राष्ट्र समृद्धि का मूल मंत्र दायित्व बोध
   Date11-Oct-2022

dharmdhara
धर्मधारा
ह मारे देश का परिचय सभ्य, शालीन एवं ं सुसंस्कृत सामाजिक व्यवस्था से होता है। भारत की अपनी अमूल्य निधि के रूप में ये गुण यहां हमेशा से स्थापित रहे हैं। अनेकता में एकता भारतवर्ष की विशेषता रही है। इस सिद्धांत के पीछे यहां की सभ्यता, शालीनता एवं सुसंस्कृति ही महत्वपूर्ण गुण रहे हैं। इस सिद्धांत का अनपम उदाहरण होने की वजह से भारत को विश्व में सम्मानित दृष्टि से देखा जाता है। एकदूसरे के प्रति परस्पर सहयोग की भावना, अपने अग्रजों का सम्मान, माता-पिता एवं गुरुजनों में ईश्वर के रूप का दर्शन, अन्य धर्मों-मजहबों व समुदायों के प्रति समानता एवं सहिष्णुता का व्यवहार इत्यादि यहां के विशेष गुण एवं विशेषताएं माने जाते हैं।
ग्रामीण अंचल हो अथवा छोटा कस्बा, छोटे शहर हों अथवा महानगर-भारतवर्ष में सर्वत्र हमें उपरोक्त गुणों के दर्शन होते आए हैं। अपने न्यायालय हों अथवा अपनी पाठशालाएं, अपना परिवार हो अथवा अपना धर्म, यहां के मंदिर हों अथवा मस्जिदें, गुरुद्वारे हों अथवा यहां के गिरजाघर-सभी जगह से आपसी भाईचारा, सहयोग, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह आदि मानवीय गुणों का पालन एवं मानवीय मूल्यों की रक्षा का संदेश ही दिया जाता है।
हिंसा-प्रतिहिंसा, छल-कपट, असहयोग, ईष्र्या-द्वेष आदि अमानवीय गुणों की यहां सर्वत्र निंदा की जाती रही है। सद्गुणों एवं सद्विचारों को ही आभूषण के रूप में ग्रहण करने की शिक्षा यहां के विद्यालय, महाविद्यालय एवं धर्मग्रंथ हमेशा से देते आ रहे हैं। पाश्विक प्रवृत्ति का परित्याग एवं मानवीय गुणों के प्रति आकर्षण यहां का मूल पाठ रहा है। भारत की इसी शालीनता एवं सभ्यता की संस्कृति को आगे बढ़ाते हुए मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना प्रत्येक भारतीय का प्रथम कर्तव्य है। भारत की युवा पीढ़ी का दायित्व है कि इस कर्तव्य के निर्वहन में हमेशा तत्पर रहें एवं भारत की गौरवशाली परंपरा को जीवित रखने में सार्थक भूमिका निभाएं।