नौनिहालों को सुरक्षा कवच...
   Date04-Jan-2022

vishesh lekh_1
वैश्विक महामारी कोरोना से लडऩे के लिए भारत लगातार मोर्चे पर अपने तरीके से प्रयास कर रहा है और उसे इस लड़ाई में बहुत हद तक पूर्ण विजय भी मिल रही है... क्योंकि अमेरिका जैसे तथाकथित विकसित और संसाधन सम्पन्न देश में जब कोरोना महामारी से 8 लाख से अधिक लोग जान गंवा चुके हैं, उस तुलना में जनसंख्या के मान से देखें तो भारत ने इस महामारी को पहली, दूसरी लहर में नियंत्रित करने और भविष्य के मान से तीसरी लहर के संभावित खतरे को टालने का उचित प्रबंधन नजरिया दुनिया के सामने रखा है... भारत में करीब आधी आबादी को दोनों डोज लगने की स्थिति है... ऐसे में मध्यप्रदेश के इंदौर व अन्य बड़े शहरों की स्थिति तो यहां तक है कि दोनों डोज पूर्ण रूप से लग चुके हैं... यह टीकाकरण इसलिए भी विश्व के लिए मायने रखता है कि यह सबसे बड़ा नि:शुल्क टीकाकरण अभियान है.. 15 से 18 आयु वर्ग के 8 करोड़ बच्चों को देश में टीका लगाने का ऐतिहासिक कदम केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने बढ़ा दिया है... रजिस्ट्रेशन के साथ हाथोंहाथ टीकाकरण के लिए जिस तरह का उत्साह बच्चों/नौनिहालों और पालकों के साथ ही स्कूल प्रबंधन में दिखाई पड़ता है, इससे साफ है कि जल्द ही हर कोई कोरोना से बचने के लिए सुरक्षा कवच प्राप्त करने की इच्छा रखता है... इस दिशा में हर राज्य में बच्चों के टीकाकरण के लिए अपना लक्ष्य भी तय कर लिया है... मध्यप्रदेश में जहां अगले 10 दिनों में 50 लाख बच्चों के टीकाकरण का लक्ष्य है, तो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में 1 करोड़ 40 लाख बच्चों को टीका लगाने की तैयारी की है... महाराष्ट्र में 80, बिहार में 75 और राजस्थान में 30, जबकि गुजरात में 36 लाख बच्चों को टीकाकरण के दायरे में लाया जाएगा... मध्यप्रदेश में 36 लाख स्कूलों में कोरोना टीकाकरण सोमवार से शुरू हुआ, इसके लिए स्कूल प्रबंधन के साथ ही पालकों की भी जवाबदेही सुनिश्चित की गई है... सही मायने में संभावित तीसरी लहर की जद में हमारी यह नौनिहाल आबादी खतरे में बताई जा रही है, उस मान से अगर केन्द्र ने राज्यों के साथ मिलकर नौनिहालों को सुरक्षा कवच प्रदान करने की ऐतिहासिक पहल की है, तो इसका सकारात्मक संदेश भी समाज में गया है, क्योंकि अनेक बार महामारियों से लडऩे में आत्मविश्वास व आत्मबल बढ़ाने वाले विचार व कार्य भी सार्थक सिद्ध होते हैं... नौनिहालों को सुरक्षा कवच हमें कोरोना की तीसरी लहर से लडऩे में और मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा करेगा...
दृष्टिकोण
विदेशी चंदे पर अंकुश...
चंदे से जुड़ा खेल बड़ा निराला है... क्योंकि इसको लेने वाला और देने वाला दोनों ही कुछ इस तरह की दृष्टि के साथ काम करते हैं कि उनका अहित भी न हो और समस्या का समाधान भी हो जाए... इसलिए चंदे से जुड़ी यह ऐसी भूलभुलैया है, जिसमें स्थिति अनेक बार स्पष्ट होने के बजाय गंभीर होती चली जाती है... फिर चाहे वह राजनीतिक चंदे का मामला हो या फिर धार्मिक आयोजनों के मान से एकत्रित किया जाने वाला चंदा हो या फिर जरूरतमंद लोगों के भोजन, शिक्षा, आवास और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं और संसाधन जुटाने के लिए संस्थाओं और संगठनों एवं एनजीओ द्वारा जो धन लिया जाता है, वह भी चंदे के रूप में ही होता है... लेकिन जब चंदे का खेल एक ऐसा गंदा धंधा बन जाए, उसका उद्देश्य ही समाज-राष्ट्र के मान से नुकसानदायक साबित हो, ऐसे चंदे के धंधे पर अंकुश और वह भी सख्ती के साथ जरूरी है... एफसीआरए (विदेशी चंदा विनियम अधिनियम) के तहत भारत में 6000 संस्थानों का पंजीकरण रद्द किया गया है, जो कि विदेशों से आर्थिक लाभ प्राप्त करके उसे दिखाने के लिए जरूरतमंदों को शैक्षणिक गतिविधियों के लिए उपलब्ध करवाते हैं या फिर इसका कोई दूसरा ही उपयोग होता है... भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी, दिल्ली) जामिया मिल्लिया इस्लामिया, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) और नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय उन 6000 संस्थानों और संगठनों में शामिल है, जिनका एफसीआरए पंजीकरण रद्द किया गया है... क्योंकि एफसीआरए संबंधित जिन संस्थानों, संगठनों का नियम के तहत पंजीकरण समाप्त हो गया था या वैधता समाप्त हो गई थी, उनमें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र भी शामिल है... ऐसे में इनका पंजीकरण रद्द किया गया, तब तक इन्हें विदेशी चंदे की अनुमति नहीं होगी, जब तक इनका नियम के तहत पंजीकरण आगे नहीं बढ़ता या उस चंदे का स्पष्ट उद्देश्य ये लिखित रूप में एफसीआरए के तहत घोषित नहीं करेंगे... सही मायने में विदेशी चंदे के इस खेल पर ऐसा अंकुश बहुत पहले लग जाना था...