संक्रमण का खतरा टला नहीं...
   Date26-Apr-2022

vishesh lekh
भारत में एक बड़ी आबादी को कोरोनारोधी टीका देकर महामारी से बचाव के पुख्ता इंतजाम किए हैं.., लेकिन कोरोना को कतई हल्के से नहीं लेना चाहिए... दुनिया में अपने लोगों को सबसे ज्यादा खुराक देने वाला चीन भी आश्वस्त नहीं है, उसे 3.32 अरब खुराक के इस्तेमाल के बावजूद बेहद कड़े लॉकडाउन की जरूरत पड़ गई है, तो संक्रमण के खतरे को समझा जा सकता है... अपने लोगों को सबसे ज्यादा खुराक देने के मामले में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर है... 1.87 अरब खुराक देने वाले भारत को कतई आश्वस्त नहीं होना चाहिए... कोरोना विचित्र बीमारी है, वैज्ञानिक अभी भी इसे पूरी तरह पहचान नहीं पा रहे हैं... इंग्लैंड में एक व्यक्ति 505 दिनों तक कोरोना पॉजिटिव रहने के बाद दुनिया से गया है... यह कैसी महामारी है, लोगों को अलग-अलग शिकंजे में जकड़ रही है... अत: इस जंग को अभी खत्म न मानते हुए वैज्ञानिक अनुसंधान, दवा व वैक्सीन विकास पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है... इसमें कोई शक नहीं कि कोरोना वैक्सीन ने महामारी की रोकथाम की दिशा में बेहतर काम किया है... दुनिया के 5.12 अरब लोगों मतलब 66.7 प्रतिशत आबादी को टीके की कम से कम एक खुराक मिल चुकी है... दुनिया के 60 प्रतिशत लोगों का पूरी तरह से टीकाकरण हो चुका है और 24 प्रतिशत लोग बूस्टर डोज प्राप्त कर चुके हैं... यह भी अपने आप में रोचक है कि दुनिया में सबसे अव्वल संयुक्त अरब अमीरात में 99 प्रतिशत लोगों का पूर्ण टीकाकरण हो चुका है, जबकि बुरुंडी और कोंगो जैसे देशों में एक प्रतिशत लोग भी पूरी तरह से टीकाधारी नहीं हुए हैं... भारत में 62 प्रतिशत लोगों को दोनों खुराक मिल चुकी है और लगभग दो प्रतिशत लोग बूस्टर खुराक वाले होने वाले हैं... भारत में इन दिनों एक ओर, कोरोना के बढ़ते मामलों की चर्चा है, वहीं दूसरी ओर, पांच साल से 11 साल के बच्चों को कोरोना वैक्सीन देने की तैयारी भी चल रही है... ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया के विशेषज्ञ पैनल ने 5 से 11 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए वैक्सीन के आपातकालीन उपयोग की सिफारिश कर दी है... हैदराबाद स्थित फर्म बायोलॉजिकल-ई द्वारा विकसित कॉर्बेवैक्स कोविड-19 के खिलाफ भारत का पहला स्वदेशी रूप से विकसित आरबीडी प्रोटीन सब-यूनिट वैक्सीन है... गौर करने की बात है कि इस साल 16 मार्च से 12 से 14 साल के बच्चों को कॉर्बेवैक्स ही दिया जा रहा है... वैसे बच्चों के टीकाकरण में अमेरिका आगे चल रहा है...
दृष्टिकोण
आगजनी से जुड़े हादसे...
गर्मी के दिनों में शार्ट-सर्किट के चलते ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में आग लगना एक बड़ी समस्या है, लेकिन तकनीक के कारण अब नए तरह की आगजनी से जुड़े हादसे भी आम हो रहे हैं... शहरों में बढ़ते प्रदूषण और ईंधन की किल्लत के मद्देनजर बैटरी से चलने वाले यानी इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जा रहा है... सरकारें इनकी खरीद पर अनुदान, छूट वगैरह भी दे रही हैं... अब तो महानगरों में बैटरी चालित भाड़े की टैक्सियां भी चलने लगी हैं... इस तरह लोगों में इन वाहनों के प्रति उत्साह बढ़ा है... इस वक्त करीब पौने ग्यारह लाख इलेक्ट्रिक वाहन सड़कों पर चल रहे हैं... मगर इस उत्साह के बीच ऐसे वाहनों में तकनीकी खराबी की वजह से आग लगने और लोगों के जान गंवा देने या गंभीर रूप से घायल हो जाने की घटनाएं चिंता पैदा करने वाली हैं... आशंका है कि अगर इन वाहनों में इसी तरह आग लगती और हादसे होते रहे, तो लोग इन्हें खरीदने से बचेंगे... ऐसे में केंद्रीय सड़क एवं परिवहन विभाग का इस मामले को गंभीरता से लेना कुछ बेहतरी की उम्मीद जगाता है... सड़क एवं परिवहन मंत्री ने इलेक्ट्रिक वाहन बनाने वाली कंपनियों को सख्त हिदायत दी है कि अगर उनके बनाए वाहनों में तकनीकी खराबी आती है, तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा... कंपनियों को तकनीकी खराबी वाले वाहनों को वापस लेना और सुधार कर ग्राहकों को देना होगा... अनेक देशों में बहुत बार ऐसा देखा गया है कि अगर किसी मॉडल के वाहन में तकनीकी खराबी की शिकायत आती है, तो संबंधित कंपनी खुद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए बाजार से उस मॉडल के सारे वाहनों को वापस ले लेती है और उनमें सुधार के बाद ही देती है... मगर हमारे यहां जब तक कानून का डंडा न चले, तब तक कंपनियां अपनी जिम्मेदारी नहीं समझतीं... उन्हें तो मुनाफे से मतलब है... हालांकि हमारे यहां भी सख्त उपभोक्ता कानून हैं और अगर कोई ग्राहक अदालत में अपनी किसी वस्तु की गुणवत्ता को लेकर शिकायत करता है, तो संबंधित कंपनी को भारी जुर्माने का भुगतान करना पड़ता है... मगर अदालती कार्रवाई में वक्त बहुत लगता है और हर ग्राहक वहां तक पहुंच नहीं पाता...
इस तरह सरकार का खुद इस मामले में संज्ञान लेना एक सराहनीय पहल है। जिस तरह हमारे देश में वाहनों का उपयोग बढ़ रहा है, वाहन उद्योग दिन पर दिन फल-फूल रहा है, उसमें उनकी नैतिक जवाबदेही तय होना जरूरी है। साथ ही वाहन निर्माता कंपनियों की इस प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगना चाहिए कि वे केवल ग्राहकों का रुझान भांपते हुए अधिक से अधिक कमाई करने के मकसद से वाहन निर्माण न करें।
दरअसल, देखा जाता है कि जिस भी वस्तु का उपभोग बढ़ता है, तमाम कंपनियां उस वस्तु के निर्माण में लग जाती हैं। अगर उस वस्तु के निर्माण और उपयोग को सरकार प्रोत्साहित कर रही हो, तब तो एक होड़-सी लग जाती है। उसमें गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा जाता। बैट्री चालित वाहनों के निर्माण में भी यही प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। दुपहिया और चार पहिया वाहनों का निर्माण तो फिलहाल कुछ नामी कंपनियां कर रही हैं, जिनकी बाजार में पहचान और साख है। जब उनके वाहनों में इतने बड़े पैमाने पर खामी पैदा हो रही है, तो उन निर्माताओं के बारे में क्या कहें, जिन्होंने महज सरकारी प्रोत्साहन और बाजार में प्रचलन का लाभ उठाने के मकसद से गली-मोहल्लों तक में वाहन निर्माण शुरू कर दिया है। बैट्री चालित रिक्शे अक्सर यही कंपनियां बनाती हैं। अब देश का शायद ही कोई गांव-कस्बा हो, जहां इलेक्ट्रिक रिक्शे नहीं चलते। उनके निर्माण पर भी नजर रखने की जरूरत है।