हिंदी में डॉक्टरी की पढ़ाई : 'अंग्रेज' डॉक्टरों के पेट में उठा दर्द
   Date20-Oct-2022

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विशेष प्रतिनिधि ठ्ठ ग्वालियर
चिकित्सा महाविद्यालयों में हिंदी माध्यम के नवाचार पर कथित प्रगतिशील तबके में स्वाभाविक प्रतिक्रिया सामने आने लगी है। ग्वालियर के गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय में प्रथम बर्ष के छात्रों की कक्षाएं विधिवत रूप से हिंदी एवं अंग्रेजी में आरम्भ होने की खबर 'स्वदेशÓ में बुधवार को प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद, दिन भर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर ट्रेंड करती रही।
एनएमसी हस्तक्षेप करे- डॉ. जैन
इंडियन मेडिकल एशोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अरविंद जैन ने एक पोर्टल को दिए इंटरव्यू में इस बात पर आपत्ति दर्ज कराई कि मप्र के ग्वालियर चिकित्सा महाविद्यालय के डीन डॉ. अक्षय निगम ने आरएक्स के स्थान पर श्री हरि लिखकर पर्चे पर दवाओं के नाम लिखे हैं। डॉ. जैन ने राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग यानी एनएमसी से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग तक कर डाली।
श्री हरि लिखना गलत- डॉ. मिश्रा
मप्र मेडिकल काउंसिल के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. सुबोध मिश्रा ने भी मरीजों के पर्चे पर श्री हरि या हिंदी में दवाएं लिखने के लिए एनएमसी के आदेश औऱ नियमों का हवाला देते हुए गाइडलाइन की बात कही।
नेताओं को खुश करने की कोशिश- चतुर्वेदी
शिवपुरी के शासकीय जिला अस्पताल में पदस्थ डॉ. गिरीश चतुर्वेदी ने भी डॉक्टरों के एक समूह में इस नवाचार पर आपत्ति दर्ज कराते हुए लिखा 'नेताओं को खुश करने को पूरे मेडिकल सिस्टम की हिंदी की जा रही हैÓ
अंग्रेजी का कोर्स शुरू किया जाए- डॉ. दुबे
ग्वालियर के ही वरिष्ठ नेत्र सर्जन डॉ. अरविंद दुबे ने भी इस प्रयोग को चिंताजनक बताते हुए प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए 3 महीने का अंग्रेजी कोर्स आरम्भ करने की वकालत की है।
एनएमसी का ऐसा कोई नियम नहीं- डॉ. निगम
इन आपत्तियों सिरे से खारिज करते हुए ग्वालियर चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. अक्षय निगम ने कहा कि एनएमसी का पर्चे लिखने के संबंध में किसी प्रकार का कोई पूर्व निर्देश नहीं है, न ही भाषा को लेकर चिकित्सकीय परिचर्या में ऐसा कोई प्रावधान है जो अंग्रेजी को ही एकमेव स्थापित करता है। डॉ. निगम के अनुसार मेडिकल से जुड़ी किसी टर्म को इस नवाचार में बदला ही नहीं गया है। स्पाइनल या एब्डॉमिन को देवनागरी में लिखकर सुग्राही औऱ सुगम्य बनाया गया है। यह लर्निंग को स्वाभाविक बनाने का संकल्प है। समाज जिस भाषा और लिपि में जीता है उसी के अनुरूप चिकित्सा शास्त्र को ढालने की यह संकल्पना है, कुछ लोग बगैर भावना को समझे सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं।
( प्री-पीजी की तैयारी के लिए
टर्मिनोलॉजी नही बदली, भावना समझें-डॉ. नारंग
भोपाल के प्रतिष्ठित समग्र पॉलिक्लिनिक एंड डायग्नोस्टिक के संचालक डॉ. अजय नारंग इस बात से इतेफाक नहीं रखते हैं कि एनएमसी क्या कहता है, वह इस नवाचार को विशुद्ध रूप से व्यावहारिक और बहुप्रतीक्षित निरूपित करते हैं। उनके अनुसार मेडिकल टर्मिनोलॉजी में किसी प्रकार का कोई बदलाव नहीं किया गया है, यह ठीक वैसा ही है जैसे डोनाल्ड ट्रम्प को देवनागरी में लिखना। वह जोड़ते है कि पिछले दो तीन दशकों से चिकित्सा शिक्षा में ग्रामीण औऱ कस्बाई छात्रों का प्रतिनिधित्व तेजी से बढ़ा है इस समूह के बच्चे पहले अंग्रेजी से जूझते हैं फिर विषय से। अब यह नहीं होगा। इसलिए इस निर्णय के बहुत दूरगामी परिणाम अवश्यंभावी हैं। हिंदी के डॉक्टरों को गैर हिंदी भाषाई राज्यों में नोकरी के अवसरों की समाप्ति या समस्याओं को डॉ. नारंग ने सिरे से खारिज करते हुए सवाल उठाया कि अभी अंग्रेजी में पढ़े बच्चे पीजी की डिग्री के लिए तमिलनाडु, पुडुचेरी औऱ महाराष्ट्र में कैसे चले जाते है। क्या वहां की स्थानीय भाषा बाधक नही है? उन्होंने साफगोई से कहा कि एनएमसी या अन्य कानून नागरिकों के लिए होते हैं, नागरिक कानूनों के लिए नहीं, इसलिए इस बात का कोई अर्थ नही कि गाइडलाइंस क्या कहती हैं।
सपनों को स्वाभाविक गति देगा नवाचार- डॉ. जैन
वरिष्ठ नेत्र सर्जन डॉ. हरिप्रकाश जैन के अनुसार जापान, रूस, चीन, वियतनाम समेत दुनिया के अनेक देशों में वहां की भाषा में मेडिकल एवं इंजीनियरिंग की पढ़ाई होती है। जब दूसरे देश अपनी भाषाओं में चिकित्सकीय तंत्र खड़ा कर सकते हैं, तो हम भारतीयों के लिए यह क्यों संभव नहीं है? आजादी के 75 साल बाद प्रधानमंत्री एवं मप्र के मुख्यमंत्री ने यह बीड़ा उठाया है, यह ग्राम्य पृष्ठभूमि के सपनों को स्वाभाविक गति देगा। आने वाला समय चिकित्सा क्षेत्र के लिए प्रतिनिधित्व औऱ मौलिक प्रतिभा के मामले में समावेशी साबित होगा।