अंग्रेजों द्वारा रोपी गई विषबेल का नाम 'जातिवाद
   Date10-Nov-2022

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रमेश शर्मा
आ धुनिक जीवन काल में जहां पूरी दुनिया एक गांव बन रही है। पूरा यूरोपीय और इस्लामिक समाज अपने एकत्व के लिए संगठन बना रहे हैं वहीं भारतीय समाज जीवन में आदिवासियों और नगरवासियों के बीच विभाजन रेखा गहरी करने के रोज नए बहाने खोजे जा रहे हैं। जबकि भारत में अंग्रेजों के पहले कहीं कोई भेद या विभाजन रेखा नहीं थी। पूरा समाज एक स्वरूप था। उनके बीच विवाह संबंध भी थे और भारत पर हुए विदेशी हमलों में पूरे समाज ने एकजुट होकर संघर्ष किया है। भारतीय समाज जीवन की एक रूपता को समझने के लिए हमें आश्रम व्यवस्था और देव परिकल्पना को समझना होगा। यदि हम जीवन की औसत आयु सौ वर्ष माने तो सत्तर वर्ष का जीवन वनवासी के रूप में ही जीना होता था। भारत में सभी गुरुकुल वन में हुआ करते थे जो शिक्षा चिकित्सा और अनुसंधान का केन्द्र होते थे। जीवन का आरंभ ब्रह्मचर्य आश्रम से होता था। बालक को पांच वर्ष की आयु में ही पढऩे के लिए गुरुकुल भेज दिया जाता था। रामजी भी पढऩे गुरुकुल गए हैं। ऐसा नहीं कि कोई आचार्य महल में आकर पढ़ाने लगे। फिर गृहस्थाश्रम, फिर वानप्रस्थ और फिर संन्यास। अंत के दोनों आश्रम वन में ही जीवन बिताना होता था। इस प्रकार जीवन के सत्तर वर्ष वन में।
भारतीय जीवन में यदि वनवासी या नगरवासी के बीच भेद होता तो विवाह संबंध न होते। महर्षि भृगु की पत्नी देवी पुलोमा वनवासी थी जिनसे महर्षि च्यवन का जन्म हुआ। महर्षि वाल्मीकि का जन्म किस परिवार में हुआ यह सब जानते हैं वे ऋग्वेद के आठवें मंडल में ऋषि हैं और उन्हीं के आश्रम में लव और कुश का जन्म हुआ। महर्षि व्यास की माता देवी सत्यवति मछुआरिन थीं। इन्हीं का दूसरा विवाह चक्रवर्ती सम्राट शांन्तनु से हुआ। देवी सत्यवती का पुत्र ही राजा बनें, इसलिए भीष्म ने जीवनभर विवाह नहीं किया था। देवी रेणुका तो राजकुमारी थीं उन्होंने स्वयंवर में जमदग्निजी का वरण किया। जमदग्निजी महर्षि अवश्य थे पर रहते तो वन में थे। श्रृंगी ऋषि की माता वनवासी और दासी थीं। महर्षि जाबालि की माता तो गणिंका थीं। रामजी के साथ गुरुकुल में निषादराज भी पढ़े थे। अर्थात शिक्षा देने में कोई भेद न था। महाभारत काल के विद्वान विदुर दासी पुत्र थे। वे हस्तिनापुर के महामंत्री बने। राजनीति शास्त्र का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ 'विदुर नीतिÓ इन्हीं की रचना है जो सदैव राजाओं का मार्गदर्शन करती रही। महाभारत काल के महाबली भीम का विवाह वनवासी हिडिम्बा से और अर्जुन का विवाह नाग वनवासी जाति की उलूपी से हुआ। श्री कृष्णजी का पालन पोषण जिस परिवार में हुआ वे गोपालन और दूध व्यवसाय करने वाला था। उनके अग्रज बलराम जी तो स्वयं कृषि करते थे इसीलिए तो उनका प्रतीक हल है।
भारत के सबसे बड़े मगध साम्राज्य के अधिपति महापद्मनंद केश शिल्प अर्थात नाई समाज से थे। उन्होंने ही नंद वंश के राज्य की स्थापना की थी बाद में उनके वंशज भी राजा बने। उनके साम्राज्य का अंत कर अपना साम्राज्य स्थापित करने वाले चन्द्रगुप्त मौर्य की माता मुरा दासी थी। उनकी योग्यता देखकर आचार्य चाणक्य ने अपना शिष्य बनाया। उन्होंने जाति न पूछी योग्यता देखी। मौर्य साम्राज्य के उत्तराधिकारी शुंगवंश का अंत करके गुप्त साम्राज्य की नींव रखने वाले घोड़े का अस्तबल के प्रभारी थे ।
हम साम्राज्य परंपरा से आगे मध्यकाल की गुरुकुल परंपरा को देखे। सब जानते हैं रविदास जी ने चर्म शिल्पकार परिवार में जन्म लिया और कबीर दासजी ने जुलाहा परिवार में जन्म लिया। ये शंकराचार्य परंपरा में बनारस उपपीठ शंकराचार्य स्वामी रामानंदाचार्य के शिष्य थे। और एक राजा की पुत्री एवं दूसरे राजा को ब्याही मीरा ने रविदासजी को अपना गुरु बनाया। यदि भेद होता तो रामानंदाचार्यजी रविदासजी और कबीरदासजी को शिष्य कैसे बनाते और मीरा गुरु के रूप रविदासजी को क्यों स्वीकार करतीं। मराठा साम्राज्य में सुप्रसिद्ध विजेता पेशवा बाजी राव ब्राह्मण थे। पर उन्होंने गाय चराने वाले गायकवाड़, चरवाहा जाति के होलकर और निजी सेवक शिन्दे को सेनापति बनाया। ये तीनों आगे चलकर गुजरात, मालवा और मध्यभारत के शासक बनें। वैदिक काल से लेकर मध्यकाल के अंत तक ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है जब कोई भेद नहीं, कोई वनवासी या नगरवासी का भेद नहीं, कोई छुआछूत नहीं। आकलन केवल प्रतिभा से था। यही कारण था कि भारत पर प्रत्येक विदेशी हमले में सबसे अधिक बलिदान वनवासियों ने दिए। इसके उदाहरण सिकन्दर पर भारत पर आक्रमण से लेकर अंग्रेजों के साथ संघर्ष तक देखा जा सकता है। वह 1757 का प्लासी का युद्ध हो या 1857 की क्रान्ति। सैनिकों के रूप में अधिक संख्या वनवासियों की ही थी। 1820 के आसपास यदि नागपुर के भोंसले वन में छिप गए तो वनवासियों ने प्राण देकर भी उनकी रक्षा की। यही सब देखकर अंग्रेजों ने षड्यंत्र किया। इसका आरंभ 1773 से दिखता है जब चर्च ने वन क्षेत्र में अपना नेटवर्क बढ़ाने का निश्चय किया। उन्होंने वनवासियों को ट्राइबल नाम दिया और आर्य हमलावर की थ्यौरी की कूट रचना की। जबकि आर्य शब्द ऋग्वेद में आया जो गुण वाचक है। एक श्रेष्ठ नागरिक को आर्य कहा गया। इसलिए वेद ने संकल्प लिया कि पूरे विश्व को आर्य बनाना है किन्तु चर्च ने पादरियों को आगे किया और प्रचार किया कि आर्य हमलावर थे उन्होंने लोगों को वनों में धकेल दिया। उनकी तो घोषित नीति ही थी कि फूट डालो और राज्य करो। अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब कास्ट ऑफ माइंड, मैक्समूलर की आर्यन इन्वेजन थ्यौरी के साथ मैकाले और विलियम्स हंटर के लेखन में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने आदिवासी अलग, गौरे अलग काले अलग, जातिवाद, छुआछूत को स्थापित किया और कैसे भारत में एजेन्ट ढूंढकर प्रशिक्षित करके ऐसे दुष्प्रचार के लिए समाज में छोड़ दिया। अंग्रेजों से पहले कितने विदेशी आए उनके संस्मरणों की पुस्तकें उपलब्ध हैं। इनमें मेगास्थनीज फाहियान, ह्यून्सांग और अलबरूनी आदि अनेक पर्यटक। इनके लेखन को विश्वभर में मान्यता है। इनके लेखन में भारतीय प्रतिभा और वन संपदा का भी उल्लेख है पर किसी ने भी आदिवासी या ट्राबल शब्द या वनवासी समाज का पृथक से उल्लेख नहीं लिखा किया और न यह लिखा कि यहां किसी क्षेत्र या जन्म जाति के आधार पर कोई शोषण या भेद होता था। पर यह काम अंग्रेजों ने एक निश्चित योजना से किया। उन्होंने ट्राइबल शब्द का प्रचार जो भारत के सभी वन क्षेत्र एक समान किया। सभी मिशनरी कार्यकर्ताओं की शब्द शैली एक सी थी मानों वनवासियों में यह प्रचार करने के लिए मिशनरियों ने कोई प्रशिक्षण लिया हो। अंग्रेज यहीं तक न रुके उन्होंने एक और रणनीति बनाई। अपने प्रशिक्षित लोगों को पुरातत्व सर्वेक्षण के काम में लगाया और इसे आधार बनाकर भारत के इतिहास को नए सिरे से लिखने का काम। उन दिनों के बंगाल में आज का बिहार और उड़ीसा प्रांत भी में शामिल थे। कलकत्ता चर्च से जुड़ी मिशनरियां इन क्षेत्रों में सक्रिय हुईं और मुम्बई के चर्च ने महाराष्ट्र के साथ मध्यप्रदेश के महाकौशल और मालवा तक अपने पैर फैलाए जबकि मद्रास के चर्च ने केरल, तमिलनाडु आदि को अपने हाथ में लिया। भारत के जंगलों में सक्रिय मिशनरियों ने एक ओर अंग्रेजी सत्ता को मजबूत करने के लिए विभाजनकारी बातें फैलाना आरंभ किया और दूसरी ओर धर्मांतरण करके वनवासियों को ईसाई बनाने का अभियान चलाया। चर्च को लगता था कि यदि वनों का ईसाईकरण हो जाए तो वनवासी अंग्रेजों की सत्ता के समर्थन में आ जाएंगे और समूची वन संपदा पर अंग्रेजों का अधिकार हो जाएगा। चर्च का आभियान तेज चले इसके लिए अंग्रेजों ने एक कानून बनाया और कहा वनवासियों का अपना कोई धर्म ही नहीं है। यदि वे ईसाई बनते हैं, चर्च में जाते हैं तो यह उनका धर्मान्तरण नहीं है बल्कि धर्म के मार्ग पर चलने की शुरुआत है। वनवासी भोले होते हैं। चालाकियां कम समझते हैं। सीधी सरल बात करते हैं। अंग्रेजों ने इस मनोविज्ञान को समझा और केवल रंग भेद की बात करके वनवासियों को समझाया कि गोरे लोग आर्य हैं और हमलावर जबकि काले लोग आदिवासी हैं मूल निवासी हैं।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
जबकि भारत में रंग का कोई भेद न था। सभी रंग के लोग भारत में मिलते हैं। एक ही घर में दो रंग के लोग मिल जाते हैं। रामजी का रंग साँवला और लक्ष्मण जी का रंग गोरा है। भारत में एक देवी कालिका जी हैं। एक दम काला रंग। भगवान शिव कपूर के समान गोरे और भगवान विष्णुबादलोंके समान काले। लेकिन अंग्रेजों का प्रचार इतना प्रबल था, कि भारतीय जनों का विवेक शून्य ही हो गया। वे अंग्रेजों की चाल में फंसने लगे। वहीं इतिहास लेखन और कानून बनाकर भारतीय समाज विभिन्न वर्गों और उप वर्गों में बाँट दिया इससे नकारात्मक प्रतिद्वंद्विता पैदा होने लगी। कहीं ब्राह्मणों को दलित समाज के विरुद्ध तो दलित समाज को अन्य वर्गो के विरुद्ध भड़काया। बात यहाँ तक ही न रुकी। क्षत्रिय समाज के भी दो उपवर्गो को सामने सामने खड़ा कर दिया। अन्य पिछड़ा वर्ग क्षत्रिय समाज का ही तो अंग है।
उम्मीद की जा रही थी कि अंग्रेजों के जाने के बाद उनके षडयंत्र उनके साथ ही चले जायेंगे। लेकिन उनके जाने के 75 साल बाद भी उनके द्वारा रौपी गयीं विष बेलें फैल रहीं हैं। यह विभाजन वादी प्रचार का ही परिणाम है कि अब व्यक्तिगत अपराध को भी जातिवाद से जोड़ा जाने लगा। किसी एक व्यक्ति द्वारा कोई अपराध करना या मर्यादा हनन करना एक बात है लेकिन उस व्यक्ति या घटना के बहाने समाज को एक जुट करके आक्रामक बनाना बिल्कुल दूसरी बात। इन दिनों भारत में यही सब हो रहा है। जनजाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के आधार पर बांटने का काम हो रहा है। हम यह समझ ही नहीं पा रहे कि अंग्रेजों ने तो बाकायदा 'बाँटो और राज करो" का मंत्र तैयार किया था। लेकिन उनके जाने के बाद तो इस नारे और इस नीति को धरती के भीतर गाढ़ दी जाने चाहिए थी। लेकिन कुछ लोगों ने इसे सहेज कर रखा हुआ है। और पद प्रतिष्ठिता प्रभाव बढाने के लिये यही फार्मूला अपनाया जा रहा है। यदि कोई सभी "भारतीयों के एक डीएनए" होंने की बात कह दे तो उस पर हमले होते हैं। शाब्दिक और आरोपात्मक हमलों की बाढ़ आ जाती है। कोई "सबका साथ सबका विकास" का नारा लगाये तो शोर किया जाता है। इतना शोर कि कुछ साफ न दिखाई दे न सुनाई दे। एक आश्चर्यजनक बात यह है कि वामपंथी भले पूरी दुनियाँ में साम्यवाद का नारा लगायें लेकिन वे भारत वर्ण संघर्ष का ताना बाना बनाते हैं। तालिबानी मानसिकता के लोग भी सनातनी समाज के दो फाड़ करने के लिये दलित मुस्लिम एकजुटता का नारा लगाते हैं। यदि इस प्रकार विभाजन के नारे लगे, वर्ग वर्ण और समाज को बांटने के नारे लगेंगे तो कैसे स्वाधीनता का अमृत महोत्सव सार्थक होगा। स्वाधीनता केवल राजनैतिक नहीं हो सकती, पराधीन भारत में केवल सत्ता प्राप्त करने भर के लिये संघर्ष नहीं हुआ था। संघर्ष तो स्वाधीनता के लिये हुआ था। उस संघर्ष में कोई भेद न था। भला भीमा नायक ने, टंटया भील ने बिरसा मुंडा ने केवल आदिवासियों की रक्षा के लिये प्राण दिये थे या चंद्र शेखर आजाद ने जाति धर्म पूछकर भगतसिंह को अपने समूह में सम्मिलित किया था या सुखदेव और राजगुरु ने अशफ़ाकउल्ला से जाति धर्म पूछा था ? या रानी लक्ष्मीबाई ने झलकारी देवी को जाति धर्म पूछकर सखी बनाया था। आखिर वनवासी ऊदा देवी ने लखनऊ में अंग्रैज सिपाहियों की लाशों के ढेर किसके लिये लगाये थे। मिहिर सेन के संघर्ष में क्या केवल गुर्जर या राजपूत ही थे ? शिवाजी महाराज के संघर्ष में भी सभी थे। महाराणा प्रताप के साथ प्राण देने वाले अधिकांश सैनिक भील वनवासी थे। तब इन वीरो और बलिदानियों के नाम पर वर्ग वर्ण भेद की बात क्यों होती है।
आज हम जब स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो इस विषय पर भी विचार होना चाहिए कि अंग्रेज किस नीति से सफल हुये थे। हमारी कमजोरियाँ क्या थीं। उनके जाने के बाद कौन से षडयंत्र हैं जिनसे मुक्ति न हो सकी। हमें इन षडयंत्रों को भी उजागर करना चाहिये तभी भारतीय स्वाधीनता के अमृतत्व की यात्रा सफल होगी और भारत विश्व में अपनी खोई प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकेगा।