परंपरागत भंडारण में छुपी खाद्य सुरक्षा...
   Date16-Oct-2022

parmar shakti
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
भारत में फसल कटाई उपरांत प्रमुख खाद्यान्न फसलों के कुल उत्पादन का करीब 5.99 फीसदी भाग बर्बाद हो जाता है... बेयर हाउस या कोल्ड स्टोरेज की संरचनाएं भी असंगठित हंै... जिन्हें नियमानुसार नहीं चलाया जाता... अगर खाद्यान्न का परंपरागत तरीकों के साथ ही तकनीकी रूप से भंडारण करें और परिवहन-वितरण व्यवस्था सुदृढ़ हो तो किसानों को उपज का लाभ एवं भूखे पेट को 'खाद्य सुरक्षा' सुनिश्चित होगी...
दु नियाभर में 'खाद्य असुरक्षा' से ग्रस्त लोगों का अधिकृत आंकड़ा 69 करोड़ है, जो हर दिन भूखे सोते हैं..,भारत में यह संख्या 19 करोड़ है... पहली, दूसरी और तीसरी दुनिया को 'खाद्य असुरक्षा' के आईने में देखें तो पता चलता है कि ऐसा कोई देश नहीं, जहां पर 'खाद्य असुरक्षा' की स्थिति विकट नहीं है..! इसमें तथाकथित वे विकसित देश अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, ब्राजील, जर्मनी भी शामिल हैं, जो स्वयं को पहली दुनिया बताते नहीं अघाते... फिर दूसरी दुनिया के विकासशील राष्ट्र जिसमें भारत भी शामिल है, यहां पर पेट की आग का मामला अभी भी ज्वलंत बना हुआ है... क्योंकि 2014 से 2019 के दौरान भारत में 6 करोड़ से अधिक लोग भुखमरी का शिकार हुए हंै...
यूरोपीय और अफ्रीकी देशों की बात ही क्या करना, जिन्हें थर्ड वल्र्ड कंट्री (तीसरी दुनिया) पुकारा जाता है...वहां पर तो संपूर्ण आबादी का असंख्य हिस्सा पेट की आग बुझाने की लड़ाई में ही अपना पूरा जीवन खपा रहा है... उसके लिए भूख से लडऩे और जीतने के बाद किसी तरह के विकासशील या विकसित श्रेणी के पैमाने मायने ही नहीं रखते... कहने का तात्पर्य यह है कि आज देश-दुनिया में दो खेमे बन गए हैं, या कहें कि दो खाई निर्मित हो गई है... एक वह जो जीवन को चलायमान रखने के लिए दो समय के भरपेट भोजन की प्राप्ति हेतु जंग लड़ रही है... क्योंकि उनके बच्चे भी कुपोषण और अतिकुपोषण का शिकार हैं... तो एक वह आबादी है, जो खाद्य पदार्थों की बर्बादी को अपनी थोथी संपन्नता का सूचक मान बैठी है... इसमें विदेश के ही नहीं, भारत का तथाकथित नव धनाड्य वह तबका भी शामिल है, जो अतिपोषण से भी ग्रस्त है और खाद्य पदार्थों की भयावह बर्बादी का कारण भी बन रहा है... तभी तो भारत में प्रति वर्ष 40 फीसदी अर्थात 68,760,163 टन खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है...
कृषि प्रधान भारत की अर्थव्यवस्था में हमारे खाद्यान्न उत्पादन एवं निर्यात आंकड़ों पर दृष्टिपात करें तो यह स्वीकार करना होगा कि करीब 70 फीसदी आबादी की आजीविका का माध्यम हमारी कृषि है... इसकी हमारी सकल घरेलू अर्थव्यवस्था में करीब 16 फीसदी भागीदारी है... इससे जुड़े खाद्यान्न, कृषि उत्पाद, फल-फूल, सब्जी एवं तेल इन्हीं कृषि उत्पादों ने भारत की निर्यात व्यवस्था को मजबूती प्रदान की है... तभी तो कृषि को भारत की रीढ़ सनातनकाल से माना गया है... नारदस्मृति के साथ ही कृषि पाराशर-श्लोक-7 में विशेष रूप से कृषि तथ्यों का दर्शन मिलता है... कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषि:... अर्थात् : कृषि सम्पत्ति और मेधा प्रदान करती है, कृषि ही मानव जीवन का आधार है...
आज भारत में कृषि के क्षेत्र में उत्पादन, निर्यात के मान से क्रांतिकारी बदलाव आया है... क्योंकि 2021-22 में भारत का कुल उत्पादन 316.06 मिलियन टन रहा, जो कि 2020-21 की तुलना में 5.32 करोड़ रु. अधिक है.. जबकि भारत का कुल खाद्यान्न निर्यात 2.74 लाख करोड़ रहा है...यही नहीं, गेहूं के निर्यात में हमने 273 फीसदी की रिकार्ड उपलब्धि हासिल की... लेकिन 19-20 करोड़ लोग जब भूखे पेट सोते हों, तो उस उपलब्धि पर गर्व के साथ ग्लानि भी स्वाभाविक है... क्योंकि दुनियाभर में कृषि और कृषि पदार्थों के क्षेत्र में करीब 100 करोड़ लोग कार्यरत हैं... लेकिन जब इतनी ही संख्या में लोग भूखे रहें तो हमारी प्रगति के प्रतिमानों पर समय रहते चिंतन जरूरी है..! भारत में 'खाद्य असुरक्षाÓ के चलते जब कुपोषण एवं अतिकुपोषण के कारण बड़ी आबादी के जीवन पर संकट मंडरा रहा है, गेहूं और चावल के रिकार्ड उत्पादन करने वाले राज्यों में भी भुखमरी व कुपोषण के आंकड़े शर्मसार करते हों, तब हम कहां खड़े हैं, यह अपने आप पता चलता है...
'खाद्य असुरक्षाÓ से घिरी आबादी का यह भयावह आंकड़ा...हमारी खाद्यान्न-भंडारण, वितरण और उचित प्रबंधन में विफलता को इंगित करता है...वरना क्या कारण है कि जुलाई 2021 में विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण स्थिति (एसओएफआई) रिपोर्ट बताती है कि 2018 से 2020 के दौर में भारत में 'खाद्य असुरक्षाÓ में 6.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है... इसी रिपोर्ट के एवज में एक विरोधाभाष तथ्य यह भी है कि आखिर कोविड-19 के भयावह दौर में करीब 80 लाख आबादी को नि:शुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराने वाला भारत ही विश्व का पहला और अंतिम देश सामने आता है, ऐसे में विचारणीय बिन्दु यह है कि केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे मुफ्त राशन वितरण व्यवस्था के बाद भी कृषि प्रधान भारत पेट की आग बुझाने में विफल क्यों है..? ऋग्वेद के अक्षसूक्त में कृषि का गौरवपूर्ण उल्लेख सामने आता है... अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व वित्ते रमस्व बहुमन्यमान: अर्थात् : जुआ मत खेलो, कृषि करो और सम्मान के साथ धन पाओ... क्या कृषि पर अवलंबित उस आबादी को हम इस सूत्रवाक्य के मान से सहज जीवन प्रदान करने में सफल हो रहे हैं..? भारत में खाद्यान्न भंडारण, बीजों के संरक्षण की एक परंपरागत संस्कृति व कार्यशैली रही है, जिससे न केवल पारंपरिक खेती जिंदा रहती है, बल्कि किसानों को उन्नत बीज व्यवस्था बनाए रखने में भी सहायता मिलती है... इसी के कारण खाद्यान्न सुरक्षा का चक्र भी निरंतर मजबूत होता है... गांव में गेहूं, ज्वार, बाजरा, मक्का को दो वर्षों तक सुरक्षित रखने की एक सफल परंपरागत कृषि संस्कृति थी... वह आधुनिक भंडार व्यवस्था के कारण ध्वस्त हो गई... जिसे आर्थिक अनुदान एवं प्रोत्साहन के साथ पुनर्जीवित करना होगा, तभी 'खाद्य सुरक्षा' संभव है..!