चित्त का परिष्कार ही सच्चा योग
   Date20-Oct-2022

dharmdhara
धर्मधारा
म नुष्य जीवन अत्यंत रहस्यमय है। इस रहस्य को समझना आसान नहीं है। अनगिनत रहस्यों को अपने में समेटे हुए है व्यक्ति का चित्त। चित्त वह है, जो मन से जुड़ा दिखता है, लेकिन साथ ही यह हमारे अतीत के कर्मजन्य संस्कारों, प्रवृत्तियों को अपने में समेटे हुए होता है। यह जीवन जो हम जी रहे हैं, समुद्र में तैरते हुए हिमखंड का बस वह ऊपरी हिस्साभर है, जो दिख रहा है, परन्तु इसका बहुत बड़ा अदृश्य पहलू भी है, जो जल के भीतर डूबे हुए विशाल हिमखंड की तरह है। मनुष्य जीवन की यात्रा अनंत है। इस यात्रा में अनेक शरीर वों की तरह बदले जाते हैं। संसार में जन्म लेते ही शरीररूपी व पहन लिया जाता है और मृत्यु होने पर इस शरीररूपी व का त्याग व मृत्यु के बीच दिखता है, लेकिन जन्म व मृत्यु के बाद भी जीवन गतिशील रहता है। मृत्यु के बाद पुन: नया शरीर धारण कर लिया जाता है। एक शरीर से दूसरे शरीर को धारण करने के मध्य जीवात्मा थोड़ा विश्राम करता है और फिर आगे की यात्रा आरंभ करता है। इस यात्रा में उसका चित्त सदैव जीवात्मा के साथ रहता है। यह चित्त ही है, जिसमें उसके किए गए कर्म-संस्कारों का संग्रह होता है और इन्हीं कर्म-संस्कारों के आधार पर यह निर्धारित होता है कि उसके भावी जन्म के माता-पिता कौन होंगे? उसे कहां जन्म लेना होगा? क्या कार्य करना होगा? किन लोगों से उसका संपर्क होगा और उसके जीवन में क्या-क्या महत्वपूर्ण घटनाएं घटेगी? यही वे कारण है जिनकी वजह से हर व्यक्ति का व्यक्तित्व एक-दूसरे से भिन्न होता है, हर व्यक्ति के कर्म अलग होते हैं। कोई भी दो व्यक्ति जीवनभर एक जैसे कार्य नहीं करते, यदि करते भी है तो उनके भाव व विचार एक जैसे नहीं होते, भाव व विचारों की भिन्नता के कारण उनके संस्कार अलग-अलग हो जाते हैं और उनका जीवन भी। मानवीय व्यक्तित्वों की भिन्नता के पीछे उनके कर्म संस्कार ही कारण होते हैं। मनुष्य जीवन के रहस्यों को समझना आसान नहीं है, लेकिन जो इस चित्त के रहस्य को जान लेता है, वह अपने जीवन के सम्पूर्ण रहस्यों से भी परिचित हो जाता है।
मनुष्य का स्थूलरूप में शरीर दिखता है, उसका सीमित आकार-प्रकार है, लेकिन चित्त सूक्ष्म होते हुए भी स्थूलदृष्टि से अदृश्य होते हुए भी इतना विशाल है कि इसका कोई ओर छोर नहीं है और इसमें पूरा का पूरा संसार बसा हुआ है।