जीवन का अर्थ चेतना
   Date02-Nov-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
ए क दिन शरीर के पांचों तत्वों में झगड़ा हो गया। वे सब स्वयं को बड़ा बताने लगे, अन्यों को छोटा व तुच्छ। वायुतत्व बोला - 'मैं सबसे बड़ा हूं। मैं न होऊं तो नि:श्वास होकर मनुष्य का जीवन एक क्षण में ही समाप्त हो जाएगा।Ó पृथ्वी तत्व ने कहा- 'अरे! मुझ पर तो यह शरीर खड़ा हुआ। इंद्रियों का आकार न हो तो तुम सब अपनी अभिव्यक्ति कैसे कर सकोगे?Ó जल तत्व बोला - 'जीवन का आधार तो मैं ही हूं। रस न हो तो सब कुछ रसहीन हो जाएगा।Ó अग्नि तत्व ठहाका लगाते हुए बोला- 'अरे! मेरी क्षमता तथा महत्व का अनुमान तो तुम लगा ही नहीं सकते। मैं न रहूं तो यह शरीर क्षणमात्र में बर्फ हो जाए।Ó आकाश तत्व हेकड़ी से बोला- 'समस्त सूक्ष्मशक्तियों का संचालन तो मैं ही करता हूं, मैं न रहूं तो संसार खामोशी में डूबा समुद्र जैसा लगने लगेगा।Ó आत्मा ने चुपचाप शरीर छोड़ दिया। उन पांचों तत्वों को विवशतापूर्वक आत्मा के साथ शरीर त्यागना पड़ा। अब उनकी समझ में आया कि असली मूल्य तो चेतना का है। प्राण चेतना के हटते ही प्राणी शव में बदल जाता है।