लक्ष्मण रेखा का भान...
   Date15-Oct-2022

vishesh lekh
अनेक बार नीतिगत रूप से लिए गए निर्णय और उनके प्रभाव को लेकर भी विश्लेषण या कहे समीक्षा की जाती है और होना भी चाहिए कि उस समय लिया गया निर्णय तात्कालिक था या उसका दूरगामी असर किसी क्षेत्र में दिखा या फिर उसके सकारात्मक-नकारात्मक प्रभावों का कुल सार क्या निकलकर आया..? तभी उससे जुड़ी नीति या नीतिगत मुद्दों पर आगे की भूमिका की कार्ययोजना बनाई जा सकती है...वर्ष 2016 में अनियमितता पर रोकथाम एवं भ्रष्टाचार पर अंकुश के साथ ही कालेधन की उस चेन को तोडऩे के लिए नोटबंदी अर्थात नोटबदली का ऐतिहासिक केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने लिया था...जिसमें 500 और 1000 के नोट बंद करने का निर्णय भी शामिल था...उच्च मूल्य बैंक नोट (विमुद्रीकरण) अधिनियम 1978 के तहत नोटबदली का आदेश पारित किया गया था...यह विमुद्रीकरण जनहित करने का दावा भी सरकार की तरफ से किया गया था..,क्योंकि इस नोटबदली का असली मकसद सरकार की तरफ से अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक धन के अवैध हस्तांतरण पर लगाम लगाना भी था...क्योंकि आतंकवादियों, नक्सलियों के पास 500 और 1000 के नकली नोटों की इतनी बड़ी खेप तैयार हो चुकी थी कि जिसे वे भारत की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए बाजार में अपने-अपने तरीके से उतार रहे थे...अब इस निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ के तहत सुनवाई करने का निर्णय किया है...5 सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले में स्पष्ट रूप से कहा है कि फिर कोई मामला संविधान पीठ के समक्ष लाया जाता है तो उसका जवाब देना पीठ का दायित्व बन जाता है...तभी तो संविधान पीठ यह तय करेगी कि 2016 के नोटबंदी के फैसले की नीतिगत रूप से अनिवार्यता केवल अकादमिक कवायद तो नहीं थी...तभी तो संविधान पीठ ने केंद्र सरकार और आरबीआई से इन दोनों मामलों में विस्तृत हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया...संविधान पीठ का या फिर न्यायालय में पहुंचे किसी भी मसले पर न्याय मंदिर का कर्तव्य है कि वह मुद्दे के रूप में उठाए गए सवालों का समाधानकारी जवाब दे या उससे जुड़े पक्षों से जवाब लें...तभी तो न्यायाधीशों ने कहा कि हम हमेशा जानते है कि लक्ष्मण रेखा कहां हैं..? लेकिन जिस तरह से इसे किया गया उसकी पड़ताल की जानी चाहिए...और इसके लिए हमें यह तय करने हेतु वकील को सुनना पड़ेगा...बात सही भी है कि नोटबंदी का जो भी सकारात्मक असर रहा हो या नक्सलवाद, आतंकवाद की कमर टूटी हो...लेकिन यह भी नहीं भुलना चाहिए कि बैंकिंग भ्रष्टाचार का भी नोटबंदी के समय ही भयावह रूप सामने आया है...जिसका समाधान जरूरी है...
दृष्टिकोण
हिजाब और विभाजित फैसला...
चीन, फ्रांस जैसे देशों में बुर्के पर प्रतिबंध है..,तो दूसरी तरफ स्विट्जरलैंड में भी बुर्के पर प्रतिबंध की तैयारी चल रही है...यही नहीं अरब देशों में भी अब तो तथाकथित सुरक्षा आवरण हिजाब के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन होने लगा है..,कट्टर मुस्लिम देशों में हिजाब, तीन तलाक जैसे मसलों पर स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के मान से सारे घटनाक्रम आकार ले रहे है...कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी धर्म स्त्री-पुरुष में असमानता का भेद पैदा करके उनके शारीरिक, मानसिक शोषण की ढाल उपलब्ध करवाने का हिमायती नहीं है...तभी तो ऐसे अनेक मुस्लिम और गैर मुस्लिम देश है जहां पर तीन तलाक को कोई मान्यता नहीं...हिजाब जहां पर स्वीकार नहीं...लेकिन भारत में इस तरह के बेढंगे नियमों या कहे कि कुरीतियों और धर्मांधता से ओतप्रोत कट्टरपंथी-शोषणकारी सोच को इस्लाम के, कुरान के और हदिश के अनुरूप बताकर लंबे समय से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर कुंडली मारकर चरमपंथी धड़ें उनका मानसिक, शारीरिक शोषण करते रहे...आखिर हिजाब को घर से बाहर निकलने के बाद किसी भी सरकारी संस्थान या कार्यालय में अनिवार्य रूप से लागू करने, कराने की ऐसी बेजा जिद्द क्यों दिखाई जा रही है..? कुछ धड़ों ने इसी तरह से तीन तलाक को इस्लाम के मान से सही ठहराते हुए उसके लिए भी न्यायालय में एड़ी चोटी का जोर लगाया था...अब कर्नाटक के स्कूलों एवं सरकारी संस्थानों में हिजाब की अनिवार्यता का इस्लाम की नाक का सवाल बताकर कुछ धड़ें कुतर्क के लंबे-लंबे पहाड़ खड़े कर रहे है..,लेकिन उन्हें ध्यान रखना होगा कि किसी भी सरकारी संस्थान फिर चाहे वह शैक्षणिक गतिविधियों का केंद्र ही क्यों न हो..? वहां पर सबके लिए समान रूप से गणवेश एवं एकरूपता जरूरी है...विभाजित फैसला आज नहीं तो कल हिजाब के खिलाफ के निर्णय की आधारभूत की नींव बनेगा...