अभ्यास का फल
   Date10-Nov-2022

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रा जा बहराम तीर चलाने में अत्यंत निपुण थे। एक बार अपनी रानी के साथ शिकार खेलने वन गए। वहां एक हिरण सो रहा था। बहराम ने एक तीर ऐसा मारा कि हिरण के कान को छूकर निकल गया। हिरण ने सोचा कि कान पर मक्खी बैठ गई है, उसने अपना पैर कान की तरफ उठाया। बहराम ने दूसरा तीर ऐसा मारा कि पैर और कान परस्पर जुड़ गए। बहराम ने प्रशंसा प्राप्ति की इच्छा से रानी की तरफ देखा, परन्तु रानी ने केवल इतना ही कहा 'अभ्यास से सब कुछ हो सकता है।Ó बहराम को यह उत्तर अच्छा नहीं लगा। उसने कहा- 'तुम भी ऐसा अभ्यास करके दिखाओ।Ó
रानी भी स्वाभिमानी थी। वह विशेष कार्य का बहाना करके एक गांव में जाकर रहने लगी। वहां एक गाय का बछड़ा खरीदकर उसे उठाकर रोज छत पर चढऩे का अभ्यास करने लगी। जैसे-जैसे बछड़ा भारी होता जाता था, वैसे-वैसे रानी का बोझा उठाने का अभ्यास भी बढ़ता जाता था। तीन वर्ष उपरांत बहराम शिकार खेलकर उसी गांव में ठहरा, जिसमें रानी रहती थी। रानी का बछड़ा अब पूर्ण विकसित हो गया था, वह उसे उठाकर छत पर चढ़ रही थी। बहराम ने दूर से इसे देखा तो उसे अत्यंत आश्चर्य हुआ। वह उत्सुकतावश वहां पहुंचा और बोला - 'इतने बड़े प्राणी को ी तो क्या, पुरुष के लिए भी उठाना संभव नहीं है, फिर आप इसे उठाकर छत पर किस प्रकार चढ़ती हैं?Ó रानी ने अपने चेहरे से बुरका हटाते हुए कहा - 'राजन्! अभ्यास से सब कुछ संभव है।Ó राजा ने रानी को पहचान लिया और अपनी हार स्वीकार कर ली। वस्तुत: अभ्यास से सब कुछ संभव है।