भारत के लिए आईना श्रीलंका का आर्थिक संकट
   Date26-Apr-2022

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डॉ. सत्येन्द्र किशोर मिश्र
ए क उच्च-मध्यम आयवर्ग एवं सवा दो करोड़ की आबादी का भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका पिछले आठ दशकों के सबसे गंभीर आर्थिक संकट में है। आसमान छूती मंहगाई तथा बेरोजगारी के साथ विदेशी मुद्रा भंडार में चिंताजनक कमी ने श्रीलंका को तेल एवं गैस सहित रोजमर्रा की जरूरतों के आयात में असमर्थ बना दिया। दवाओं सहित खाद्य एवं पेट्रोलियम पदार्थों की गंभीर किल्लत से आम आदमी बेहाल है। सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शनों के कारण आर्थिक एवं राजनीतिक अस्थिरता के माहौल में आपातकाल लगने के साथ ही उसके सभी मंत्रियों तथा केंद्रीय बैंक के मुखिया को इस्तीफा देना पड़ा। श्रीलंका का वर्तमान आर्थिक संकट किसी एक खास घटना का नतीजा न होकर लंबे समय से चले आ रहे सरकार के समग्र आर्थिक कुप्रबंधन, कृषि संकट, भ्रष्टाचार एवं नासमझीभरे लोक-लुभावन निर्णयों की वजह से है, जिसे समझने की जरूरत है।
पिछले कई वर्षों से खराब समष्टि आर्थिक प्रबंधन की वजह से श्रीलंका में अधिक कुल व्यय तथा कम कुल आय रहने से बजट घाटा दो वर्षों में 5 फीसदी से बढ़कर 15 फीसदी हो गया। वर्ष 2019 में सरकार के दोबारा सत्ता वापसी पर टैक्स दरों में कटौती विशेषकर वैट की दर को पंद्रह फीसदी से घटाकर आठ फीसदी करने से सरकारी खजाने में साठ हजार करोड़ रुपए का भारी नुकसान हुआ। विदेशी व्यापार योग्य उत्पादों की अपर्याप्तता से विदेशी भुगतान में चालू खाता घाटा भी लगातार बढ़ता गया, आज व्यापार घाटा बढ़कर दस बिलियन डॉलर है। रही-सही कसर महामारी में श्रीलंका की अर्थव्यवस्था का सबसे प्रमुख उद्योग पर्यटन उद्योग, जो जीडीपी में अमूमन दस फीसदी हिस्सा रखता है, के चौपट होने से कमाई एवं रोजगार के मौके गायब हो गए। विदेशी भुगतानों में तेज गिरावट से अर्थव्यवस्था का संकट बढ़ा। सरकार द्वारा इससे उबरने हेतु अत्यधिक मुद्रा छापने के उपाय अपनाने से महंगाई में इजाफा हुआ एवं श्रीलंका की मुद्रा का अवमूल्यन हुआ। सरकार ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए जुलाई 2021 में तुगलकी फरमान जारी करते हुए रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के उपयोग पर पूरी तरह से रोक लगा दी। चीन से आयातित जैविक उर्वरकों की घटिया किस्म से देश के प्रमुख कृषि उत्पादों में लगभग पचास फीसदी गिरावट से स्थितियां बदतर हो गई। ऊपर से सरकार ने पॉम आयल के आयात पर रोक लगाकर खाद्य तेल की कमी भी पैदा कर आम आदमी की दुश्वारियां बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
श्रीलंका सरकार की कोशिशें अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने एवं अपने निर्यात में विविधता एवं वृद्धि लाने में विफल रही। विदेशों से प्राप्त अल्पकालीन ऋणों को वित्तीय तरलता बनाए रखने एवं व्यापक आर्थिक नीति को बढ़ावा देने के अलावा शिक्षा, बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य सेवा में लगाया गया। बांड एवं महंगी अल्पकालिक विदेशी कर्ज के जरिए विकास दर बनाए रखने की वजह से श्रीलंका का अंतरराष्ट्रीय सम्प्रभु बांड 12.35 बिलियन डॉलर हो गया, जो कुल ऋण का लगभग 37 फीसदी है। अप्रैल 2021 तक श्रीलंका का विदेशी कर्ज 35 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। विदेशी मुद्रा भंडार वर्ष 2019 में 7.5 बिलियन डॉलर से घटकर जुलाई 2021 में 2.8 बिलियन डॉलर तथा वर्तमान में 2.31 बिलियन डॉलर रह गया, जबकि विदेशी कर्ज पौने दो सौ फीसदी तक बढ़ गया। वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष इसके सम्प्रभु बांड परिपक्व होंगे, जबकि इसी वर्ष जुलाई तक एक बिलियन डॉलर सहित कुल मिलाकर इस वर्ष चार बिलियन डॉलर का कर्ज चुकाना है। इससे मौजूदा विदेशी मुद्रा भंडार आधा रह जाएगा, जो एक महीने के आयात के लिए भी नाकाफी होगा। स्पष्ट है कि सार्वजनिक कर्ज का बोझ सरकार की भुगतान क्षमता के बाहर है। विदेशी मुद्रा भंडार में तेज गिरावट एवं ऋण कुप्रबंधन ने अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट एजेंसियों को श्रीलंका की रेटिंग घटाने को मजबूर कर दिया।
जहां एक तरफ विदेशी मुद्रा भंडार अल्पकालीन देयताओं को पूरा करने में असमर्थ हैं, रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण क्रूड की बढ़ती कीमतों ने स्थिति और भी अधिक बिगाड़ दी। मार्च में, मुद्रास्फीति में 17.5 फीसदी हो गई, जो वर्ष 2015 के बाद सबसे अधिक है। खाद्य पदार्थों में तो यह महंगाई 25.7 फीसदी हो गई। भयावाह महंगाई एवं रोजमर्रा की किल्लत से सरकार सहित आम आदमी की दुश्वारियां बढ़ गई। श्रीलंका में ऋण एवं जीडीपी का अनुपात वर्ष 2019 में 94 फीसदी से बढ़कर खतरनाक 120 फीसदी हो गया, जिसका कभी भी 60 फीसदी से अधिक होना चिंताजनक होता है। आश्चर्य नहीं होगा कि श्रीलंका अपने बकाया विदेशी दायित्वों से चूक जाए। खाद्य पदार्थों एवं ईंधन के आयात हेतु पर्याप्त भुगतान नहीं होने के कारण श्रीलंका गहरे राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल में है।
श्रीलंका के वर्तमान हालात को देखते हुए जानकार भारत को सावधान रहने की हिदायत दे रहे हैं। कुछ जानकार भारत में प्रतिस्पर्धी राजनीति में सस्ते लोक-लुभावन वादों से बचने की सलाह दे रहे हैं तो कुछ बढ़ती महंगाई एवं रोजगार के अवसरों में कमी का हवाला दे रहे हैं। भारत की संघीय व्यवस्था में वित्तीय अनुशासन की कमी से समग्र आर्थिक प्रबंधन को दुरुस्त करने की सलाह दे रहे हैं। प्रतिस्पर्धी लोकशाही में अंतहीन मुफ्त सुविधाएं वित्त व्यवस्था में अकसर तनाव पैदा करते हैं। चिंता स्वाभाविक है, सतर्कता भी जरूरी है।
बारीकी से देखें तो भारत की आर्थिक स्थितियां तथा बेहतर समष्टि आर्थिक प्रबंधन ऐसी किसी भी संभावना को खारिज करते हैं। महामारी में कृषि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देती रही। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष एवं विश्व बैंक की हालिया रिपोर्टों में मुफ्त अनाज योजना गरीबी कम करने में कामयाब दिखी है। आर्थिक सुधारों के निरंतर प्रयासों से रोजगार के अवसरों की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। भारतवर्ष के विदेशी व्यापार के आंकड़े रिकार्ड स्तर पर हैं। पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार भारत को किसी भी भुगतान संकट से आश्वस्त कर रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण अस्थिर वैश्विक माहौल के बावजूद भारत की आर्थिक विकास दर अनुमान के करीब ही है।
दिक्कतें भी हैं, आबादी के अनुसार रोजगार अवसरों को बढ़ाने में असमर्थता, बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण एवं आर्थिक विकास दर बरकरार रखने की चुनौतियां सरकार की परेशानी का सबब हैं। केंद्र सरकार के विशेषज्ञ दल ने 2022-2023 तक संचयी सरकारी ऋण को सकल घरेलू उत्पाद के 60 फीसदी, केंद्र के लिए 40 फीसदी और राज्यों के लिए 20 फीसदी की सीमा निर्धारित की है। हालांकि, गुजरात में 21.4 फीसदी एवं महाराष्ट्र में 20.4 फीसदी सहित कुछ राज्यों को छोड़कर अधिकांश राज्यों के आंकड़े 20 फीसदी के करीब हैं। राज्यों में राजस्व के कमी की समस्या बनी हुई है। राज्यों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर खर्च करना होता है, महामारी के संकट ने इन पर खर्च बढ़ा दिया है। इस वजह से कई राज्यों का कर्ज बोझ 15 साल के उच्चतम स्तर पर है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने भले ही श्रीलंका जैसे आर्थिक संकट की संभावना न हो, परन्तु देश के संघीय स्वभाव एवं समष्टि आर्थिक प्रबंधन में किसी भी कोताही से बचना जरूरी है। भारत एवं श्रीलंका की आर्थिक परिस्थितियां तथा संभावनाएं भिन्न हैं। भारत इक्कीसवीं सदी को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में भी उभरना है। केंद्र सरकार को अपनी संभावनाओं को भी तलाशना होगा, साथ ही राज्यों को भी वित्तीय संकट से बाहर निकलने के रास्ते तलाशने होंगे, आखिरकार, भारतवर्ष राज्यों का संघ भी तो है।
(लेखक विक्रम विवि में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर हैं)