मंदी और भारत से उम्मीदें...
   Date14-Oct-2022

vishesh lekh
पूरी दुनिया पर आर्थिक मंदी का भयावह साया मंडरा रहा है... जिस तरह से रूस-यूक्रेन युद्ध और इसके पूर्व कोरोनाकाल की विभीषिका ने बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्था को तोड़कर रख दिया, उसका दुष्परिणाम संभवत: अब दूसरे दौर में 2023 में दिखलाई पड़े तो अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए... क्योंकि कई बार उत्पादन, निर्यात में आने वाली गिरावट कुछ समय बाद अपना असर दिखाती है... इसको ऐसे भी देख सकते हैं कि कई बार महामारी बार-बार अपना रूप व मारक क्षमता बदलकर लौट-लौटकर आती है... उसका भी कहीं न कहीं अर्थव्यवस्था के मान से दुष्परिणाम झलकता है... आज स्थिति इसीलिए दुनिया में विकट होती जा रही है कि आर्थिक क्षेत्र में लगातार उत्पादन एवं निर्यात के साथ ही निर्माण के क्षेत्र में अनेक तरह की चुनौतियां आ रही है... अमेरिका, चीन जैसे देशों में एक मुश्तरूप से कर्मचारियों की छंटनियां हो रही है... चीन से तो बड़ी-बड़ी कंपनियां पलायन करने का मन बना रही है... अर्थव्यवस्था को गति देने वाले अनेक कारोबारी बैंक चीन-अमेरिका में दिवालिया घोषित हो चुके हैं... फिर ऐसे ही बड़े अन्य देशों में लंबी होती हड़तालों ने भी स्थितियों को बिगाड़ा है... ऊपर से रूस-यूक्रेन के इस संकट ने अन्य देशों के सीमा विवाद एवं आपसी संबंधों को खतरे में डालने का संकेत कर दिया है... ऐसे में अगर कहीं से अर्थव्यवस्था को गति देने की संभावनाएं बनती नजर आती है तो वह भारत ही है, जहां पर घरेलू स्तर पर भी आर्थिक प्रबंध की एक जीवनशैली रही है... क्योंकि अब दुनिया सिर्फ बैंकों के भरोसे अर्थात कर्ज के मायाजाल में उलझकर आर्थिक बदहाली का शिकार हो रही है... जबकि भारत ने कुछ पैसा हमेशा घर में सुरक्षित रखने या फिर बचत वाली अनेक तरह की योजनाओं से जुड़कर भविष्य को सुरक्षित रखने के इस अभिनव प्रयासों को ही मंदी के दौर में कारगर उपाय और सुरक्षात्मक आवरण के रूप में देखा जाता है... तभी तो अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने भारत के आर्थिक विकास दर के अनुमान में कटौती की है, लेकिन यह भी स्वीकार किया है कि अन्य देशों के मुकाबले भारत में आर्थिक हालात बेहतर रहेंगे... क्योंकि आज दुनिया के हर किसी देश की आर्थिक विकास के मामले में गति धीमी होती जा रही है, लेकिन भारत में कृषि व्यवस्था के साथ ही रोजगार एवं निर्माण के साथ ही उत्पादन को निर्बाध रखने वाली एक परंपरागत उत्सवशैली एवं आदान-प्रदान के साथ जोड़े रखने की व्यापार-कारोबार शैली मौसम की अनुकूलता-प्रतिकूलता का दंश झेलकर भी अपनी सक्रियता बनाए रखने में सफल होती है... यह हमने कोरोनाकाल में करके दिखाया है, इसलिए भविष्य की आर्थिक मंदी के मान से दुनिया की उम्मीदें भारत पर ही टीकी हैं...
दृष्टिकोण
खडग़े की स्वीकारोक्ति...
कांग्रेस में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के दो प्रत्याशी चुनाव के लिए आमने-सामने है... मल्लिकार्जुन खडग़े और शशि थरूर... वैसे तो दस जनपथ दरबार की पहली पसंद मल्लिकार्जुन खडग़े ही है और इसमें कोई दो राय नहीं कि वह सोनिया की पसंद-नापसंद को ध्यान में रखकर अंतत: उस पद पर आरूढ़ होकर उन्हीं के हुक्म की तालिम करेंगे... इसलिए चुनाव के अंतिम दिन दस जनपथ से खडग़े के पक्ष में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दिशा-निर्देश भी जारी हो जाए या अंतर्रात्मा का हवाला देकर सीधा खडग़े के पक्ष में मतदान की राह खुल जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए... 80 वर्षीय खडग़े पार्टी को एकजुट करने का लगातार दावा कर रहे हैं, लेकिन उनका यह दावा कैसे फलीभूत होगा, जब वह स्वयं को चुनाव में बलि का बकरा मानकर इस बात को बड़े ही स्पष्टता के साथ कह रहे हैं कि ईद पर बचेंगे, तब मुहर्रम में नाचेंगे... यानी खडग़े को अभी भी इस बात की शंका-अशंका है कि कहीं जी-23 के असंतुष्ट धड़े थरूर को जिताने के लिए मोर्चाबंदी तेज कर देंगे... तो हो सकता है बाजी पलट जाए या थरूर के चुनावी जीतने की संभावना बढ़ जाए... कुछ इसी तरह का भय संभवत: खडग़े को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर रहा है कि वह स्वयं को इस चुनाव में बलि का बकरा मान रहे हैं... भले ही कांग्रेस के इस संगठन चुनाव को कांग्रेस पार्टी और उनके नेता व पदाधिकारी संविधान के अनुरूप बता रहे हो, लेकिन अपने चुनाव प्रचार-प्रसार के लिए मध्यप्रदेश में भोपाल आए मल्लिकार्जुन खडग़े ने जो पीड़ा व्यक्त की है, वह इस बात का संकेत है कि कांग्रेस में फिलहाल चुनाव औपचारिकता चल रही है... लेकिन जिस तरह से थरूर लगातार अपना संपर्क बढ़ा रहे हैं, उसके बाद खडग़े ने जो स्वीकारोक्ति की है, उसका भी संकेत व संदेश तो यही है कि कांग्रेस में अभी बहुत कुछ उठा-पटक शेष है...