जीवन दृष्टि का अर्थ चित्त व संस्कार
   Date04-Jan-2022

dharmdhara
धर्मधारा
जिं दगी तो सभी जीते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि सभी सही शुरुआत के साथ, सही तरीके से, सही लक्ष्य के लिए जिंदगी जी रहे हों। सही और सच्ची जिंदगी के लिए आवश्यक है कि इसकी शुरुआत सही हो। सही शुरुआत से चूक जाने का तात्पर्य है जिंदगी से चूक जाना। अब प्रश्न है कि जिंदगी की सही शुरुआत कहां से करें? कैसे करें? तो सभी के लिए इसका एक ही सूत्र है-'जीवनदृष्टि का विकास जब तक जीवनदृष्टि विकसित नहीं होती, स्वयं के प्रति नजरिया स्पष्ट नहीं होता, तब तक जिंदगी की सही शुरुआत संभव नहीं है। जीवनदृष्टि का संबंध हमारी सोचने और समझने की अंत:प्रवृत्तियों से है और हमारे मन व चित्त-संस्कारों की प्रकृति से है। इसके साथ ही जिस परिवेश में हम रहते हैं व जिन आदर्शों को हम जीते हैं, वे भी हमारी जीवनदृष्टि को अत्यंत प्रभावित करते हैं। जीवनदृष्टि का निर्माण उन एहसासों से होता है, जिन्हें हम स्वयं के प्रति तथा अपने समाज, संबंधों व परिवेश से जड़ी संवेदनशीलता के द्वारा ग्रहण करते हैं। यह संवेदनशीलता जैसे-जैसे गहरी होती जाती है, वैसे-वैसे हमारे एहसास तीव्र होते जाते हैं और हमारे नजरिये को प्रभावित करते हैं। एहसासों के तीव्र और सघन होने पर हमारी जीवनदृष्टि में भी सूक्ष्मता, पैनापन और स्पष्टता विकसित होती चली जाती है। ऐसी सुविकसित जीवनदृष्टि के प्रकाश में ही हम जिंदगी की सही शुरुआत कर सकते हैं। एक सफल जीवन जीने के लिए सच्चा और कुशल मार्गदर्शन केवल विकसित जीवनदृष्टि से ही प्राप्त होता है। हमारे जीवन में इसे गढऩे वाले प्रेरक-कारक तत्व चाहे जो भी हों, किंतु जीवनदृष्टि ही वह तत्व है, जो हमें सही जीवन लक्ष्य का बोध कराती है।