अभावों में ज्यादा प्रखर होती है बाल प्रतिभा...
   Date13-Nov-2022

parmar shakti
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
परंपरा, संस्कृति, सामाजिक प्रबंधन, आर्थिक तंत्र और वनोत्पाद को लेकर वनवासियों का नजरिया पीढिय़ों को निरंतर साक्षर करता रहा है... वे अभावों में भी सदियों से जीवन की सामूहिकता, मनुष्यों की आपसी अंतर्निर्भरता के साथ-साथ जीवन मूल्यों को बालपन से समझने को तैयार रहते हैं.., तभी तो ओडिशा के आदिवासी मैराथन धावक बुधिया सिंह ने 65 किमी की दूरी 7 घंटे 2 मिनट में तय करके नया रिकॉर्ड बनाया था... प्रतिभा प्रदर्शन के दौरान शहरी व ग्रामीण के बजाय वनवासी बच्चे ही तनाव से मुक्ति में सक्षम हैं...
भारतीय विचारभाव एवं संस्कृति के प्रत्येक कालखंड में बाल प्रतिभाओं का एक वृहद आख्यान्न रहा है... देवताओं से लेकर दानवों-मानवों तक में बाल प्रतिभाएं अपने प्रयासों, कार्यों और कीर्तिमानों से इस धरा पर अनेक तरह के बदलाव का निमित्त बनी हैं... लव-कुश का शौर्य हो या फिर भगवान का स्वयं वामन रूप में अवतार अथवा बालरूप में ध्रुव एवं प्रहलाद की घोर तपस्या अथवा एकलव्य की एकनिष्ठ गुरु साधना... झांसी की रानी, बिरसा मुंडा, टंट्या भील भी ऐसी ही बाल प्रतिभाएं थीं, जिन्होंने समय के साथ अपनी कला-कुशलता का लोहा मनवाया... प्रतिभा किसी की दासी नहीं है... उसे अपने प्रयासों से हासिल किया जाता है... और ध्यान रहें अभावों में अनेक बार प्रतिभा के फूल कहीं ज्यादा प्रखर होकर सुमधुर खुशबू एवं ख्याति से चौतरफा अपनी कीर्ति का यशोगान करवाने में सफल होते हैं... यह अलग विषय है कि भारतीय आलोक में जब हम नैसर्गिक रूप से प्रतिभा संपन्नता या प्रतिभा परिशोधन के विषय में चर्चा करते हैं तो यह विचार सामने आता है कि प्रत्येक बच्चा प्रतिभा पूर्ण होता है... हाँ, उसके प्रदर्शन एवं प्रभाव का दायरा अलग-अलग हो सकता है... इस छुपी हुई प्रतिभा को सामने लाने हेतु परिवार-समाज द्वारा एवं सामूहिक स्तर पर किए गए प्रयास भी नई क्रांति का कारक बनते हैं... क्योंकि बाल प्रतिभा सम्पन्न भारत का यह गौरव है कि उसके सुदूर गांवों में ऐसी खेल प्रतिभाएं विज्ञान-तकनीक की मेधावी विपुल पीढ़ी है, जिसे थोड़ा सा प्रशिक्षण, प्रोत्साहन प्रदान कर उनका प्रदर्शन ही नहीं सुधारा जा सकता है, बल्कि उनसे 100 फीसदी योगदान की भी उम्मीद की जा सकती है... सरकार अपने स्तर पर ग्रामीण एवं दुर्गम क्षेत्रों की प्रतिभाओं को सामने लाने के प्रयास तो कर रही है, लेकिन फिलहाल ये नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं..!
आदिवासी क्षेत्रों में भाषा, बोलियां, कला-कुशलता एवं प्रतिभा के मान से ऐसी विविधतापूर्ण मेधावी पीढ़ी है, जो भारत के नैसर्गिक बाल प्रतिभा संपदा को नया आयाम देने में सक्षम है... 2011 की जनगणना में देश की कुल जनसंख्या का 8.6 फीसदी हिस्सा वनवासी अंचल से आता है... इस बड़ी आबादी का पिछड़ापन दूर करने के साथ ही उनकी प्रतिभा को उचित मंच देकर न केवल उन्हें मुख्यधारा में लाया जा सकता है, बल्कि उनके ज्ञान, कला और प्रतिभा समाज-सरकार के स्तर पर तराशने की भूमिका का निर्धारण निर्वाह समय की मांग है... क्योंकि किसी भी क्षेत्र में इन वनवासी अंचल की बौद्धिक क्षमता, कला-कौशल का शीर्ष तक आज कोई सानी नहीं है... विचार कीजिए, शहरी एवं ग्रामीण परिवेश वाली बाल प्रतिभाओं की भांति वनवासी अंचल के नौनिहालों को भी ऐसा ही प्रोत्साहन, आर्थिक आत्मबल, संसाधनों-सुविधाओं के साथ स्नेह का अपनत्व मिले तो क्या ये नए कीर्तिमान नहीं गढ़ेंगे..? क्योंकि वनवासी समाज विपुल बाल प्रतिभा का धनी भी है... उन्हें बस एक अवसर की जरूरत है... राष्ट्रीय स्वयंसेवक ने वनवासी क्षेत्रों एवं सुदूर वनांचल में निवासरत वनवासियों के बच्चों को शिक्षा के साथ ही संस्कार एवं उनके कला-कौशल को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए हैं... वनवासी कल्याण आश्रम के द्वारा एकल विद्यालय आश्रम इसी विचार को आगे बढ़ाता है... आज देशभर में दो हजार से अधिक एकल विद्यालय संचालित हो रहे हैं... इन एकल विद्यालय में गांव-गांव और फलिये तक तीन बार प्रात:, सायं, मध्यान्ह बच्चों की सुविधा अनुसार घर के आंगन, गांव के चबूतरे, मंदिर परिसर एवं सार्वजनिक स्थानों पर तीन घंटे के लिए एकल विद्यालय संचालित किए जाते हैं... 3-4 सत्रों में बच्चों को विविध प्रकार के ज्ञान-संस्कार की यहां व्यवस्था है...यहीं से तो बाल प्रतिभा का विकास प्रारंभ होता है...
हमारे यहां कहावतों/मुहावरों के भी अपने महत्व एवं मायने हंै... 'पूत के पांव पालने मेंÓ... हमारे बालकों के जन्म के साथ प्रतिभा प्रमाण का द्योतक है... बाल प्रतिभा को हम तीन श्रेणी में बांट सकते हैं... शहरी, ग्रामीण और वनवासी अंचल में निवासरत बाल प्रतिभाएं... तुलनात्मक रूप से और शारीरिक-मानसिक स्थिति के आईने में... इन तीनों क्षेत्रों की बाल प्रतिभाओं को देखें तो स्पष्ट होता है कि तमाम तरह के संसाधनों, अभावों, पिछड़ापन, अपर्याप्त पोषण एवं सतही मार्गदर्शन के बावजूद अपनी शारीरिक, मानसिक क्षमता एवं बौद्धिकता के साथ कलात्मक कौशल का प्रदर्शन करने में संख्यात्मक अनुक्रम में पहले पर वनवासी, दूसरे पर ग्रामीण और तीसरे पर शहरी रहता है... इसके पीछे तार्किक कारण यह है कि शहरी बच्चों को हर तरह की सुविधा-संसाधन आसानी से मिलते हैं, इसलिए वे अभावों से लडऩे या जूझने के आदी नहीं होते या फिर ऐसी क्षमता उनमें विकसित नहीं हो पाती... ग्रामीण क्षेत्र की प्रतिभाएं शहरी की तुलना में थोड़ी ज्यादा मजबूत व प्रखर होती हैं... लेकिन जिन स्थितियों का सामना वनवासी अंचल की बाल प्रतिभाओं को करना पड़ता है, वैसा किसी के साथ नहीं होता... इसलिए वे उतने ही कला-कुशलता एवं तकनीक-ज्ञान के मामले में प्रखर भी होते हैं... विफलता उन्हें निराश या डिप्रेशन में ग्रामीण व शहरी बालकों की भांति नहीं ला पाती... वे ऐसे जीवन एवं प्रतिभा केन्द्रित आघातों को आसानी से सहने की क्षमता एवं विवेक रखते हैं... अगर वनांचल की इस बाल प्रतिभा को शहरों, ग्रामों की भांति और बेहतर तरीके से तराशने का प्रयास किया जाए तो इनका मौलिक-नैसर्गिक प्रतिभा प्रदर्शन शत-प्रतिशत सामने आएगा, जिससे समाज-राष्ट्र के साथ वनवासी समाज का भी पूर्ण उद्धार संभव होगा...