मनुष्यता का अर्थ है संस्कारशीलता
   Date19-Oct-2022

dharmdhara
धर्मधारा
वै ज्ञानिकों से लेकर अध्यात्मवेत्ताओं-प्रत्येक के लिए मनुष्य का जीवनोद्देश्य एक गंभीर चिंतन एवं विमर्श का विषय है। वर्तमान परिस्थितियों में, जब मानवीय जीवन भांति-भांति की समस्याओं, आशंकाओं से घिरा हुआ दिखाई पड़ता है-यह प्रश्न और भी ज्यादा सामयिक एवं महत्वपूर्ण - हो जाता है। इसमें दो मत नहीं कि प्राणिजगत् में मनुष्य को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। मनुष्य अन्य प्राणियों से वरिष्ठ भी है और उनकी तुलना में असाधारण योग्यताओं एवं प्रतिभाओं का धनी भी है। यही कारण हैं जिनके कारण मानवीय दायित्वों में उत्कृष्टता, शालीनता, सभ्यता एवं सुसंस्कारिता नैसर्गिक रूप से समाविष्ट हो गए हैं। स्वतंत्र-स्वच्छंद दिखते हुए भी मनुष्य को अनेकों व्यक्तिगत, नीतिगत एवं सामाजिक मर्यादाओं, अनुशासन का पालन करना ही पड़ता है। जहां एक ओर उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह मर्यादाओं का परिपालन करे तो वहीं अनेकों ऐसे कुकृत्य हैं, जिनके विषय में उससे यह अपेक्षा है कि वह उनसे दूर रहे। उनको अपनाने पर कानून से लेकर कर्म व्यवस्था, सभी उसके ऊपर अपना शिकंजा कसते दिखाई पड़ते हैं। व्यक्ति शारीरिक रूप से समर्थ हो, बलवान हो या बौद्धिक क्षमता का धनी हो अथवा आर्थिक रूप से संपन्न हो-इन सबके आधार पर सुख-सुविधा की प्राप्ति संभव है। सामाजिक रूप से इनका मूल्य एक निश्चित सीमा तक ही है-उसके बाद इनका भी बहुत महत्व नहीं रह जाता है। व्यक्ति यदि अशिष्ट हो, असभ्य हो, दुर्गुणी हो, दुव्र्यसनी हो तो ऐसे में वह स्वयं के अतिरिक्त दूसरे अनेकों के लिए कष्ट-कठिनाई का कारण बनता है। इसी को कुछ ऐसे भी कहा जा सकता है कि इस संसार में मनुष्य जैसे दिखने वाले, उसकी तरह क्रियाकलाप करने वालों की संख्या अरबों में है, पर यदि उनके भीतर मानवोचित उत्कृष्टता का समावेश न हो सका तो ऐसा समझना चाहिए कि वे धरती पर भार बनने के अतिरिक्त और कुछ न कर सके। यदि मनुष्य सुविधा संपन्न हो गया, परन्तु संस्कारों की दृष्टि से शून्य बना रहा और उसके चिंतन में निकृष्टता ही बसती रही तो ऐसा जीवन कलंक के समान ही रह जाता है।