'एक राष्ट्र-एक भाषा' को प्रतीक्षारत हिंदी...
   Date09-Jan-2022

parmar shakti
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
भा रत माता के मुकुट पर स्वाभिमानी बिंदी के रूप में देखी-समझी, बोली और स्वीकारी जाने वाली हमारी हिंदी का यह विस्तार नहीं तो और क्या है..? आज मातृभाषा, संवाद भाषा, संपर्क भाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा और अब विश्व भाषा के रूप में हिंदी की पहचान-प्रसिद्धि से बढ़कर उसके द्वारा कार्यसिद्धि के जो सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं, वे हमें हमारी राजभाषा अर्थात् राष्ट्रभाषा के हिंदी के उस वृहद व्याप से परिचित करा रहा है..,जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक सर्वत्र रूप से ऊंचे-धीमे स्वर में न केवल बोली और सुनी जाती है..,बल्कि स्वीकार भी है...यही नहीं, अब तो हमारी हिंदी सात समंदर पार अमेरिका से लेकर यूरोप और अफ्रीकी देशों में भी अपनी सर्वस्वीकार उपयोगिता का लोहा मनवा रही है...क्योंकि विदेशों में हिंदी के प्रति तेज गति से रुचि बढ़ रही है... जगह-जगह हिंदी सीखने के लिए केंद्र खुल रहे हैं...दिल्ली विश्वविद्यालय के महाविद्यालयों में हिंदी के प्रति बढ़ती विदेशियों की रुचि का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि विदेशी छात्र भी अध्ययन में हिंदी को प्राथमिकता से ले रहे हैं...तकनीकी दौर में तो हिंदी ने जिस तरह से अपना एक अलग सर्वमान्य एवं पेशेवर स्थान बहुत सीमित समय में बनाया है, वह आश्चर्य में डालता है..!
कम्प्यूटर एवं तकनीक से जुड़े लगभग सभी तरह के कार्यों की आज हिंदी में सेवाएं दी और ली जा रही हैं...हिंदी पढऩे-लिखने वालों को आसानी हो, इसके लिए भी लगातार हिंदी में व्यवहार अनुकूल सॉफ्टवेयर तैयार किए जा रहे हैं..,जिसकी मांग भी उत्तरोत्तर बढ़ती चली जा रही है...विज्ञान-तकनीक, कम्प्यूटर, मोबाइल, टीवी, कला, फिल्म, खेल से लेकर राजनीति तक में हिंदी में संपर्क-संवाद एवं हर तरह की अभिव्यक्ति को हिंदी ने एक नए रूप में क्रांतिकारी बदलाव से गुजारकर नए मुकाम पर ला खड़ा किया है...ऐसे में विचारणीय बिंदु यह भी है कि हम हमारी हिंदी अर्थात् राजभाषा/राष्ट्रभाषा को प्रांतीय भाषाओं के उस दिशाभ्रम से निकालकर क्या विश्व भाषा बनाने के लिए तैयार हैं..? अगर इस प्रश्न का उत्तर हां है तो सबसे पहले भारत में हमें 'एक राष्ट्र-एक भाषा' के मूलमंत्र को स्वीकार करते हुए हिंदी की संपूर्ण भारत में सर्वव्याप्तता का बीड़ा उठाना होगा...क्योंकि विश्व की अनेक भाषाओं को अपने अंदर समाहित कर चुकी 'हिंदी' वास्तव में आज अनेक भाषाओं की आश्रयस्थली के रूप में भी प्रसिद्धि प्राप्त कर रही है...ऐसे में विश्व स्तर पर हिंदी का भविष्य तो बहुत ही उज्ज्वल नजर आता है..,लेकिन अपने ही घर में लगातार पराई हो रही हिंदी जो कि अनेक तरह की विकृत शब्दावली अनुचित प्रयोगों/विश्लेषणों एवं हिंग्लिश के द्वारा जो नैसर्गिक गुण और प्रभाव खो रही है...उसका नुकसान भारतीयों को ही भुगतना पड़ेगा..,क्योंकि भाषा तो हमेशा अजर-अमर है...
किसी भी समाज-राज्य और राष्ट्र की कल्पना भाषा के बिना असंभव है..,क्योंकि भाषा ही वह माध्यम है, जो व्यक्ति को कार्यव्यवहार के साथ ही अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति का आधार प्रदान करता है...समाज के उद्भव, उन्नति एवं विकास का माध्यम भाषा ही होती है...हमारे विकास, निर्माण और संस्कृति के संरक्षण- संवर्धन के लिए हिंदी की एक अलग भूमिका है...क्योंकि भाषा के द्वारा जब विचारों का आदान-प्रदान होता है..,तो परस्पर रूप से घनिष्ठता आती है...ये घनिष्ठता ही एक स्वस्थ, सजग और समृद्ध समाज का निर्माण करती है...वर्तमान युग को औद्योगिक, व्यावसायिक एवं वैज्ञानिक-तकनीकों का कालखंड कहा जाता है...इस युग को यांत्रिकी अर्थात् कम्प्यूटर के रूप में भी पहचाना जाता है...ऐसे में वही भाषा चिरकाल तक जिंदा रहेगी या जन-जन की भाषा बनी रहेगी..,जो प्रयोजनमूलकता को बनाए रखने में सफल होगी... हिंदी का आज तकनीकी, वैज्ञानिक की के साथ ही साहित्यिक प्रयोजनमूलक रूप में विस्तार हुआ है...यह किसी भी समाज की उन्नति और विकास के लिए बोलचाल एवं साहित्य से भिन्न रूप में प्रयोग में लाया जाता है...यह हिंदी की सफलता ही है कि वह समय-देशकाल व परिस्थिति के मान से सभी भाषाओं को अपने में समाहित करके एक नए रूप में अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर भी अपना नैसर्गिक रूप नहीं खोती...संस्कृत के बाद अगर किसी भाषा ने देश-विदेश को एक साथ प्रत्येक स्तर पर जोडऩे का काम किया है तो वह हिंदी ही है...हिंदी के बिना किसी भी तरह के सृजन की कल्पना अधूरी है...
राज्यों में अपने-अपने भाषा-व्यवहार और कार्यशैली के मान से प्रांतीय भाषा को प्राथमिकता है...सही मायने में भारत एक बहुभाषी समाज के द्वारा ही राष्ट्र बनने की भूमिका का निर्वाह करने में सफल रहा है...स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधाओं ने इस बात को बहुत गहनता से महसूस किया था कि बहुभाषिक देश में एक संपर्क भाषा होना चाहिए..,जो संपूर्ण देश को जोड़ सके...आज तमिलनाडु से लेकर केरल और पश्चिम बंगाल से लेकर कन्याकुमारी, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश से महाराष्ट्र, झारखंड सबको संवाद-अभिव्यक्ति के मान से जोडऩे वाला प्रमुख सूत्र हिंदी ही है...इन राज्यों में स्थानीय भाषाओं से इतर हिंदी का वृहद व्याप और प्रभाव भी है...
स्वतंत्रता आंदोलन में विचार अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में हिंदी ने अमिट छाप छोड़ी है...क्रांतिकारियों के हिंदी में जोश-उत्साह एवं स्वतंत्रता प्राप्ति के भावपूर्ण शौर्यशाली नारों, संवादों, गीत, कविता, कहानी और अग्रलेख ने एक ऐसा माहौल निर्मित किया कि हिंदी उस समय पूरे देश को एक सूत्र में जोडऩे वाली मजबूत कड़ी बनकर उभरी..,तब हिंदी ने भाषाओं प्रांतों से जुड़ी लक्ष्मणरेखा को लांघकर सबको 'हिंदू-हिंदी-हिंदुस्तानÓ के भाव को जागृत करने में अहम भूमिका का निर्वाह किया...क्योंकि हिंदी के अग्रज कवियों, लेखकों ने संपर्क भाषा हिंदी के माध्यम से देशप्रेम के ज्वार को जन-जन तक पहुंचाया... हिंदी हैं हम, वतन है हिंदुस्तान हमारा..,का भाव एक स्वर में गुंजायमान किया...यह हिंदी की भाषा के रूप में सफलता है, जो जन-जन को जोड़ती है...
जीवमात्र या कहें संपूर्ण प्राणीमात्र में मनुष्य ही ईश्वर की सर्वोत्तम कृति के रूप में देखा जाता है..,क्योंकि उसके पास अपनी भावनाओं, विचारों, सुख-दु:ख से जुड़ी खुशी और पीड़ाओं को अभिव्यक्त करने के लिए सशक्त और सक्षम संवादशैली है...अर्थात् वह भाव अभिव्यक्त करने वाला इस धरा पर एकमात्र प्राणी है..,लेकिन जब इन्हीं भाव-व्यंजनाओं को हिंदी भाषा के माध्यम से व्यक्त किया जाए तो फिर विश्व की तमाम भाषाओं के द्वारा भी जो संदेश/संवाद और संपर्क अधूरा है..,असंभव है, वह हिंदी के द्वारा आसानी से सफल और संभव होता है..,क्योंकि भाषा विज्ञान के अनुसार हिंदी एक पूर्ण भाषा है...तकनीक के रूप में हिंदी की देवनागरी लिपि पूर्णत: वैज्ञानिक है...हिंदी भाषा में जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है...जिसके कारण संवाद व संपर्क में त्रुटि की आशंकाएं निर्मुल हो जाती है...अत: संविधान की धारा 334 के अंतर्गत देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है...अंग्रेजी के मोहजाल में फंसे अंग्रेजीयत पर सवार लोगों को यह बताने की जरूरत नहीं कि अंग्रेजी भाषा की व्याकरण और उसकी शब्द रचना हिंदी के आगे कहीं नहीं टिकती...इसीलिए हिंदी सशक्त है...अंग्रेजी के 26 स्वर व्यंजनों की तुलना में हिंदी के पास स्वर और व्यंजन 46 हैं...कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी भाषा में अंग्रेजी के बजाय ज्यादा व्यापकता है...क्योंकि हिंदी हमारी राजभाषा के साथ संपर्क भाषा और संपूर्ण देश की भावनाओं का सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति माध्यम भी है...विश्व में हिंदी 1952 में 5वें स्थान पर थी...1980 के आसपास के यह चीनी व अंग्रेजी के बाद दूसरे स्थान पर आ गई और 1991 की जनगणना में हिंदी को मातृभाषा घोषित करने वालों की संख्या के आधार पर यह पाया गया कि विश्व में हिंदी के प्रयोग करने वालों की संख्या चीनी से अधिक है...यानी हिंदी आज विश्व की सबसे स्वीकार भाषा बन चुकी है...जरूरत है उसे अपने ही देश में स्वाभिमानी भाव के साथ देखने/समझने, पढऩे/लिखने और अंगीकार करने की...