सती शांडिली
   Date26-Apr-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
पा तिव्रत की साधिका शांडिली को रुग्ण पति मिला। किसी पूर्वजन्म के कुकृत्य से वह कुष्ठ रोग से पीडि़त था एवं चलने-फिरने में भी अशक्त था। इन सबके बावजूद शांडिली की तपस्या अनवरत चलती थी। दुर्बल व्यक्तित्व समर्थ को खोजता है और समर्थ अशक्तों की सहायता में ही अपनी सार्थकता देखता है। रुग्ण पति से उसे कोई शिकायत न थी। अपनी आवश्यकतापूर्ति के लिए उसके पास हाथ-पैर थे और उसके साथ परमात्मा का अनुग्रह था कि सेवा-वृत्ति के विकास के लिए घर में ही अवसर प्रदान किया हुआ था। शांडिली ईश्वर के अनुग्रह के रूप में अपने रुग्ण पति को देवतुल्य मानती थी और यह मानती थी कि स्वयं भगवान रोगी का स्वरूप धारण करके उसके विकास के लिए वहां उपस्थित हैं। एक दिन अंधेरी रात में पति को पीठ पर लिए वह चली जा रही थी। मार्ग में माण्डव्य ऋषि तपस्या में लीन थे। अंधकार में दिखाई न देने के कारण उसके पति का पैर महर्षि से टकरा गया। महर्षि ने इसे अपना अपमान मानते हुए क्रोध में आकर शाप दिया-'जिस व्यक्ति ने यह दुष्टता की है, वह सूर्योदय होते ही मृत्यु को प्राप्त होगा।Ó
शांडिली ने यह सुनकर महर्षि को स्पष्टीकरण भी दिया, परंतु कोई लाभ न निकला। अपनी व्रतशीलता से सांसारिक भयानक रोग को साधना एवं प्रगति का सोपान बनाने वाली नारी की सामथ्र्य को प्रकट रूप में आना ही पड़ा। शांडिली ने कहा- 'मैं निरपराध होकर वैधव्य का दंड नहीं भोगूंगी। यदि सूर्योदय के साथ पति की मृत्यु आने वाली है तो आज सूर्योदय ही नहीं होगा।Ó पतिव्रता के व्रत की अवहेलना करने का साहस सूर्यदेव में भी न था। समस्त सृष्टि में हाहाकार मच गया। ऐसे में सती अनुसूया आगे आईं और शांडिली को बोलीं-'बहन! सूर्योदय होने दो, तुम्हारे पति को मैं जीवित कर दूंगी।Ó दोनों सती नारियों के तेज का प्रमाण पाकर सारा संसार धन्य-धन्य कह उठा।