आत्मपरायण होना ही सच्चा सुख
   Date02-Nov-2022

dharmdhara
धर्मधारा
प रमात्मा का अंश होने के कारण जीव की आत्मा में अनंत शक्तियां, अनंत क्षमताएं निहित है, पर वे सोई हुई हैं। हमें योग व अध्यात्म की विविध साधनाओं के द्वारा अपनी आत्मा की उन्हीं अनंत शक्तियों को जाग्रत करना है। आत्मा की अनंत शक्तियों के जागते ही मनुष्य साधारण से असाधारण, नर से नारायण और मानव से माधव की ऊंचाई प्राप्त कर लेता है।
ऐसी स्थिति में वह ही सत्-चित्-आनंदस्वरूप हो जाता है। उसका जीवन आनंद, उमंग व उल्लास से भर उठता है। तब वह राग-द्वेष, हर्ष-विषाद, मान-अपमान, जीवन-मरण आदि द्वंद्वों से ऊपर उठ जाता है और साक्षी भाव से, द्रष्टा भाव से रहते हुए अनासक्त भाव से अपने कर्तव्य कर्म करता है। उसका जीवन ही आनंदित हो जाता है। अपने शरीर को नश्वर और अपनी आत्मा को परमात्मा का अंश मानते हमारी मनोदशा बदलने लगती है, जीवन-दृष्टि बदलने लगती है।
आत्मा की अनंत शक्तियों के जागते ही हमारे शरीर, मन, प्राण, बुद्धि आदि सभी दिव्य होने लगते हैं, ईश्वरमय होने लगते हैं। यह धरा ही हमारे लिए दिव्य धाम बन जाती है, स्वर्ग जैसी बन जाती है। इसलिए हम देहाभिमानी नहीं, आत्माभिनानी बनें। हम देहपरायण नहीं, आत्मपरायण जीवन जिएं, क्योंकि आत्मपरायण जीवन से ही मिलता है सच्चा सुख, शाश्वत सुख। हम देह की उपासना नहीं, बल्कि देहरूपी देवालय में प्रतिष्ठित आत्मा की उपासना करें, परमात्मा की उपासना करें। हम देहाशक्ति छोड़ ईश्वरसमर्पित जीवन जिएं।