भारत के भूगोल पर जातिवादी कैक्टस का सच
   Date02-Nov-2022

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प्रशांत चौबे
भा रत में जातिगत भेदभाव और छुआछूत को लेकर बड़ी बहस शुरू से रही है। इस संबंध में अनेक चर्चा ,परिचर्चा नियम, विधान प्रकाश में आए। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकरजी ने जातिगत भेद के विरुद्ध बड़ी लड़ाई वैचारिक सामाजिक और वैधानिक तौर पर लड़ी। इस योद्धा की लड़ाई का असर भी व्यापक तौर पर भारतीय समाज में दिखाई देता है। निश्चित तौर निंदनीय तथा घृणित कृत्य के रूप में आधुनिक भारतीय समाज ऐसी किसी भी भेदभाव पूर्ण भावना को अपने आधुनिक परिरूप में कोई स्थान नहीं देता। ज्यादातर पाश्चात्य एवं अन्य विदेशी चिंतकों ने इस बात पर भारत की निंदा करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा। यहां तक की अतिरेक रूप में यह प्रसारित करने का ही प्रयास किया ,की भारतीय जनमानस विभिन्न जातियों में बटा हुआ है तथा जातिगत तौर पर भेदभाव करने वाला समाज भारत में स्थापित हुआ है। यह स्वीकार करने में मुझे बिल्कुल भी गुरेज नहीं है की भारत में भेदभाव और छुआछूत की भावनाएं प्रदर्शित हुई है। लेकिन यह भी स्थापित तथ्य है कि भारतीय समाज ने इन भावनाओं का दृढ प्रतिरोध भी किया है।
पूरे विश्व में विभिन्न रूपों में भेदभाव की भावनाएं दृष्टिगोचर हो जाती है। नस्ल के आधार पर श्रेष्ठता बताना तथा इस आधार पर निंदा तथा हिंसा आदि भी बड़ी मात्रा में विश्व इतिहास में दर्ज है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी का होलोकास्ट नस्ली हिंसा का सबसे बड़ा ऐतिहासिक कलंक है जिसमें नस्ल आधारित हिंसा में 60 लाख यहूदियों की हत्या कर विश्वभर में इस नस्ल या प्रजाति के एक तिहाई जनसंख्या का ही नरसंहार कर दिया जाता है। रंग, वर्ण, रीति, नीति, जाति, धर्म, भाषा, मान्यता ,प्रतिमान अनेक आधारों पर भेदभाव के चिन्ह विश्व परिदृश्य में विभिन्न समय में दिखाई देते हैं। भारत में जातिवाद की भावनाओं ने भारत के विकास को न केवल बुरी तरह प्रभावित किया है बल्कि भारत की अखंडता तथा विजय भावना पर भी कुठाराघात किया है, ऐसा माना जाता है कि भारत में पुरातन काल से इस प्रकार की व्यवस्थाओं के अंश उपस्थित रहे है, सामान्य तौर पर वर्ण व्यवस्था मैं कुत्सित जाति व्यवस्था का रोपण कर दिया जाता है, यहां यह स्पष्ट रूप से जान लेना अतिआवश्यक है। भारत में वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित व्यवस्था थी ना कि जन्म आधारित विश्वामित्र से लेकर ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां कर्म के आधार पर वर्ण परिवर्तित हुए हैं इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि व्यक्ति अपनी कौशल ज्ञान तथा अध्ययन के आधार पर अपने व्यवसाय का परिवर्तन कर ले और यह परिवर्तन सामाजिक तौर पर स्वीकार्य हो भारत में शायद ही कोई ऐसी जातीय वर्ग होगा जिसने भारत के किसी हिस्से पर राज न किया हो नंद वंश से लेकर मौर्य शुंग तक हमें पूर्व भारत में अनेक जाति वर्ण के प्रतिनिधि शासक दिखाई देते हैं जॉन के ने अपनी किताब इंडिया ए हिस्ट्री के पेज नंबर 145 पर लिखा है कि बौद्ध तीर्थ यात्री फाह्यान जो भारत में 400 ईसवी में आया था उसने यह स्पष्ट उल्लेख किया है कि भारत में एक जाति को छोड़कर किसी भी जाति से भेदभाव नहीं किया जाता भेदभाव केवल मृत शरीरों की व्यवस्था संबंधी रोजगार से जुड़े लोगों से किया जाता है यहां जाति या वर्ण प्रथा को फाह्यान ने दमनकारी व्यवस्था नहीं बताया बल्कि भारत में सुख शांति के जीवन की परिकल्पना को साकार रूप में देखना प्रमाणित किया है फाह्यान के वर्णन में स्पष्ट उल्लेख है कि शुद्र और ब्राह्मण राजा जैसे कि सिंध का राजा उतनी ही संख्या में विराजमान थे जितने की क्षत्रिय वर्ण के जान के का स्पष्ट मत है कि भारत में वर्ण से उपजी जाति व्यवस्था में विकृतियों का मूल मुस्लिम शासन काल में तब पैदा हुआ जब धर्म के नाम पर भेदभाव और कर वसूली के कारण राजनैतिक आर्थिक परिपेक्ष में हिंदुओं की हिस्सेदारी विकास पथ पर कमजोर होने से जातियों ने अपने दायरे बंद करना शुरू कर दिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि जिस प्रकार से भारतीय हिंदू जातियों पर लंबे समय तक बाहरी आक्रांताओं के शासनकाल का प्रभाव रहा उसी परिपेक्ष में सामान्य तौर पर विभिन्न सामाजिक स्थितियों का विकास भी अपना स्थान ग्रहण करता। अपनी अस्तित्व को लेकर तथा अपनी और अपने पूर्वजों की स्थापित पहचान पर आए अस्तित्व संकट के भरत परिपेक्ष में प्रतिक्रिया स्वरूप एक निरपेक्षता का भाव यहां स्थान गण करता है विभिन्न लोग अपने सीमित दायरों में अपनी पहचान को बचाकर रखने के संघर्ष में जातिगत प्रतिमानो से बंधते दिखाई देते हैं यह संघर्ष कहीं ना कहीं आपसी रूट तथा सीमाओं की जकडऩ सा प्रतिबंधित होता है।
ऑस्ट्रेलियाई इतिहासकार एएल वेशम अपनी किताब द वंडर डेट बॉस इंडिया में उल्लेख करते हैं कि प्राचीन दुनिया में मनुष्य और मनुष्य के बीच मनुष्य और देश के बीच का रिश्ता उच्च कोटि की मानवीयता का हिंदुस्तान में ही देखने को मिला अन्य देशों के मुकाबले भारत में दास प्रथा भी अल्प थी। यह स्पष्ट है कि भारत में वर्ण शब्द का प्रयोग पहले प्रकाश में आता है और जाति शब्द का प्रयोग उसके अत्यधिक बाद में वर्ण का आधार रंग है या नहीं इस संबंध में मतांतर देखने को मिलता है सर्वप्रथम महाभारत में ही रंग के आधार पर विभिन्न वर्णों का विभेद प्रकाशित हुआ है, चार वर्णों में रंगों वाला अर्थ कहीं दिखाई नहीं देता। यद्यपि चार प्रकार के कामों के आधार पर विभेद भारत ही नहीं अन्य संस्कृतियों में भी दिखाई देते हैं। ईरान के प्राचीन समाज में 4 जातियां थी, यूनान के दार्शनिक प्लेटो भी 4 जातियों का उल्लेख करते हैं । यदि हम आज के परिपेक्ष में भी देखें तो यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन वर्गीकरण जो कि अनेक स्थानों पर प्रकाश में आता है के जैसे ही आज भी मुख्यता काम के 4 प्रकार ही स्थापित होते हैं- (1) विद्या, ज्ञान, ज्ञान प्रसार (2) राज, युद्ध , राजनीति (3) व्यापार, व्यवसाय, धन संबंधी गतिविधियां (4) सेवा संबंधी कार्य।
आज के तकनीकी एवं पूर्ण विकसित विज्ञान के दौर में किसी भी कार्य व्यवसाय को इनमें विभक्त किया जा सकता है। इसका आशय यह हुआ कि शुरू से ही मानव सभ्यता के कार्यों का वर्गीकरण चार प्रकारों में किया जा सकता है यही कारण है कि विभिन्न संस्कृतियों में इसके पद चिन्ह दिखाई देते हैं।
भारत मैं वैदिक काल में जो शुरुआत खासकर ऋग्वेद से होती है, ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में शूद्र शब्द का उल्लेख मिलता है लेकिन यह स्थापित तथ्य की पुरुष सूक्त बाद में जोड़ा गया। कालक्रम की दृष्टि से ऋग्वेद के बाद का कॉल इसमें उल्लेखित है लेकिन यहां भी शूद्र तिरस्कृत हो ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता है। छांदोग्य उपनिषद में रेक्ब ने जन श्रुति को वेद पढ़ाया था किंतु रेक्ब गाड़ीवान शू्द्र थे। डॉ. आंबेडकर ने कवश एलश को शूद्र बताया है यद्यपि एलश ऋग्वेद के दशम मंडल के कई मंत्रों के रचयिता थे। महा ऐतरेय उपनिषद के अनुसार भी कावषय लोग दासी पुत्रों के वंशज थे, किंतु वे यज्ञों के आध्यात्मिक रहस्य का उद्घाटन करते थे। भारद्वाज और कात्यायन स्रोत सूत्रों में संकेत है कि कई धर्मशास्त्र यज्ञ का अधिकार शूद्रों को भी देते थे राजा सुदास शुद्र थे। वैदिक परंपरा के अनुसार वे राजर्शी विश्वामित्र के संरक्षक थे।
अत: यह स्पष्ट है कि वेद काल में वर्ण व्यवस्था रही लेकिन किसी वण को हेय दृष्टि से देखना या ज्ञान कौशल के आधार पर किसी कार्य को करने से विरत करना यह वेद काल में नहीं था। मनुस्मृति एवं महाभारत में आर्यव्रत के बाहर के शक, यवन, पारद, चीन किरात, दारद, पोंड्र आदि जातियों के लोग वृषल कहे गए लेकिन वृषल से यज्ञ करा कर उन्हें आर्यव्रत में सम्मिलित कर देने की प्रथा यहां विद्यमान रही। जाति के बंधन से कार्य को स्थापित कर देने की प्रथा बाद में प्रचलन में आई। मनुस्मृति में किस प्रकार के उल्लेख है, जहां दूसरों का धंधा अपनाने वाले को जाति से पृथक बताया गया तथा इस बात पर जोर दिया गया की लोग अपने जातिगत मापदंडों पर स्थापित रहने को ही गौरव के रूप में जाने। इसके बावजूद लंबे समय तक भारत में वर्ण व्यवस्था बंधन तथा जन्म के आधार से मुक्त रही बड़ी संख्या में परिवर्तन भी प्रकाश में आते रहे । कालांतर में यह उच्च निम्न की भावना में परिवर्तित होने लगा यही इस व्यवस्था के नकारात्मक प्रभाव की स्थापना का मुख्य कारण रहा। सर्वप्रथम तो आर्यों ने जिनको जीता उनको शूद्र मान लिया फिर अनुलोम प्रतिलोम विवाह से भी इस प्रकार की भावना बलवती होती रही।
भारत में जाति व्यवस्था की स्थापना को सकारात्मक रूप में इस प्रकार स्थापित किया गया कि बहुत सारे बाहरी आक्रमण तथा संक्रमण से जो भी विविध प्रकार के लोग पुरातन आर्य समाज में मिलते गए उन्हें समाज एक जाति के रूप में एक स्थान प्राप्त होता रहा। लंबे समय तक यहां उल्लेखनीय है कि वैदिक काल से लेकर महाभारत काल तक जाति व्यवस्था में विभाजन तथा भेदभाव के पद चिन्ह दिखाई देते हैं ,लेकिन यहां ऊंच-नीच अस्पृश्यता, छुआछूत जैसी कुरीतियां उस रूप में बलवती होती प्रतीत नहीं होती। जयचंद्र विद्यालंकार लिखते हैं कि जात-पात की ठीक जात-पात के रूप में स्थापना 10 वीं शताब्दी ईस्वी में आकर हुई है और उसके बाद भी मिश्रण पूरी तरह बंद नहीं हो गया ।
शहाबुद्दीन गोरी के समय तक हम हिंदू जातो में बाहर के लोगों को सम्मिलित होते देखते हैं। सन 1178 ईस्वी में गुजरात के नाबालिग राजा मूलराज द्वितीय की माता से हार कर गौरी की मुस्लिम सेना का बहुत बड़ा अंश कैद हो गया था उनके दियों की दाढ़ी-मूंछ मडवा कर विजेताओं ने सरदारों को राजपूत में शामिल कर लिया था और साधारण सिपाहियों को अन्य में इस रूप में जातियों का आपसी मेल लगातार विदमान रहा है ।
(लेखक स्तंभकार हैं)
कालांतर में जब जाति की सीमाएं रूढ़ हो गई और श्रेष्ठता की होड़ गला काट स्थिति में पहुंच गई तब जातिवाद और जाति संघर्ष की स्थिति विकराल रूप में स्थापित हुई। धीरे धीरे श्रेष्ठता के प्रतिमान इस कदर प्रभावी हो गए की मानव अपने जैसे ही मानव से सिर्फ जाति, जन्म ,वंश के आधार पर अमानवीय घृणा करने लगा। इस प्रकार के नकारात्मक परिवर्तन के बहुत सारे प्रथक प्रथक कारण रहे हैं।
जैसे-जैसे भारत में जैन और बौद्ध मतों का प्रभाव प्रादुर्भाव हुआ वैसे वैसे शाकाहार की श्रेष्ठता को सर्वमान्य माना जाने लगा जिन् जातियों ने शाकाहार को अपनाकर जीव हिंसा को त्याग दिया वह समाज में श्रेष्ठ हो गई ।समानांतर रूप से जिन लोगों ने मांसाहार और जीव हिंसा को अपनी जीवन पद्धति से पृथक नहीं किया उनके हाथ का भोजन अग्रहण हो गया तथा छुआछूत की भावना ने जन्म लिया।
जातिगत भेदभाव मैं अनुलोम विलोम विवाह ने भी अपना योगदान दिया जब बाहर से आए जातियों के लोग और विविध रूप में यहां स्थापित लोगों के बीच अनुलोम विलोम विवाह संबंध स्थापित हुए तो प्रारंभिक तौर पर ऐसे विवाहों से उत्पन्न जनसंख्या अल्प मात्रा में थी तब तक तो वह लोग समाज में समानांतर रूप से अपना जीवन यापन करते रहे लेकिन जैसे ही यह संख्या बढ़ती गई इनका जाति के रूप में स्थापन होता गया ।यहां इनका समानांतर संघर्ष तथा इनके सामने के समाज का इनके महत्व को लेकर गतिरोध भी सामाजिक भेदभाव के रूप में प्रस्फुटित हुआ।
विभिन्न युद्ध के पश्चात हारने वाली सेना को बंदी बनाना तथा उन्हें बंधुआ मजदूरों की तरह समाज में हेय माने जाने वाले कार्यों में लगा के रखना भी जातिगत ऊंच-नीच का कारण बना हारी सेना को एक विशेष वर्ग के रूप में समाज में सेवा कार्यों में लगाने के कारण अनेक स्थानों पर अनेक जातियां स्थापित होती गई। कालांतर में इन्हें जातियों में स्थानापन्न तथा संख्या वृद्धि से इनका प्रसार होता गया लेकिन हारे होने की भावना तथा सेवा संबंधी कार्य करने और समाज में वृद्धि के अवसर प्राप्त ना होने के कारण कालांतर में यह जातियां भी छुआछूत की शिकार होती गई।
भारत में 10 वीं शताब्दी के बाद लगातार वाहरी आक्रांता ओं के आक्रमण तथा पराजय का सिलसिला चलता रहा विभिन्न राजधानियों में अपने शासक की पराजय तथा नगरों गांव में अक्रांता ओं की लूटपाट से स्थानीय जनसंख्या डरी सहमी सी हो गई जजिया कर जैसी व्यवस्थाएं एक तरफ धार्मिक संक्रमण की स्थिति पैदा कर रही थी वहीं दूसरी तरफ डर के मारे लोग अपनी मान्यताओं को बदल कर शासक का धर्म स्वीकार कर रहे थे ऐसे में स्थाई भावना वाले लोग जिन्होंने अपनी धार्मिक आस्था नहीं बदली वह अपने दायरे में ही सीमित अपनी आस्थाओं को सुरक्षित करने में लगे रहे ।ऐसे समूह भी कार्य विशेष के आधार पर क्षेत्र विशेष में विभिन्न जातियों के रूप में स्थापित होते चले गए उस समय के शासक आक्रांताओं ने भी जातिगत आधार पर ऊंच-नीच को प्रोत्साहन देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इससे उन्हें दौहरा फायदा हुआ एक तो उनका शासन बिना किसी खतरे के स्थापित रह सका दूसरा उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए उपयुक्त लोग आसानी से मिलते रहे।
स्वाभाविक तौर पर यहां समाज मैं बाहर से आए आक्रमणकारियों के हमले से आहत होकर कुछ बहुत अधिक न कर पाने की निराशा का भाव रहा जिसका प्रस्फुटन आंतरिक अंतर्द्वंददो के रूप में जातिगत भेदभाव और ऊंच-नीच के रूप में स्थापित होता गया। यहां अपने वंश को बिना कौशल उच्चता प्रदान करने का स्वार्थ भाव भी जातिगत दूरियों को बृहद से बृहदतर करता चला गया और ऊंच-नीच की भावना छुआछूत तथा अन्य अत्याचारों के रूप में परिलक्षित होती चली गई।
[16/10, 12:46 श्चद्व] क्कह्म्ड्डह्यद्धड्डठ्ठह्ल ष्टद्धशड्ढद्ग ्रह्यश्च: भारतीयता के मूल में जातिगत भेदभाव तथा ऊंच-नीच नहीं है आधुनिक भारतीय समाज इसे स्वीकार भी नहीं करता। आवश्यकता है आधुनिक समाज को गढऩे के लिए नई सोच के साथ आगे बढऩे की। आवश्यकता है डॉक्टर अंबेडकर के भेदभाव रहित समाज के सपने को साकार करने की। जैसे भी प्रादुर्भाव हुआ हो लेकिन अब पूर्ण विराम का समय है हम सभी भारतीय सारे भेदभाव को भूलकर कंधे से कंधा मिलाकर नए अधिक सशक्त तथा अधिक समृद्ध भारत का निर्माण करें।
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इंदौर में वर्तमान मास्टर प्लान 2021, अपना कार्यकाल पूरा कर चुका है।नए मास्टर प्लान की बातें होने लगी है ,जो कि बहुत देर से हो रही है। वास्तव में शहर के मास्टर प्लान को बनाने में बहुत समय लगता है ।और पिछला अनुभव यह बताता है कि 1975 का मास्टर प्लान जो 1990 मे ही,पूरा हो गया था। उसके बाद मास्टर प्लान बनाने की कार्रवाई शुरू की।1992 से लेकर 2005 के मध्य, दो बारा मास्टर प्लान बने और वह निरस्त हुए,किस ने किसी कारण से। और तीसरा मास्टर प्लान 2005-6 में बनकर शासन के पास गया और फिर 2008 से वो लागू हुआ। इस तरह इंदौर शहर 17-18 साल, बगैर मास्टर प्लान के रहा!! और इस घटना से भी हमने कुछ सीखा नहीं। 2021 का मास्टर प्लान की अवधि पूरी होने के बाद आज हम बात करने को भी तैयार नहीं है, ना ही कोई सरकारी स्तर पर इसके बारे में गंभीरता से कोई कार्य हो रहा है।सिफऱ् लोक लुभावनी बयानबाजी के। मुझे लगता है कि आज भी अगर गंभीरता पूर्वक विचार कर काम करे, तो कम से कम डेढ़ साल से लेकर 3 साल तो योजना को बनाने में लगेंगे। और इंदौर की जनता तब तक बेतरतीब विकसित होता रहेगा, और व्यवहारिक विकास रुकेगा।
किसी भी मास्टर प्लान को बनाने के लिये शुरूआत होती हे
1धारा 17- क ,में समिति का गठन होता है ।जिसमें महापौर, पंचायतों के अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष, सांसद, विधायक, विकास प्राधिकरण अध्यक्ष, सभी जनपद अध्यक्ष, गांव के सरपंच ,7 विशेषज्ञ नामित शासन के द्वारा ,ज्वाइंट डायरेक्टर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग आदी होते हे। डिपार्टमेंट के राय बनती है। उसका गठन अभी तक नहीं हुआ है। जो शुरूआत मास्टर प्लान के कार्य की कर सके, अधिकारियों के मार्गदर्शन में ही कार्य होता है।
2 इसके बाद में, दूसरा जो काम होता है, वह यह है कि जो वर्तमान में विकास योजना 2021 लागू है, उसमें हुए कार्यों का और कीए गए प्रस्ताव की, एक रिपोर्ट सामने आना चाहिए, कि प्रस्ताव के अनुसार कितनी भूमि का विकास हुआ है और कितने में प्रस्ताव के विपरीत विकास हुआ है ।विकास को मानचित्र में लाया जाना चाहिए, प्रतिशत के साथ में ।जिससे कि आगे क्या काम करना है यह आम जनता और समिति को मालूम हो। ओर इसकै बाद मूल कार्य शुरू होता है। अभी तो उपरोक्त कदम ही नही हुए हे।
इंदौर शहर को हम सब मिलकर जल्द से जल्द नया मास्टर प्लान दे पाना, वास्तव में एक बड़ी उपलब्धि होगी । इसी शासन के कार्यकाल में विकास योजना 2023 देना बहुत बड़ी उपलब्धि शहर और शासन की होगी।
अभी भी वक्त है गंभीरतापूर्वक प्रयास करने के इस बारे में।मुख्यमंत्रीजी के सपने के शहर को धरातल पे लाने का।
अतुल शेठ।