चमत्कार की आस में सत्ता के लिए छटपटाती कांग्रेस
   Date25-Apr-2022

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डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
2014 के बाद कांग्रेस का ग्राफ जिस तेजी से गिरा, उस तेजी से देश के किसी राजनीतिक दल यहां तक कि क्षेत्रीय दलों का भी नहीं गिरा। एक राष्ट्रीय दल का धीरे-धीरे इस तरह का पराभव बहुत कुछ कहता है। कांग्रेस जिसने देश में 60 वर्षों तक एकछत्र राज किया हो, का ऐसे पराभव से उसके नेताओं का विचलित होना स्वाभाविक है। इन 8 सालों में कांग्रेस ने बहुत से प्रयोग किए, कई क्षेत्रीय दलों से गठजोड़ कर अपने अस्तित्व को बचाने का प्रयत्न किया, किंतु उसे निराशा ही हाथ लगी। अभी हुए पांच राज्यों के चुनावों में उसकी जो दुर्गति हुई, वह चिंताजनक ही कही जाएगी। गोवा और पंजाब में वह ना केवल पिछड़ गई, बल्कि पंजाब भी उसके हाथ से निकल गया। उत्तरप्रदेश में प्रियंका गांधी को कांग्रेस ने कमान सौंपी, उम्मीद थी कि कुछ अच्छा कर पाएंगी, लेकिन वहां भी परिणाम ढाक के तीन पात ही रहे, फलत: कांग्रेस की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। वह किसी ऐसे करिश्मे की तलाश में है, जो उसे इस जलालत भरी स्थिति से उबार सके।
यही कारण है कि उसने ना चाहते हुए भी एक बार फिर चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर पर भरोसा करने का मन बनाकर आगे बढऩा स्वीकार किया है। प्रशांत किशोर पिछले 8 वर्षों से बराबर चर्चा में रहे हैं। उनके कई राजनीतिक दलों से खट्टे-मीठे संबंध हैं। 2014 के चुनाव में पीके ने भारतीय जनता पार्टी के लिए रणनीति बनाई थी। भाजपा ने चुनाव में 263 सीटें जीतकर कांग्रेस की यूपीए सरकार को सत्ता से बेदखल करने का कारनामा कर दिखाया था, जिसका श्रेय नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व और अमित शाह की रणनीति को जाता है, जिसमें पीके के योगदान को शामिल किया जा सकता है, लेकिन पीके को यह गुमान हुआ कि उनकी रणनीति के बिना भाजपा यह करिश्मा नहीं कर सकती थी, जिसके परिणामस्वरूप भाजपा और पीके के बीच मतभेदों के चलते भाजपा ने पीके से अपना नाता तोड़ लिया। हालांकि पीके का यह भ्रम 2019 के लोकसभा परिणाम जिसमें भाजपा को 303 सीटों पर जीत मिली, से दूर हो गया होगा। पीके बाद के इन 8 सालों में अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ काम करते रहे हैं, जिनमें बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की पार्टी आम आदमी और बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी के साथ काम कर सकारात्मक परिणामों के चलते उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा कुलांचें मारने लगी। पीके को जब से नीतीश कुमार ने चुनावी रणनीतिकार के प्रोफेशनल तमगे से हटाकर जदयू के उपाध्यक्ष का पद दिया, तब से उनके मन में राजनीति में सक्रिय होने की इच्छा प्रबल हो गई और वह पिछले एक साल से इस प्रयत्न में थे कि कांग्रेस उन्हें कोई अच्छा पद दे तो वह उसके लिए काम कर संकटमोचक की भूमिका निभाने को तैयार हैं। हालांकि पीके की 2017 में कांग्रेस के साथ उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों में रणनीति बुरी तरह फ्लॉप हो चुकी है। 2017 में पीके ने प्रियंका गांधी को कांग्रेस का चेहरा बनाने की सलाह दी थी, लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं की आपत्ति के बाद ऐसा संभव नहीं हुआ, क्योंकि कांग्रेस की प्रथम पंक्ति के नेता प्रियंका को राजनीति का ट्रंप कार्ड मानकर चल रहे थे। पार्टी के अधिकांश नेता इस मत के थे कि जब भी प्रियंका को राजनीति के मैदान में उतारा जाएगा, वह सभी राजनीतिक दलों को पछाड़कर सत्ता का वरण करने में सक्षम होंगी, लेकिन उनकी यह खुशफहमी 2022 के विधानसभा चुनावों में काफूर हो गई। 2017 में जब पीके प्रियंका को चेहरा ना बना सके तो उनके कहने पर कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा, लेकिन परिणामों ने कांग्रेस की न केवल भद्द पिटवा दी, बल्कि सपा जैसे क्षेत्रीय दलों ने भी उससे दूरी बनाने में ही अपना भला समझा। उसका परिणाम यह है कि अभी के उप्र चुनावों में सपा ने छोटे-छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और परिणामों में भले ही वह सत्ता प्राप्त नहीं कर सकी, लेकिन 100 से अधिक सीटों पर विजयी हुई, जबकि कांग्रेस का पराभव और अधिक गहरा गया। 2017 के पीके प्रयोग से कांग्रेस विचलित नजर आती है, लेकिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी और पश्चिम बंगाल में टीएमसी को पीके मार्गदर्शन से मिले अच्छे परिणाम से प्रभावित होकर और कुछ अच्छा कर पाने की प्रत्याशा में कांग्रेस दोबारा पीके की तरफ आकर्षित हुई है, जो चुनावों में अच्छे परिणामों के लिए अपनी रणनीति बता रहे हैं। हालांकि कांग्रेस नेता पीके के मामले में बंटे हुए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नहीं चाहते कि पीके बड़ा ओहदा हासिल कर लें, जिससे उनके प्रभाव में कमी आए, लेकिन प्रियंका और राहुल एक बार फिर पीके को आजमाना चाहते हैं। पीके के समर्थन में प्रियंका ने वरिष्ठ नेताओं को कहा कि हर किसी ने अपनी कोशिश की और असफल रहा। वह (पीके) कुछ नया करना चाहता है, इसलिए हमें उसे एक मौका देना चाहिए। ऐसे में जब कांग्रेस के प्रथम परिवार का समर्थन पीके को मिल रहा हो तो फिर किसी कांग्रेसी नेता के विरोध का सवाल नहीं रह जाता। यही कारण है कि पिछले दिनों पीके ने कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से अपनी रणनीति का खुलासा किया। उन्होंने विगत दिनों में लगभग 6 बार सोनिया गांधी से भेंटकर पार्टी को हार के दलदल से उबारने के लिए 52 पेज का प्रेजेंटेशन दिया है, जिसमें उन्होंने पुन: प्रतिष्ठा दिलाने के लिए पार्टी को पुराने सिद्धांतों पर वापस आने, स्थायी पार्टी अध्यक्ष नियुक्त करने, पार्टी की कम्युनिकेशन व्यवस्था में बदलाव करने, गठबंधन से जुड़े मुद्दों को सुलझाने और जमीनी कार्यकर्ताओं को मजबूत करने की सलाह दी है। निश्चित ही यह ऐसे मुद्दे हैं, जो सैद्धांतिक तौर पर लुभाते हैं, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व और उनके नेता कितना अमल करेंगे, कहा नहीं जा सकता। यही नहीं, पीके ने अपने प्रेजेंटेशन में 4 एम फार्मूले पर जोर देकर कहा कि यदि मैसेज, मैसेंजर, मिशनरी और मैकेनिक्स को दुरुस्त कर लिया जाए तो पार्टी जनग्राही हो सकती है। यूं ये सब बातें बहुत लुभाती हैं, पर जनता में कांग्रेस की वर्तमान गिरी हुई साख में कितना सुधार होगा, कहा नहीं जा सकता। सच्चाई तो यह है कि कांग्रेस हर उस व्यक्ति से सहयोग चाहती है, जो उसे जमीन से उठाकर बैसाखियों की जगह खुद के पैरों पर खड़ा कर सके। हकीकत तो यह है कि पीके सपने बेच रहे हैं और कांग्रेस उन्हें खरीदने को बेताब है। पीके कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी लोकप्रिय हैं, लेकिन उन्हें हराया नहीं जा सकता, यह धारणा गलत है, क्योंकि कांग्रेस के मौजूदा स्वरूप से मोदी को पराजित नहीं किया जा सकता। मोदी को हराने के लिए रणनीति बदलनी पड़ेगी। यदि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री का चेहरा बनाना है तो कांग्रेस अध्यक्ष का पद गांधी परिवार से बाहर किसी व्यक्ति को देना होगा। इसे प्रथम परिवार कितना स्वीकार करेगा, यह देखने वाली बात होगी, क्योंकि सोनिया गांधी राहुल को प्रधानमंत्री तो बनवाना चाहती हैं, किंतु अध्यक्ष पद पर बाहरी व्यक्ति आसीन हो, इस पर वे कितनी सहमत होंगी, नहीं कहा जा सकता। तो वहीं राहुल गांधी की विश्वसनीयता और उनके विजन पर जनता कितना भरोसा करेगी, कहा नहीं जा सकता, क्योंकि उनकी छवि एक अगंभीर, गैरजिम्मेदार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर कमजोर जानकारी वाले नेता की है, जो प्रधानमंत्री जैसे पद के लिए उचित नहीं है। उनका हाल का एक बयान कि वे सत्ता के बीच पैदा हुए, लेकिन उन्हें न तो सत्ता में कोई रुचि है और ना राजनीति में। ऐसे व्यक्ति को जनता प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कैसे कर सकती है। पीके भाजपा के हिन्दुत्व के एजेंडे का प्रतिरोध करने के लिए अपनी रणनीति बनाते हुए कहते हैं कि 50 प्रतिशत हिन्दू भाजपा के साथ हैं, लेकिन 50 प्रतिशत तो भाजपा के साथ नहीं, जिन्हें कांग्रेस से जोडऩे का प्रयत्न करना चाहिए, लेकिन पीके यह भूल जाते हैं कि जो 50 प्रतिशत हिन्दू भाजपा से जुड़े नहीं हैं, वे क्षेत्रीय दलों में बंटे हुए हैं। वे सब के सब अपनी प्रतिबद्धता तोड़कर कांग्रेस के साथ आ जाएंगे, संभव नहीं। पीके यह भी बताते हैं कि कहां कांग्रेस को दूसरे दलों से गठजोड़ करना चाहिए।
(लेखक सेवानिवृत्त समाजशास्त्र प्राध्यापक)
और कहां एकला चलो की नीति पर चलना चाहिए, लेकिन वे भूल जाते हैं कि आज की स्थिति में क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस से गठजोड़ के प्रति कई राज्यों में मोहभंग हो चुका है। क्षेत्रीय दल अपनी ताकत को कांग्रेस से कई गुना मानते हैं तो फिर वह गठजोड़ करने को क्यों आगे आएंगे। पीके कांग्रेस को सलाह देते हैं कि उसे भी ऐसी लोक-लुभावन योजनाएं देनी चाहिए, जिन्हें देकर भाजपा ने एक मजबूत लाभार्थी वर्ग खड़ा कर लिया है। विगत वर्षों में कांग्रेस ने यह सब करके भी देख लिया, लेकिन नतीजा पक्ष में रहा नहीं। पीके कांग्रेस को उसके कथित राष्ट्रवादी विचार और राष्ट्र के प्रति समर्पण पर वापस लौटने का सूत्र बताते हैं, लेकिन कांग्रेस ऐसा इसलिए नहीं कर पाएगी, क्योंकि वह मुस्लिम तुष्टिकरण को छोडऩा नहीं चाहेगी। राष्ट्रवाद और तुष्टिकरण की नीति एक साथ चलना संभव नहीं है। ऐसी और बहुत-सी बातें हैं, जिन पर पीके अपने सैद्धांतिक फार्मूले को क्रियान्वित करना चाहते हैं, लेकिन व्यवहारिक धरातल पर वह कितना संभव होगा और कितनी सफलता दिलाएगा, कहा नहीं जा सकता। निश्चित ही कांग्रेस पीके के मोहजाल में जाने का बहुत जल्दी निर्णय कर लेगी, लेकिन अभी न केवल 2024 बल्कि 2029 में भी उसकी संभावनाएं बहुत धूमिल दिखाई देती हैं। कोई चमत्कार हो जाए, वह अलग बात होगी।