खड़ाऊ वाले खडग़े क्या रहेंगे टिकाऊ खटाऊ?
   Date20-Oct-2022

vishesh lekh
त्वरित टिप्पणी
अवधेश शुक्ला
कां ग्रेस के अध्यक्ष पद का परिणाम नहीं आया था, लेकिन सबको पता था कि मल्लिकार्जुन खडग़े कांग्रेस के नए अध्यक्ष होंगे। इसे आप कांग्रेस के आन्तरिक लोकतंत्र की खूबी भी मान सकते हैं, जहां सबको पता था कि परिणाम क्या आना है। वह इसलिए कि हाईकमान यानि गांधी परिवार का आशीर्वाद खडग़े के साथ था। अब जी-23 ये तो नहीं पूछेगा कि खडग़े क्यों जीते। शशि थरूर क्यों नहीं? पूछने का हक भी नहीं क्योंकि गैर गांधी अध्यक्ष सामने है।
कांग्रेस में एक अच्छी बात यह है कि वहां लम्बरदार तो बहुत हैं पर गांधी परिवार के आगे सब पजामे के अंदर ही रहते हैं। गांधी परिवार ने उनकी बात मान ली। वयोवृद्ध सोनिया गांधी, युवावस्था पार कर चुके प्रियंका और राहुल गांधी ने 'त्यागÓ दिखाकर अस्सी साल के बुजुर्ग मल्लिकार्जुन खडग़े को अध्यक्ष पद पर बैठा दिया। इसे वफादारी का इनाम भी कह सकते हैं। वफादारी से एक राजा की कहानी याद आ रही है। राजा अपनी प्रजा की अकर्मण्यता से परेशान था। मंत्रियों ने सुझाव दिया कि आप प्रजा को स्वतंत्रता दीजिए ताकि वो खुलकर अपनी बात कह सके। ऐसे में आपके प्रति लोगों की निष्ठा और स्वीकार्यता और बढ़ेगी। राजा ने बात मान ली। ढिंढ़ोरा पिटवाया कि किसी को कोई तकलीफ हो तो खुलकर बात करे। लेकिन कानाफूसी करने के अलावा कोई सामने नहीं आया। राजा ने प्रजा को उकसाने के लिए एक सीधी सपाट सड़क को खुदवा कर खाई बनवा दी। लोग दाएं-बाएं से निकलने लगे, मगर कोई शिकायत नहीं। फिर राजा ने उस जगह एक पुल बनवा दिया, जबकि वहां कोई नदी- नाला भी नहीं था। लोगों ने कोई एतराज नहीं किया और पुल से निकलने लगे। राजा ने पुल से निकलने पर टोल टैक्स लगा दिया। लोग पैसे देकर निकलने लगे। इतने पर भी जब कोई विरोध नहीं हुआ तो राजा ने वहां एक जूते मारने वाला खड़ा कर दिया, जो वहां से निकलने वालों को जूते भी मारने लगा। फिर भी विरोध करने कोई सामने नहीं आया। राजा के मंत्रियों ने कहा कि एक पत्र पेटी लगवा दीजिए ताकि किसी को कोई शिकायत हो तो वह लिखकर ही डाल दे। राजा ने पत्र पेटी लगवा दी। अलगे दिन पेटी में एक पत्र मिला सब लोग खुश थे कि कोई तो सामने आया। पत्र को दरबार में पढऩे का निर्णय हुआ दरबार सजा और पत्र खोला गया। पत्र में लिखा था- 'हुजूर आपका आदेश सिर माथे पर! बस निवेदन है कि जूता मारने वाला बदल दीजिए, बहुत देर तक लाइन में खड़े रहना पड़ता है। कांग्रेस के जी-23 के नेताओं की फरियाद गांधी परिवार ने सुन ली। त्याग दिया अध्यक्ष पद। उनका यह त्याग खडग़े की ताजपोशी से जयादा महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इसके बाद सिर्फ उसी त्याग की ही ढपली-बजेगी। खडग़े गांधी परिवार के प्रति बफादार हैं, इसमें कोई शक नहीं। धारणा भी यही है कि उन्हें जब भी इशारा मिलेगा अध्यक्ष पद छोड़ देंगे। वे सीताराम केसरी की तरह हठ नहीं करेंगे बल्कि अपनी धोती की लाज रखेंगे। क्योंकि ये तो खडग़े भी जानते हैं कि सीताराम केसरी को कार्यालय से जिस तरह बाहर फेंका गया था, उसमें उनकी धोती तक खुल गई थी।
फिलहाल जीत मिलने के साथ वयोवृद्ध खडग़े की एक इच्छा तो पूरी हो गई कि गांधी परिवार ने उन्हें अपने खड़ाऊ देकर ईद में तो बचा लिया। अब रह गई मोहर्रम में नाचने की बात तो गांधी परिवार के साथ-साथ पूरी कांग्रेस को पता है कि मोहर्रम मातम का पर्व होता है। उसमें खुशी से नाचते नहीं है बल्कि छाती कूट-कूट कर मातम मनाया जाता है। कांग्रेस की जो दशा है वह नाचने कूदने वाली नहीं है। हालांकि शशि थरूर अध्यक्ष बने होते तो संभवत: वो यह प्रयास भी करते, लेकिन खडग़े को शायद ही यह अवसर मिलेगा। फिलहाल खडग़े के पास खड़ाऊ तो है लेकिन असली परीक्षा तो स्वयं को टिकाऊ और खटाऊ (मजबूत) साबित करने की है। बात बहुत सरल और साधारण है कि जिस कांग्रेस को सोनिया, राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा नहीं संभाल पा रहे उसे अस्सी साल के मल्किार्जुन खडग़े क्या खड़ा करने का दम-खम दिखा पाएंगे?