आत्मतत्व की प्राप्ति का मार्ग अध्यात्म
   Date17-Oct-2022

dharmdhara
धर्मधारा
अ ध्यात्म, जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता है, क्योंकि यही हमारे वास्तविक स्वरूप से हमारा परिचय कराता है। वह स्वरूप जो जरा-मरण से रहित, शोकमुक्त, नित्य और अविनाशी मूलसत्ता है; जिसका ज्ञान होने पर फिर मनुष्य हर तरह के भय, शोक, चिंता और मरण से मुक्त हो जाता है, अजर-अमर होकर चिरअविनाशी पद को प्राप्त कर लेता है। इस नाशवान मानव जीवन में उस आत्मतत्त्व की उपलब्धि से बड़ी और ऊँची उपलब्धि और क्या हो सकती है? हर व्यक्ति इसकी खोज में जीवन व जगत के मर्म को समझने के बजाय बाह्य आकर्षण में ही उलझ जाता है। इसी गोरखधंधे में पड़ा वह संसार के क्षणभंगुर सुख के पीछे भागता फिरता है और अंतत: अशांति व असंतोष ही उसके पल्ले पड़ते हैं। इसी खोज में जरावस्था आ जाती है, फिर मृत्यु दस्तक दे जाती है और यह बहुमूल्य जीवन यों ही व्यर्थ नष्ट हो जाता है। यदि इस अवधि में आत्मा की सुध ली होती तो जरावस्था एक उत्सव बनती और मृत्यु का भी भय नहीं रहता और साथ ही जीते जी उस आत्मतत्त्व को व्यक्ति पा जाता, जिसके बाद फिर पूरा जीवन आनंदस्वरूप बन जाता। वास्तव में एक व्यक्ति संसार में नाना सुख-भोग, साधनसपत्ति व ऐश्वये का जो सग्रह करता है, उसके पीछे उद्देश्य आनंद की प्राप्ति का ही रहता है, लेकिन इसे कौन उपलब्ध कर पाता है-यह विचारणीय है। सुखभोग में आकंठ डूबकर बड़े-से-बड़े पद को पाकर या अकूत धन-संपति के वैभवशाली जीवन के बाद भी क्या व्यक्ति वास्तव में सुखी हो पाता है? क्या आनंद का लक्ष्य पूरा हो जाता है? इसका उत्तर ढूँढऩे पर अधिकतर न में ही जवाब मिलता है। यदि इनमें ही कुछ सारतत्व होता तो इतने सारे धनकुबेर क्यों रोते-कलपते फिरते? निद्रा के लिए नींद की गोलियाँ खाते, अपने मानसिक उपचार के लिए मन:चिकित्सकों का चक्कर लगाते तथा जीवन में सुख-शांति-आनंद के लिए साधु-फकीरों की खोज करते।