धर्म का अर्थ
   Date19-Oct-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
म हर्षि कण्व अपने शिष्य कौत्स को साथ लेकर भ्रमण को निकले। मार्ग में उन्हें आश्रम से संबंधित कुछ कार्य स्मरण हो आया तो उन्होंने कौत्स को वापस लौटने की आज्ञा दी। लौटते समय मार्ग में कौत्स को भीषण दर्द से पीडि़त एक सुंदर युवती दिखाई पड़ी, पर वह उसको अनदेखा कर आश्रम चला गया। कुछ समय पश्चात महर्षि कण्व भी उसी मार्ग से निकले तो उस युवती को पीड़ा से कराहते देखकर वे उसे अपने साथ आश्रम ले आए और उसके उपचार इत्यादि की व्यवस्था की। उस युवती ने महर्षि को यह भी बताया कि कौत्स उसे अनदेखा कर निकल गए थे। महर्षि ने कौत्स को बुलाकर पूछा-'वत्स! तुम्हें मार्ग में यह पीडि़त स्त्री मिली तो तुमने उसकी सहायता क्यों नहीं की?Ó कौत्स ने उत्तर दिया- 'गुरुवर! मुझे भय था कि कहीं मैं उसके सौंदर्य से विचलित होकर धर्मभ्रष्ट न हो जाऊं।Ó महर्षि बोले-'पुत्र! दूसरे की पीड़ा का निवारण करना ही सबसे बड़ा धर्म है और क्या सौंदर्य से भागने से तुम्हें उससे विरक्ति हो जाएगी, छिपा हुआ भाव तो कभी भी प्रकट हो सकता है। वासना शमन का उपाय उसके करुणा में रूपांतरण में है।Ó