बाकी फिरकों को खुद के मजहब से न केवल खारिज करते आए हैं, बल्कि उनकी जान लेने वालों को मुजाहिद मानते आए हैं। इनकी मजहबी मुहब्बत और बिरादराना बस अपने फिरके या कुछ फिरकों तक सिमटा हुआ है। यही वजह है कि इसी 22 अप्रैल को अफगानिस्तान के उत्तर कुंदुज प्रांत के इमाम साहिब जिले में मावलवी सिकंदर मस्जिद और एक मदरसे में बम विस्फोट हुए। इनमें 33 लोगों को मौत और 43 लोग जख्मी भी हुए हैं। इससे एक दिन पहले इस मुल्क में इन्हीं दहशतगर्दों ने तीन बम विस्फोट किए। पहला विस्फोट उत्तरी मजार-ए-शरीफ में एक शिया मस्जिद के अंदर हुआ, तब नमाज पढ़ी जा रही थी। इसमें 12 लोग मारे गए और 40 से ज्यादा घायल हो गए। इसी दिन राजधानी काबुल में एक स्कूल के समीप बम फटा, जिससे शिया बहुल इलाके में दो बच्चे भी घायल हो गए।
इसी 20 अप्रैल को पश्चिम काबुल के दाश्त-ए-बार्ची इलाके में पहला धमाका 'मुमताल एजुकेशनल सेंटरÓ के पास हुआ, जबकि दूसर धमाका 'अब्दुल रहीम शहीद हाईस्कूलÓ के समीप। तीसरी विस्फोट भी स्कूल के निकट ही हुआ,जब छात्र छुट्टी होने पर स्कूल से निकल रहे थे। इनमें 25 छात्र मारे गए। इन स्कूल में पढऩे वाले छात्र अल्पसंख्यक हजारा समुदाय के होते हैं, जो दहशतगर्दों के निशाने पर रहता है। तालिबान हुकूमत कायम होने पर हजारा समुदाय के लोगों पर पहले भी कई बार हमले हो चुके हैं। ये लोग आई.एस. को दहशतगर्द संगठन नहीं, बल्कि अपनी मजहबी तंजीम मानते-समझते हैं। उसके दहशतगर्दों को मुजाहिद। रमजान माह के शुरू में गत 4 अप्रैल को पुराने काबुल शहर के मध्य स्थित सबसे बड़ी और अठारहवीं सदी की 'पुल-ए-खिश्ती मस्जिदÓ पर दोपहर की नमाज के दौरान हथगोला फेंककर हमला किया गया, जिसमें छह लोग घायल हुए थे। इससे पहले इसी इलाके में शहर के एक बाजार ग्रेनेड हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई और 59 लोग जख्मी हुए थे। इस मुल्क में तालिबान हुकूमत के बाद अब तक अमेरिका के मददगार होने के आरोप में 500 सरकारी अधिकारियों की हत्या की जा चुकी है।
गत 27 अगस्त, 2021 को काबुल में हमले में 103 मारे गए थे। फिर 2 अक्टूबर, 2021 को जलालाबाद में दहशतगर्दों के हमले में 2 तालिबान लड़ाके मार दिए थे। 15 अगस्त, 2021 को जब इस मुल्क पर तालिबान काबिज हुआ, जो खुद इस्लामिक कट्टरपंथी दहशतगर्द संगठन है। यह पहले सोवियत सैनिकों और फिर अमेरिकी सैनिकों से जंग कर चुका है। इनके साथ-साथ तालिबान दूसरे दहशतगर्द संगठन 'इस्लामिक स्टेटÓ, ' अलकायदाÓ से लड़ता आया है। अब उसका प्रतिद्वंद्वी 'इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासन प्राविन्स बना हुआ, जो तालिबानों पर अकसर हमला करता रहता है। वैसे इन सभी के निशाने पर गैर सुन्नी मुसलमान हैं। यही कारण है कि इस फिरके के लोग शियाओं, अहमदियों, खोजा, कादियानों, ताजिक, कजाक, कुर्दों समेत कई दूसरे फिरकों के मुसलमानों पर होने वाली हैवानियत तथा जुल्मों पर खामोश बने रहते हैं। यही वही इस्लाम को मानने वाले हैं, जो गैर मुसलमान द्वारा उंगली छूने पर जमीन-असमान कर देते थे, क्योंकि इनका मानना है कि अपने ने मारा तो कोई बात नहीं, गैर ने मारा तो उसकी खैर नहीं। यही कारण है कि दुनिया में मुसलमानों और इस्लाम के बारे कहीं (डेनमार्क, फ्रांस) कुछ हो, उसके लिए भारत में मुखालफत के साथ-साथ दंगे-फसाद करने तक पर उतारू हो जाते हैं। अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद आई.एस.के. सक्रिय हो गया। दहशतगर्द संगठन अधिकतर देश की शिया आबादी को निशाना बनाता रहा है। शिया मस्जिदों पर हमला किया जाता है। हालांकि तालिबान का कहना है कि उनकी सरकार ने देश में आतंकवादी हमलों को रोकने का काम मजबूती से किया है। इस वजह से आतंकवादी घटनाओं में कमी आई है, लेकिन अफगानिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में गाहे-बगाहे दहशतगर्दों के हमले होते रहे हैं।
वैसे अफगानिस्तान की नींव ही खूनखराबे पर रखी गई। ऐसे में इसका पूरा इतिहास रक्तपात से भरा हुआ है। यह सिलसिला बदस्तूर अब तक जारी है, जिसके शिकार गैर मुस्लिमों से कहीं ज्यादा हममजहबी हैं यानी मुसलमान। सत्ता की सियासत के इस खेल में कभी मजहब की आड़ ली गई, तो कभी फिरकापरस्ती की। अफगानिस्तान मध्य एशिया का यह पहाड़ी मुस्लिम मुल्क है, जो पाकिस्तान, ईरान, तुर्कमेनिस्तान, तजाकिस्तान आदि से घिरा हुआ है। आरम्भ में इसका नाम 'एरियानाÓ था। उसके पश्चात 'खुरासानÓ(उगते सूर्य का देश) कहा जाने लगा। काबुल के सिर हिन्दुकुश पर्वत है। इसका क्षेत्रफल-647, 497 वर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या- 29117000 से अधिक है। इस मुल्क के लोग पश्तो, दारी, फारसी बोलते हैं और इस्लाम को मानते हैं। इस देश की राजधानी काबुल तथा मुद्रा-अफगानी है। इसके अलावा अफगानिस्तान के कानूनों के आधार पर शरीयत या इस्लामी कानून और कबायली रीति-रिवाज हैं। पाकिस्तान को जाने वाले मुख्य मार्ग खैबर के दर्रे, काबुल, बोलन और कंधार से होकर जाते हैं। पर्वतीय देश होने के कारण इसमें पहुंचने का एकमात्र मार्ग दर्रे हैं। परिवहन के साधन बहुत कम हैं। देश सात प्रांतों में विभक्त है। हर एक प्रांत में एक गर्वनर होता है।
अहमद शाह दुर्रानी ने 1747 में पृथक अफगानिस्तान राज्य की स्थापना की। पहले अफगानिस्तान की शासन प्रणाली संवैधानिक राजतंत्र थी। 17 जुलाई, 1973 को एक सैनिक क्रांति के बाद 40 वर्षों से चले आ रहे राजतंत्र का अंत हो गया और गणराज्य की स्थापना की गई। सन् 1978 में नूर मुहम्मद तराकी की सेना ने विद्रोह कर 'माक्र्सवादी पीपुल्स रिपब्लिकÓ की स्थापना। सन् 1986 में लेफ्टिनेंट जनरल नजीबुल्ला राष्ट्रपति बने। अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं का मुजाहिदों ने निरंतर विरोध किया। सन् 1988 के समझौते के अनुसार 1989 में सोवियत सेनाएं वापस लौट गईं। पहली फरवरी, 1989 को नजीबुल्ला के नेतृत्व में सैन्य परिषद् का गठन किया गया। अफगान विद्रोहियों ने इस्लामबाद में एक बैठक में सिग्बांतुल्ला मोजदिद को निर्वासित अंतरिम सरकार का राष्ट्रपति चुना। उन्होंने मुजाहिदीन नेतृत्व परिषद् को सत्ता सौंप दी।
अप्रैल, 1992 में सत्ता हस्तांतरण भयानक लड़ाई के कारण असफल हो गया। गुटीय संघर्षों के कारण काबुल की आधी आबादी शहर से पलायन कर चुकी थी। सन् 1994 में राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन और प्रधानमंत्री गुलबुद्दीन हिकमतयार अलग हो गए। सन् 1994 के पूर्वाद्र्ध में एक नया इस्लामिक आंदोलन तालिबान एक नई शक्ति के रूप में उभरा। इसने एक तिहाई देश पर कब्जा कर लिया। जून, 1996 में हिकमतयार एक बार फिर से रब्बानी के साथ हो गए और प्रधानमंत्री बने, लेकिन सितम्बर में तालिबान ने इन्हें अपदस्थ कर दिया। 26 सितम्बर, 1996 को पाकिस्तान समर्थित तालिबान बल ने काबुल के पूर्वी भाग पर आधिपत्य जमा लिया और 27 सितम्बर, 1996 को ही बिना किसी प्रतिरोध के तालिबान ने काबुल शहर पर कब्जा कर लिया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा में रह रहे पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्ला तथा उनके भाई को एक साथ खुलेआम फांसी पर लटका दिया। अफगानिस्तान को तालिबान ने मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया। मुल्क में सख्त इस्लामी कानून लागू कर दिए। लड़कियों के स्कूल बंद कराने के साथ-साथ सरकारी कार्यालयों में महिलाओं के कार्य करने पर पाबंदी भी लगा दी।
तालिबान को सन् 1997 में झटका लगा। अल्पसंख्यक ताजिक काबुल में एक शक्ति बनकर उभरने लगे। उत्तरी गठबंधन का एक तिहाई अफगानिस्तान पर नियंत्रण हो गया। संयुक्त राष्ट्र का शांति प्रयास 30 अप्रैल, 1998 में को विफल हो गया। फिर लड़ाई से भड़क उठी।
(लेखक स्तंभकार हैं)
तालिबान ने दावा किया कि 85 प्रतिशत देश पर उसका आधिपत्य है और यहाँ पर सख्त इस्लामिक नियम लागू हैं। अगस्त,1998 में तालिबान ने मजार-ए-शरीफ पर कब्जा कर लेने का वादा किया। तालिबान की सरकार सिर्फ पाकिस्तान, युनाइटेड अरब अमीरात ने मान्यता दी थी। मार्च महीने में तालिबान ने विश्व की धरोहर समझी बामियान में बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं को बम धमाकों से उड़ा दिया। नवम्बर, 2001 में उत्तरी गठबन्धन ने अमेरिका के सहयोग से तालिबान सरकार उखाड़ फेंका। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अफगानिस्तान विश्व का सबसे अविकसित देश है। युद्ध की भयावहता के कारण यहाँ के निवासी पड़ोसी देशों में शरण लिए हुए हैं। अफगानिस्तान में एक करोड़ से अधिक बारूदी सुरंगों बिछी हैं।
पूर्व महाराजा मोहम्मद जहीर शाह 29 वर्षों के निर्वासन के बाद 18अप्रैल,2002 को स्वदेश लौटे।, जून महीने में अन्तरिम प्रशासन के नेता हमीद करजाई को अगले राष्ट्रपति पद के लिए भारी मत प्राप्त हुए। जुलाई, में उपराष्ट्रपति पद के लिए हाजी अब्दुल कादिर की हत्या से शान्ति की कोशिशों को धक्का लगा। बामियान घाटी युनेस्को के अधीन कर दी गई। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि और पशु पालन है। इस मुल्क की निर्यात की मुख्य वस्तुएँ हैं- पशु, फल, ऊन, चमड़ा, हींग,मेवा आदि तथा कोयला, नमक, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम, लोहा, तांबा प्रमुख खनिज हैं।
अब जब अफगानिस्तान ने खुद को मुस्लिम मुल्क घोषित करने के साथ-साथ शरियत कानून लागू है। फिर भी सत्तारूढ़ तालिबान को अपने प्रतिद्वन्द्वी दहशतगर्द संगठन 'इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान प्राविन्सÓ से जूझना पड़ा है,जो उसे हर हाल में सत्ता से बेदखल करने में जुटा है।इसके लिए आए दिन बम धमाके करके बेकसूरों की जान ले रहा है।
तालिबान और आइ.एस.के. दोनों ही इस्लामिक सुन्नी कट्टरपंथी दहशतगर्द संगठन हैं, जो जिहाद के जरिए दुनिया भर में 'निजाम-ए-मुस्तफाÓ यानी 'दारूल इस्लामÓ कायम करना चाहते हैं। इसके बावजूद इन्होंने अपने-अपने मकसद के लिए रमजान के पाक महीने में भी बेकसूरों का खून बहाने और जान लेने से कभी गुरेज नहीं किया है। अब सवाल यह है कि दुनिया के 57 इस्लामिक मुल्कों में से कहीं से भी रमजान माह में बेकसूर हममजहबियों के खून बहाये जाने पर खामोशी क्यों छायी हुई है? मामूली से मसले पर फतवे जारी करने वाले मजहबी रहनुमाओं की खामोशी अब बेहद खल रही है। आखिर ये लोग कैसी मजहबी दुनिया चाहते हैं ?
सम्पर्क-डॉ.बचन सिंह सिकरवार 63 ब,गाँधी नगर,आगरा-282003 मो. नम्बर-9411684054