हम प्रकृति के किराएदार हैं, मालिक नहीं -सिंधिया
   Date29-Dec-2022

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स्वदेश समाचार ठ्ठ उज्जैन
हम जल संरक्षण की बात को मूल्यों से जोड़ें अपनी जिम्मेदारी को समझें और इसे अपना धर्म माने तभी इस संगोष्ठी की सार्थकता सिद्ध होगी। हम प्रकृति के किरायेदार है, मालिक नहीं। प्रकृति स्पर्धा का विषय नहीं है संघर्ष का विषय नहीं है यह समन्वय का विषय है। भारतीय जीवन शैली प्रकृति के साथ समन्वय करने का संकेत देती है भारत ने अब तक जितने भी सेटेलाइट छोड़े हैं वह ज्ञान के लिए हैं।
उज्जैन में गुरुवार को उक्त प्रखर बातें तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय जल संगोष्ठी के समापन अवसर पर श्री भैयाजी जोशी एवं मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कही। मालगुड़ी डेज परिसर में आयोजित इस व्याख्यानमाला के अंतिम दिन के अंतिम सत्र का शुभारंभ अतिथियों ने वेद मंत्रों के बीच आम के वृक्ष पर जलार्पण कर किया। उक्त संगोष्ठी दीनदयाल शोध संस्थान और मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई थी। इस दौरान मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद की पत्रिका का विमोचन भी किया गया और अतिथियों को स्मृति चिन्ह भी प्रदान किए गए। 
307 विशेषज्ञों ने भाग लिया - दीनदयाल शोध संस्थान के मृगेंद्र सिंह ने 3 दिवसों का संक्षिप्त विवरण रखते हुए कहा कि इन तीनों दिनों में 307 विशेषज्ञों ने भाग लिया और 97 विषय विशेषज्ञ ऐसे थे जिन्होंने अपना प्रस्तुतीकरण दिया। 10 से अधिक अलग-अलग सत्रों के माध्यम से जल तत्व पर चर्चा की गई। यह प्रयास अपने पूर्णता की ओर जाए ऐसा प्रयास किया जा रहा है।
रामचरित मानस में जल तत्व की
भूमिका समाहित-अनुपम मिश्र
मणिपुर विश्वविद्यालय के कुलपति एवं मशहूर पर्यावरणविद डॉ. अनुपम मिश्र ने कहा सुजलाम के माध्यम से तीनों दिनों तक जल विषय पर अमूल्य जानकारी एक दूसरे से साझा की गई। यहां विद्वानों ने भारतीय प्रज्ञा में जल तत्व की महिमा का विस्तार से वर्णन किया, साथ ही रामचरित मानस में जल तत्व की भूमिका को भी समाहित किया, जल संबंधी विभिन्न तथ्यों पर विमर्श किया गया। वर्तमान शिक्षा नीति में जल तत्व को कैसे शामिल करें यह भी विमर्श विद्वानों के माध्यम से किया गया। जल संवर्धन और जल संरक्षण को अपने दैनिक जीवन के आचरण में किस प्रकार लाएं यह विषय भी विशेषज्ञों ने संवाद में एक-दूसरे के मध्य रख विमर्श किया।