दूरगामी प्रभाव वाले तीन सुप्रीम फैसले...
   Date19-Nov-2022

parmar shakti
ब्रेक के बाद -----
शक्तिसिंह परमार
देश की सर्वोच्च न्याय पंचायत अर्थात् सुप्रीम कोर्ट ने समाज- राष्ट्र के विकास एवं समय के मान से उनमें आवश्यक संभावित सुधारों से जुड़े तीन अहम फैसले सुनाए हैं... गरीब सवर्णों को आरक्षण पर वैधानिक मुहर, जबरन धर्मांतरण को राष्ट्रघाती मानना और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को व्यवहार-सुधार का लाभ देकर जेल से रिहा करना... ऐसे सुप्रीम फैसले हैं, जिनका सकारात्मक-नकारात्मक दूरगामी प्रभाव निश्चित रूप से सामने आएगा... देश इसके लिए तैयार रहे..!
आजादी प्राप्ति के साथ हमने लोकतांत्रिक व्यवस्था हेतु जिस संविधान को आत्मसात किया था, वह हमारा मार्गदर्शक दस्तावेज है... राष्ट्र की प्रगति की प्रक्रिया का जो पहिया घूमता है और उसमें जो लोग पीछे छूट गए हैं, उनको साथ लेकर चलना ही राजसत्ता का लक्ष्य होना चाहिए... तभी तो समावेशी विकास होगा... 'सबका साथ-सबका विकास और सबका विश्वासÓ यही तो प्रत्येक सरकार का भाव होना चाहिए और है भी... तभी तो आजादी के बाद आरक्षण व्यवस्था को निश्चित समय के लिए अपनाया गया.., लेकिन वोटबैंक के चलते आरक्षण हमारी संवैधानिक मजबूरी का प्रतीक बन गया है..! सर्वोच्च न्याय मंदिर ने गरीब सवर्णों अर्थात् आर्थिक रूप से कमजोर (ईएसडब्ल्यू) वर्गों को नौकरी और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण देने के केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के कार्यपालिका के फैसले को वैधानिकता प्रदान कर दी... जिस परिवार की आय सालाना 8 लाख रु. से कम, कृषि योग्य भूमि पांच एकड़ से कम, आवासीय घर 1000 वर्गफीट से कम और अधिसूचित नगर पालिका में 100 गज से कम गैर अधिसूचित में 200 गज से कम प्लॉट वाले इस ईएसडब्ल्यू आरक्षण के हकदार होंगे... इसमें कोई दो राय नहीं कि आर्थिक रूप से गरीब सवर्णों को यह आरक्षण किसी भी तरह के संविधान के मूल ढांचे, समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता... सामाजिक-आर्थिक असमानता को खत्म करने के लिए सबको बराबरी का हक, यही आर्थिक आरक्षण दिलाएगा... लेकिन एसी, एसटी, ओबीसी, जाट-गुर्जर, मीणा, दलित और महादलित जैसी आरक्षण की मांग आर्थिक आरक्षण के साथ भी जुड़ गई तो क्या 'आरक्षण व्यवस्थाÓ को खत्म करने के बजाय हम आरक्षण के उसी नासूर को चाहे-अनचाहे खाद-पानी देने की तरफ ही कदम नहीं बढ़ा रहे होंगे..? अत: कोई भी आरक्षण समस्या घटाएगा नहीं, बढ़ाएगा..!
भारत में आजादी पूर्व एवं उसके बाद धर्मांतरण का दुष्चक्र भयावह पैमाने पर सुदूर-ग्रामीण क्षेत्रों, वनांचल एवं उन लोगों के बीच चला है, जो तमाम तरह के अभावों से ग्रस्त रहे हैं... हिन्दुओं को भयाक्रांत करके, हिंसा व तलवार के बल पर भी मार-मारकर मुस्लिम बनाने का षड्यंत्र रचा गया... यही नहीं उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, रोजगार और दुआ-प्रार्थना के नाम पर छलने का प्रपंच चर्च लॉबी ने किया और आज भी कर रहे हैं... तभी तो देश का सर्वोच्च न्याय मंदिर अपने सुप्रीम फैसले में जबरन धर्मांतरण पर न केवल चिंतित है, बल्कि इस मामले में केन्द्र को हस्तक्षेप के निर्देश दे चुका है... सुप्रीम कोर्ट ने अपनी विशेष टिप्पणी में कहा है कि - 'जबरन धर्मांतरण द्वारा धर्म की स्वतंत्रता नहीं हो सकती... कथित धर्मांतरण से संबंधित मुद्दा अगर सही पाया जाता है, तो यह बेहद गंभीर है... यह अंतत: राष्ट्र की सुरक्षा के साथ नागरिकों के धर्म और अंत:करण की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है...Ó कहने का तात्पर्य यह है कि जब कोई हिन्दू व्यक्ति मजबूरी में या आवश्यकता के मान से ईसाई या मुस्लिम बनता है तो वह केवल अपना धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाज ही नहीं छोड़ता, बल्कि हिन्दुओं की संख्या में कमी के साथ उनका एक शत्रु भी स्वमेव बढ़ जाता है और हिन्दू का शत्रु होना यानी राष्ट्र के साथ भी वह शत्रुता कृत्य के दुष्चक्र में फंसता चला जाता है... क्योंकि अब तो न्याय मंदिर भी मान चुका है कि जबरदस्ती धर्मांतरण करवाया जाता है और इसके शिकार होने वाले ज्यादातर लोग गरीब, अनुसूचित जाति, जनजाति के ही होते हैं... इसलिए अब देश का धर्मांतरण-मतांतरण के इस दुष्चक्र और छलावे से बाहर निकालने के प्रयास केन्द्र सरकार के स्तर पर भी तेजी से करने होंगे... यही नहीं धर्मांतरण के दुष्चक्र में फंसने वाले लोगों को भी अपने समाज-राष्ट्र का अहित नजर आने लगा है... यही तो जागरूकता है...
न्यायालय के फैसले अनेक बार संवैधानिक एवं कानूनी दायरे में होते हैं, लेकिन उनका समाज, संस्कृति, लोकजीवन एवं कार्य-व्यवहार पर प्रभाव कैसा होगा, इसका भान हमें फैसले के बाद दूरगामी रूप से देर से है..? आजादी के बाद बनाए गए अनेक तरह के कानूनों का दुरुपयोग होता हमने देखा है... फिर देश के सर्वोच्च न्याय मंदिर द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्याकांड से जुड़े छह दोषियों की रिहाई व्यवहार और सजा अवधि के मान से कर देना न केवल हमारी कानून व्यवस्था को ठेंगा है, बल्कि भविष्य में इस तरह के निर्णयों से कानून का राज लागू करने में भी परेशानियां खड़ी होंगी... क्योंकि किसी व्यक्ति या व्यक्ति के समूह को उदारता भाव का लाभ सिर्फ इसलिए नहीं दिया जा सकता कि उन्होंने जघन्य अपराध करके अपने व्यवहार को सुधार लिया है... कल से यही फैसला बड़े अपराधों, क्रूरतम हत्याकांडों के विषय में उदाहरण बनेगा... तभी तो केन्द्र सरकार ने भी रिहाई को गलत बताते हुए पुनर्विचार याचिका दाखिल की है... जब राजीव हत्याकांड के मामले में लंबी सुनवाई हुई है और दोषियों को सजा मिली..,फिर सजा माफी के समय शेष पक्षों को शामिल न करना प्राकृतिक न्याय का खुला उल्लंघन है... जिन छह दोषियों को रिहा किया गया, उसमें चार श्रीलंका के नागरिक हैं... किसी दूसरे देश के आतंकी को छूट देना अंतरराष्ट्रीय मामलों और भविष्य के ऐसे किसी मसलों को निश्चित रूप से दुष्प्रभावित करेगा... जब ऐसे जघन्य अपराधों के दोषियों की रिहाई संभव है तो फिर आए दिन होने वाले बर्बर हत्याकांड पर भी क्या इसी तरह का रुख अपनाया जाएगा..? फिर अपराध व अपराधी घटेंगे नहीं, बढ़ते चले जाएंगे... मी लॉर्ड आप उदार भाव के साथ रिहाई करते रहिए...