देश का कानून सर्वोपरि...
   Date02-Nov-2022

vishesh lekh
जब भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया तो उसने इस बात की स्पष्ट रूप से उल्लेखना है कि संवैधानिक दायरे में भारतीय कार्यनीति के अनूरूप देश का कानून ही सर्वोपरि माना जाएगा... किसी धर्म, पंथ की मान्यता या नियमों अथवा उपासना पद्धति की अवहेलना या अपमान का विषय नहीं है... बल्कि सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब हम किसी भी विषय पर चर्चा करते हैं या किसी मामले में नीतिगत रूप से निर्णायक स्थिति में आते हैं तो कानून के दायरे में ही सबकुछ संभव होता है... क्योंकि देश का कानून ही सबके लिए समान रूप से सम्मानीय है और उसके परिपालन में कोई कौताही नहीं बरती जा सकती है... कर्नाटक उच्च न्यायालय ने दो अलग-अलग मामलों में इस बात को स्पष्ट रूप से उल्लेखित कर दिया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ या फिर शरीयत का कानून कहीं पर भी देश के कानून के ऊपर हावी नहीं हो सकता... क्योंकि देश का कानून ही सर्वोपरि है... और यह व्यवस्था कर्नाटक न्यायालय ने दो अलग-अलग मामलों में स्पष्ट रूप से अपना मत प्रकट करते हुए दी है कि पॉक्सो अधिनियम और आईपीसी लड़कियों की शादी की उम्र के संबंध में किसी भी तरह के मुस्लिम पर्सनल लॉ कानून को ओवरराइड कर देता है... कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया है कि एक नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी 15 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद विवाह बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 का उल्लंघन नहीं माना जाएगा... क्योंकि जब भारतीय संविधान में कानूनन रूप से यह व्यवस्था है कि युवक या युवती की बालिग उम्र क्या है..? तो उसका पालन प्रत्येक धर्म और उसके अनुयायी को कानून के दायरे में रहकर करना ही होगा... क्योंकि जब कोई धर्म की आड़ लेकर कानून को धर्म के अधीन बताने की गुस्ताखी करता है, तब इसी तरह से मुस्लिम पर्सनल लॉ की बेढंगी बातें सामने आने लगती है... अगर इसको इस दिशा में इस बिन्दु से देखें कि कई बार मदरसों के जबरिया नियम-कानून न केवल शिक्षा-व्यवस्था को भंग करते हैं, बल्कि उसके उद्देश्य को भी अपवित्र करने का कारण बन जाते हैं, यही तो अब तक की गई कार्यवाही में उत्तर प्रदेश से लेकर कर्नाटक में सामने आया है कि मदरसों में पढ़ाई के बजाय ऐसी अनेक गैर गतिविधियां चलती है, जिन्हें शिक्षा के पाठ्यक्रम के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता... अभी गत दिनों दारूल उल्लम मदरसे की भी मान्यता संबंधी कोई प्रमाण नहीं मिले, जबकि मदरसे में पढऩे वाले बच्चों के लिए सरकारी स्तर पर सब्सिडी व अन्य सुविधाएं लेने का खेल लंबे समय से चल रहा है... कहने का तात्पर्य यह है कि जब आप संवैधानिक या लोकतांत्रिक व्यवस्था में काम करते हैं तो कानून के राज के तहत ही चलना होता है..
दृष्टिकोण
जिलास्तरीय निर्यातक केन्द्र...
आज पूरा विश्व एक ग्लोबल विलेज के रूप में तब्दील हो चुका है... अर्थव्यवस्था के मान से देखें तो डिजिटल तकनीक के कारण उत्पाद को बेचने-खरीदने तक ही बात अब सीमित न रह गई है, बल्कि उसकी गुणवत्ता से लेकर मात्रा तक में भी बढ़ोत्तरी व सुधार की संभावनाएं इसी तकनीक व प्रौद्योगिकी ने बड़ी आसान कर दी है... मौजूदा वैश्विक चुनौतियों के बीच इस बात की संभावनाएं तेजी से बढ़ी है कि किस तरह से स्थानीय उत्पाद को आम जनता और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी आबादी के बीच पहचाया जाए... क्योंकि स्वदेशी के साथ 'अपना देश-अपना उत्पादÓ का भाव भी तेजी से आकार ले रहा है... इसके चलते स्थानीय स्तर पर उत्पादों की मांग और उसकी आपूर्ति का सिलसिला भी तेजी से चल निकला है... देश के निर्यात में तेजी लाने के लिए अगले बजट में 50 नए निर्यात केन्द्र बनाने का केन्द्र सरकार ने ऐलान किया है... इसके तहत कुल 2500 करोड़ रुपए खर्च होंगे, यही नहीं प्रत्येक केन्द्र को 50 करोड़ रुपए मिलेंगे... इससे स्पष्ट रूप से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर निर्मित होंगे... क्योंकि जब जिला स्तर पर छोटे-छोटे निर्यात केन्द्र बनेंगे, स्थानीय वस्तुओं की आपूर्ति सहज-सरल और सुलभ होगी, तो न केवल उत्पाद की मांग बढ़ेगी, बल्कि आपूर्ति के साथ स्थानीय लोगों की अजीविका भी मजबूत होती चली जाएगी... जब जिला स्तर पर छोटे निर्यातक केन्द्र बनाए जाएंगे, तब इस पर 60 फीसदी राशि केन्द्र बाकी राशि राज्य खर्च करेगा... इस तरह से स्थानीय स्तर के छोटे कारोबारियों को अपना उत्पाद निर्यात करने या फिर अन्य जिलों से उत्पाद बुलवाने में सहायता होगी और इसका असर यह होगा कि निर्यात योजना के चलते आर्थिक विकास का क्रांतिकारी रूप से बदला हुआ स्वरूप सामने आएगा...