आध्यात्मिक संस्कृति का केन्द्र सूर्य उपासना
   Date01-Nov-2022

dharmdhara
धर्मधारा
भौ तिक रूप से वैज्ञानिकों के लिए सूर्य मात्र एक जलता हुआ आग का गोलाभर है, जिसमें हीलियम और हाईड्रोजन की रासायनिक क्रियाएं चलती रहती हैं, जबकि सूक्ष्मस्तर पर ज्योतिष में सूर्य ग्रहों के अधिपति हैं और कारणस्तर पर ब्रह्मांड के केंद्र तथा इसके उद्गम आध्यात्मिक रूप से सूर्य व्यक्ति की आत्मा हैं। वेदों में सूर्य को जगत् की आत्मा कहा गया है। आश्चर्य नहीं कि भारत में गायत्री महामंत्र के रूप में सूर्य उपासना इसकी आध्यात्मिक संस्कृति के केंद्र में रही है।
सूर्य उपासना की विशेषता इसकी सरलता एवं सार्वभौमिकता में है, जो विश्व के हर कोने में किसी न किसी रूप में प्रचलित मिलती है। यह सूर्य के प्रकृति के अधिपति होने के कारण स्वाभाविक भी है। प्रारंभिक दौर में मनुष्य का जीवन प्रकृति की गोद से ही शुरू हुआ था। भारत में वैदिक काल में सर्योपासना व्यापक रूप से प्रचलित रही वेदों में सूर्य को विविध नामों से पुकारा गया, जैसे- सूर्य, सविता, मित्र, विष्णु, पुष्ण, अश्विन, आदित्य, रोहिता आदि। वेदों के अनुसार सूर्य की उपासना मनुष्य को हर तरह की अशुद्धि एवं पाप से मुक्त कर देती है। यह मनुष्यों को रोगमुक्त कर देती है। असाध्य नेत्र रोगों का इसकी किरणों से उपचार होता है। वैदिक युग में गायत्री महामंत्र के रूप में सूर्य उपासना देव संस्कृति के केंद्र में आ गई थी। उपनिषदों में सूर्य का पुरुष के रूप में विकास हुआ है। प्राण, आत्मा, ब्रह्म, प्रजापति के रूप में सूर्य का प्रतिनिधित्व इसके आध्यात्मिक स्वरूप को इंगित करता रहा है। सूर्य को परम सत्य ब्रह्म के साथ एक मानकर देखा जाता है व साथ ही ओंकार के रूप में सूर्य की समतुल्यता परिभाषित होती है। कुछ स्थानों पर आदित्य के रूप में तो कुछ स्थानों पर उनके सविता रूप को परम सत्य ब्रह्म के साथ एक देखा जाता है। इस तरह उपनिषदों में वैदिक सूर्य देवता की ब्रह्म के रूप में उपासना की जाती रही।