भारतीय दवा उद्योग के विरुद्ध वैश्विक षड्यंत्र
   Date15-Oct-2022

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प्रमोद भार्गव
कोरोनाकाल में भारतीय दवा उद्योग ने गुणवत्तापूर्ण दवा और कोविड-19 टीका विकसित व वितरित कर विश्वव्यापी प्रतिष्ठता अर्जित की थी। लेकिन अब हरियाणा की एक दवा कंपनी द्वारा निर्मित कफ सिरप को लेकर विवाद व संदेह उत्पन्न हो गया है। खांसी व ठंड को काबू में लेने वाले इस सिरप के पीने से अफ्रीकी देश गांबिया में 66 बच्चों की मौत हो गई है। सभी मृतक बच्चे पांच साल से कम उम्र के थे और ये दवा लेने के बाद तीन से पांच दिन के भीतर भगवान को प्यारे हो गए। इस दवा में डाइथिलीन ग्लायकोल और इथिलीन ग्लायकोल की मात्रा औसत से ज्यादा पाई गई। जिसके चलते मृतक बच्चों के गुर्दे नहीं भरने वाले घाव में बदल गए। नतीजतन विश्व स्वास्थ्य संगठन को सक्रिय होना पड़ा और उसने मौत का कारण तय किया। डब्ल्यूएचओ ने अनेक देशों को इस सिरप की बिक्री पर रोक लगाने की सलाह दी है। भारत सरकार ने भी दवाओं के नमूने लेकर कोलकाता की प्रयोगशाला में जांच के लिए भेज दिए हैं। अतएव कह सकते है कि भारत के दवा कारोबार की साख पर आंच आई है। इससे भारत में बनाई जाने वाली सस्ती व असरकारी दवाओं के अंतरराष्ट्रीय बाजार को भी बट्टा लगेगा। लेकिन चिंता की बात यह है कि एक कफ सिरप के प्रयोगशाला में परीक्षण के दौरान सामने आए अस्थायी नतीजों को दवा में घातक तत्व होने का कारण कैसे मान लिया गया ? डब्ल्यूएचओ ने कुल 23 नमूने लिए थे, जिनमें जांच के बाद केवल चार में घातक एवं प्रतिबंधित रसायन होने का पता चला है। इसलिए यह संशय सहज रूप से उत्पन्न होता है कि कहीं भारतीय दवा उद्योग को प्रभावित करने का यह षड्यंत्र तो नहीं है। क्योंकि कोरोनाकाल में भी डब्ल्यूएचओ और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भारत के दवा उद्योग को प्रभावित करने की कोशिश की थी। इनमें वैश्विक प्रसिद्धि प्राप्त मेडिकल जर्नल 'लांसेट' और बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स स्थित न्यूज वेबसाइट इयू रिपोर्टर ने भ्रामक रिपोर्टें प्रकाशित की थी। इनकी पृष्ठभूमि में विदेशी दवा कंपनियों की मजबूत लॉबी थी। दरअसल से कंपनियां नहीं चाहती कि कोई विकासशील देश कम कीमत पर दुनिया को सस्ती व असरकारी दवा उपलब्ध कराने में सफल हो जाए। कोरोना की पहली लहर ने जब चीन की वुहान प्रयोगशाला से निकलकर दुनिया में हा-हाकार मचा दिया था, तब इससे निपटने का दुनिया के पास कोई इलाज नहीं था। लेकिन भारतीय चिकित्सकों ने हाईड्रोक्सीक्लॉरोक्वीन जिसे एचसीक्यू कहा जाता है, उसे इस संक्रमण को नष्ट करने में सक्षम पाया। भारत में पहली लहर का संक्रमण इसी दवा के उपचार से खत्म किया गया। यह दवा इतनी सफल रही कि अमेरिका समेत दुनिया के डेढ़ सौ देशों में दवा की आपूर्ति भारत को करनी पड़ी थी। दवा के असर और बढ़ती मांग के दौरान लांसेट ने एक कथित शोध लेख छापा कि एचसीक्यू दवा कोरोना के इलाज में प्रभावी नहीं है। इस रिपोर्ट के आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस दवा के क्लिनिकल परीक्षण पर रोक लगा दी थी। इसीलिए यह संदेह उभरता है कि जब सिरप में मौजूद घातक तत्व और उनकी अधिक्ता की जांच ठीक से हुई ही नहीं है, तब यह कैसे कहा जा सकता है कि सिरप में गुद्र्रों को नुकसान पहुंचाने वाले तत्व मौजूद थे। इस मुद्दे पर संशय इसलिए भी बना है, क्योंकि दुनिया में पहली बार किसी भारतीय दवा से एक साथ इतनी मौतों का दावा किया गया है। हालांकि घटिया और नकली दवाएं भारत में बनती और बेची जाती रहीं हैं। सरकार की ही एक रिपोर्ट से पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर में 17 प्रतिशत और हिमाचल प्रदेश में 7 प्रतिशत नकली दवाएं बेची जाती हैं। हालांकि दवा कंपनियों की मुनाफाखोरी और अमानक दवाओं को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। भारतीय कंपनियां भी इस मुनाफे की हवस में शामिल हैं। कंपनी मामलों के मंत्रालय की एक सर्वे रिपोर्ट कुछ समय पहले आई थी, जिसमें खुलासा किया गया था कि दवाएं महंगी इसलिए की जा रही हैं, जिससे दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाएं। इस रिपोर्ट ने तय किया है कि दवाओं की महंगाई का कारण दवा में लगने वाली सामग्री का महंगा होना नहीं है, बल्कि दवा कंपनियों का मुनाफे की हवस में बदल जाना है। इस लालच के चलते कंपनियां राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के नियमों का भी पालन नहीं करती हैं। इसके मुताबिक दवाओं की कीमत लागत से सौ गुनी ज्यादा रखी जा सकती है, लेकिन 1023 फीसदी तक ज्यादा कीमत वसूली जा रही है। इसके पहले नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने भी देशी-विदेशी दवा कंपनियों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि दवा कंपनियों ने सरकार द्वारा दी उत्पाद शुल्क का लाभ तो लिया लेकिन दवाओं की कीमतों में कटौती नहीं की। इस तरह से ग्राहकों को करीब 43 करोड़ का चूना लगाया। साथ ही 183 करोड़ रुपए का गोलमाल सरकार को राजस्व कर न चुकाकर किया है। इस धोखाधड़ी को लेकर सीएजी ने सरकार को दवा मूल्य नियंत्रण अधिनियम में संशोधन का सुझाव दिया था। यह सरकार की ढिलाई का ही परिणाम है कि उत्पाद शुल्क में छूट लेने के बावजूद कंपनियों ने कीमतें तो कम की नहीं, उल्टे नकली व स्तरहीन दवाएं बनाने वाली कंपनियों ने भी बाजार में मजबूती से कारोबार फैला लिया। इंसान की जीवन-रक्षा से जुड़ा दवा कारोबार दुनिया में तेजी से मुनाफे की अमानवीय व अनैतिक हवस में बदलता जा रहा है। चिकित्सकों को महंगे उपहार देकर रोगियों के लिए महंगी और गैर-जरूरी दवाएं लिखवाने का प्रचलन लाभ का धंधा बन गया है। विज्ञान की प्रगति और उपलब्धियों के सरोकार आदमी और समाज के हितों में निहित हैं। लेकिन मुक्त बाजार की उदारवादी अर्थव्यवस्था के चलते बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जो आगमन हुआ, उसके तईं जिस तेजी से व्यक्तिगत व व्यवसायजन्य अर्थ-लिप्सा और लूटतंत्र का विस्तार हुआ है, उसके शिकार चिकित्सक तो हुए ही, सरकारी और गैरसरकारी ढांचा भी हुआ। नतीजतन देखते-देखते भारत के दवा बाजार में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की 70 प्रतिशत से भी ज्यादा की भागीदारी हो गई। इनमें से 25 फीसदी दवा कंपनियां ऐसी हैं, जिन पर व्यवसायजन्य अनैतिकता अपनाने के कारण अमेरिका भारी आर्थिक दण्ड लगा चुका है। 2008 में भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी रैनबैक्सी की तीस जेनेरिक दवाओं को अमेरिका ने प्रतिबंधित किया था। रैनबैक्सी की देवास (मध्यप्रदेश) और पांवटा साहिब (हिमाचल प्रदेश) में बनने वाली दवाओं के आयात पर अमेरिका ने रोक लगाई थी। अमेरिका की सरकारी संस्था फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) का दावा था कि रैनबैक्सी की भारतीय इकाइयों से जिन दवाओं का उत्पादन हो रहा है उनका मानक स्तर अमेरिका में बनने वाली दवाओं से घटिया है। ये दवाएं अमेरिकी दवा आचार संहिता की कसौटी पर भी खरी नहीं उतरीं। जबकि भारत की रैनबैक्सी ऐसी दवा कंपनी है, जो अमेरिका को सबसे ज्यादा जेनेरिक दवाओं का निर्यात करती है। ऐसी ही बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसी आचार संहिता के पालन के पक्ष में नहीं हैं। किसी बाध्यकारी कानून को अमल में लाने में भी ये रोड़ा अटकाने का काम करती हैं। क्योंकि ये अपना कारोबार विज्ञापनों व चिकित्सकों को मुनाफा देकर ही फैलाये हुए हैं। छोटी दवा कंपनियों के संघ का तो यहां तक कहना है कि यदि चिकित्सकों को उपहार देने की कुप्रथा कानूनी तौर से रोक लगा दी जाए तो दवाओं की कीमतें 50 फीसदी तक कम हो जाएंगी। चूंकि दवा का निर्माण एक विशेष तकनीक के तहत किया जाता है और रोग व दवा विशेषज्ञ चिकित्सक ही पर्चे पर एक निश्चित दवा लेने को कहते हैं। दरअसल इस तथ्य की पृष्ठभूमि में यह मकसद अंतर्निहित है कि रोगी और उसके अविभावक दवाओं में विलय रसायनों के असर व अनुपात से अनभिज्ञ होते हैं, इसलिए वे दवा अपनी मर्जी से नहीं ले सकते। इस कारण चिकित्सक की लिखी दवा लेना जरूरी होती है, लिहाजा चिकित्सक मरीज की इस लाचारी का लाभ धड़ल्ले से उठा रहे हैं। यही वजह है कि पवित्र स्वास्थ्य सेवा एक ऐसे चिकित्सा उद्योग में बदल गई है, जो रोगी पैदा करने का काम कर रही है। चिकित्सक अंतत: किसकी सेवा करते हैं? क्या लोगों की? मरीजों की? नहीं, चिकित्सक दवा उद्योग की सेवा करते है। चिकित्सा शिक्षा को इसलिए ग्रहण लग गया है, क्योंकि उसका अपहरण दवा उद्योग ने कर लिया है।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार
और पत्रकार हैं।)