सर्वांग शिक्षा के लक्ष्य का दुर्गम मार्ग...
   Date06-Nov-2022

parmar shakti
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी मौलिक आवश्यकता को लेकर दिल्ली जैसे केन्द्र शासित राज्य को मॉडल मानकर अन्य किसी राज्य का कदम बढ़ाना समझदारी नहीं है.., क्योंकि दिल्ली की जनसंख्या, कार्यक्षेत्र, विस्तार, आवश्यकताओं की पूर्ति, निगरानी एवं हर तरह का प्रबंधन भिन्न हैं.., मप्र, उप्र जैसे बड़े राज्यों अथवा छग, बिहार, झारखंड के सुदूर दुर्गम क्षेत्रों में
दिल्ली की भांति शिक्षा-स्वास्थ्य की व्यवस्था
करना आसान नहीं है...
भारत में करीब साढ़े तीन दशकों के बाद नई शिक्षा नीति की कार्ययोजना धरातल पर तेजी से आकार लेने लगी है... ऐसे में कई राज्यों में आमूलचूल परिवर्तन का दौर चल रहा है... कोई सबको सर्वांग, गुणवत्तापूर्ण एवं मुफ्त शिक्षा का भागीरथी बीड़ा उठा रहा है, तो कोई पाठ्यक्रमों में भारतीयता, नैतिकता, रचनात्मकता एवं कौशल के साथ मातृभाषा को पुनस्र्थापित करने की जद्दोजहद कर रहा है... तो कोई शिक्षा को संस्कारों की पाठशाला मानकर उसमें पढ़ रहे बच्चों को एक राष्ट्रनिष्ठ एवं समाजसेवी नागरिक के रूप में ढालने वाली सुधारवादी टकसाल के लिए प्रयासरत है... स्वाभाविक रूप से ऐसे ही प्रयासों से लक्ष्य प्राप्ति के द्वार भी खुलेंगे...
देश के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश ने गत 29 अक्टूबर को विश्वस्तरीय शिक्षा सबको उपलब्ध करवाने के लिए 2519 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले 69 'सीएम राइज विद्यालयोंÓ का भूमिपूजन किया है... इन स्कूलों की प्राथमिकता एवं उद्देश्य 21वीं सदी के मान से कौशल विकास कार्यक्रम को बढ़ावा देकर बच्चों में नैसर्गिक रूप से विद्यमान कला, कुशलता के गुणों को तराशने की समस्त पाठ्येत्तर गतिविधियां शामिल रहेंगी... शिक्षा के क्षेत्र में सीएम राइज स्कूल एक क्रांतिकारी पहल माना जा सकता है... क्योंकि जब बेहतर बुनियादी ढांचा, हर छात्र के लिए परिवहन सुविधा, स्मार्ट क्लासेस, सर्वसुविधायुक्त प्रयोगशाला, समृद्ध पुस्तकालय, आवास एवं भोजन समेत सभी सुविधाएं शिक्षा परिसरों में उपलब्ध रहेंगी तो विद्याध्ययन के लिए पहुंचने वाली पौध के सर्वांग विकास का मार्ग भी प्रशस्त होगा... सीएम राइज में मप्र में कुल 9200 विद्यालय खुलेंगे और प्रथम चरण में 1500 करोड़ से 350 विद्यालय विकसित होंगे.., लेकिन इस सर्वांग शिक्षा का मार्ग दुर्गम है और चुनौतियां भी अनेक हैं...
जिस सीएम राइज स्कूल योजना की पहल आज मप्र सरकार कर रही है, इसका खाका तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समविचारी संगठन विद्या भारती ने इंदौर में दो दशक पूर्व 'केशव विद्यापीठÓ के रूप में खींच दिया था... जिसमें बच्चों के लिए सीएम राइज से भी उच्चतम कार्ययोजना बनाकर अष्ठकोणीय अध्ययन कक्ष, पूरे परिसर की गोबर से लिपाई, मौन भोजन ग्रहण करने से लेकर नैतिक व कार्यकौशल के मान से शिक्षा संस्कार का अधिष्ठान प्रारंभ हुआ... उस विचार को इतने विलंब से अमल में लाना सही मायने में विचार की राह को कुंद करने या फिर कहें कि राज्य को दो दशक पीछे ले जाने जैसा ही है... लेकिन जब जागो, तब सबेरा की भांति अगर अब भी पहल हुई है तो इस पर व्यापक दृष्टि के साथ इसका गहन प्रबंधन व निगरानी तंत्र की सख्ती जरूरी है... क्योंकि देशभर में जवाहर नवोदय विद्यालय आवासी शिक्षा के प्रसिद्ध केन्द्र ऐसे ही नहीं बन गए, यही नहीं, मल्हार आश्रम जैसे नामी स्कूलों को अपनी पहचान बनाने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ा है... क्या इसके लिए सीएम राइज विचार के प्रणेता एवं उस पर अमल करने वाला पूरा तंत्र तैयार है..? क्योंकि मध्यप्रदेश ने शिक्षा के मामले में आजादी के बाद अनेक दौर देखे हैं... प्राचीन भारत की शैक्षणिक-सांस्कृतिक राजधानी उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में प्रभु श्रीकृष्ण स्वयं विद्याध्ययन के लिए पधारे थे... बाद में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की नगरी इंदौर ने औद्योगिक के साथ शैक्षणिक राजधानी के तमगे को बड़ी शालीनता के साथ संभाला है... मप्र में ऐसे दौर भी आए हैं, जब शिक्षा व्यवस्था में कामगार-मजदूरी वाले फार्मूले जैसे शिक्षाकर्मी, संविदा शिक्षक, गुरुजी भी सियासतदानों ने अपनाए हैं... फिर शैक्षणिक परिसरों में जिस तरह के अभावों एवं परेशानियों से शिक्षकों को दो-चार होना पड़ा, वह अलहदा विषय है, लेकिन अब बहुत कुछ सुधर चुका है...
मध्यप्रदेश अब बीमारू राज्य के कलंक से मुक्त होकर शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार, तकनीक, कौशल विकास एवं सर्वांग शिक्षा की मजबूत नींव रखने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है...'सीएम राइज विद्यालयÓ इसी पहल की एक मजबूत कड़ी है... इस राह में चुनौतियां विकट हैं, लेकिन बिगड़ी शिक्षा व्यवस्था में सुधार का मार्ग भी यहीं से प्रशस्त होगा... क्योंकि भारतीय संस्कृति, संस्कारों के साथ नागरिकता संस्कार, ज्ञान एवं कौशल के साथ जिला, विकास, संकुल और गांव के स्तर पर यह चतुर्थस्तरीय सीएम राइज स्कूल योजना एक साथ दो से तीन हजार विद्यार्थियों को शैक्षणिक के साथ गैर शैक्षणिक एवं खेलकूद संस्कृति को भी वरीयता के साथ आगे बढ़ाएगी... 15 किमी परिधि की आबादी की पहुंच के बीच एक सीएम राइज विद्यालय बच्चों के सर्वांगीण विकास की संरचना का अद्भुत उदाहरण है... लेकिन क्या यह पूरे प्रदेश में संभव है..? क्योंकि जब वर्तमान सरकारी स्कूलों को हमने आदर्श, उत्कृष्ट जैसे अनेक प्रयोगों से गुजारने के बाद भी शिक्षा व्यवस्था में सुधार का कोई स्थायी खाका खींचने में सफलता नहीं पा सके... तो क्या सीएम राइज योजना की निगरानी और प्रबंधन इतना आसान है..? अगर इन चुनिंदा स्कूलों के लिए बजट की अचानक इतनी भारीभरकम व्यवस्था आसान है, तो शहरों, कस्बों और विकासखंड स्तर के तथाकथित आदर्श, उत्कृष्ट विद्यालयों की शिक्षा एवं परिणामों का स्तर सुधारने में हमने दो दशक क्यों गंवा दिए..? क्या मध्यप्रदेश में विवादित व्यापमं व्यवस्थाओं के तहत भर्ती किए गए शिक्षक सीएम राइज स्कूल के मान से वैश्विक प्रतिस्पर्धा की चुनौतियों पर खरे उतरेंगे..? सर्वांग शिक्षा का स्वप्न दिखाने वाले 'सीएम राइजÓ के समक्ष सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि यहां के शिक्षक भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की भांति दिन-रात चुनाव, जनगणना, राशन, टीकाकरण के कार्य में लगाए जाएंगे..?