साधारण मनुष्य की असाधारणता का प्रतीक श्रीराम
   Date27-Apr-2022

dharmdhara
धर्मधारा
भ गवान श्रीराम, सनातन हिन्दू धर्म के ही नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव जाति के वैचारिक, सामाजिक, भावनात्मक प्रेरणा स्तंभ हैं। हर मां जब अपने बच्चे की युवावस्था की कल्पना करती है, तो श्रीराम ही उन मनोभावों के नायक बन पाते हैं। इन अतिविलक्षण चरित्र में हमें एक सामान्य इंसान की ऐसी झलक नजऱ आती है, जिनसे हम खुद को सम्बद्धित महसूस करते हैं। उनका अपने कार्य, परिवार और समाज के प्रति समर्पण का भाव, हम सभी को आजीवन, सृष्टि के प्रति कर्तव्यपालन हेतु प्रेरित करता रहेगा। त्याग और प्रेम का जो अद्भुत सामंजस्य, रघुनाथजी ने अपने जीवन चरित में प्रेषित किया है, उसका कोई पर्याय नहीं। ये जननायक साधारण व्यक्ति के जीवन की सम्पूर्णता लिए हुए, हर समस्या को सुगमता से पार कर लेने का मार्ग सुझाते हैं। जब तक रघुकुलनंदन वनगमन से पूर्व अयोध्या में थे, तब तक एक राजकुमार की भांति कार्य कर रहे थे, उन चौदह वर्षों के वनवास ने दशरथनंदन को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बना दिया। अपने कुल और जाति से परे, वनवासियों से, वानरों से, प्रकृति से, प्रेम का जो निश्छल नाता उन्होंने स्थापित किया, वो व्यक्त करना अतुलनीय है। राजकुमार से वनवासी बन जाने में जो बाधाएं उन्होंने झेली होंगी, उसका अनुमान लगाना असम्भव है, किंतु प्रतिकूल को अपने अनुकूल बनाना या प्रतिकूल के अनुकूल बन जाना ही उनकी श्रेष्ठता सिद्ध करती है। ये श्री राघवेंद्र सरकार के महान जीवन की एक अंश भर भी व्याख्या नहीं है। हम मनुष्य कर्मों के प्रति सजग होकर, ईमानदारी और निष्ठा से अपने कार्य करें तो निश्चित है कि श्रीराम के प्रति चित्त स्थिर आस्था को मूर्त रूप दे पाएंगे। सूर्यवंशी प्रभु श्रीराम का अवतरण और महाकाव्य रामायण का हर एक पात्र व कथाएं, हमारे लिए विचारणीय भी हैं, अमल करने योग्य भी हैं। नवभारत के निर्माण की नींव इस ग्रंथ से प्रेरित होकर रखी जाए तो तय है कि हमारा भविष्य और नई पीढिय़ां, परिवार, समाज और राष्ट्र की उन्नति और शांति के लिए सदा प्रयासरत रहेंगी।