ज्ञान और प्रकाश के एकीकरण का निमित्त सूर्योपासना
   Date14-Jan-2022

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प्रमोद भार्गव
आ ज मकर संक्रांति पर्व है और इस दिन सूर्योपासना का विशेष महत्व है। आमतौर पर सूर्य को प्रकाश और गर्मी का अक्षुण्ण स्त्रोत माना जाता है, लेकिन अब वैज्ञानिक यह जान गए हैं कि यदि सूर्य का अस्तित्व समाप्त हो जाए तो पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी जीव-जंतु तीन दिन के भीतर मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे। सौर मंडल के सौर ग्रह, उपग्रह और उसमें स्थित जीवधारी सूर्य से ही जीवन प्राप्त कर रहें हैं। पृथ्वी पर जीवन का आधार सूर्य ही है। सभी जीव-जंतु और वनस्पति जगत का जीवन चक्र सूर्य पर ही पूर्ण रूप से आश्रित है। सूर्य के इन्हीं गुणों के कारण वैदिक काल में अनेक काव्यात्मक सूक्तों की रचना की गई और ऐतिहासिक काल में सूर्य मंदिरों का निर्माण कराया गया। आदिमानव को सूर्य इसलिए चमत्कृत व प्रभावित करता था, क्योंकि वह अंधकार से मुक्ति दिलाता था और ठंड से बचाता था। सूर्य के प्रदेय में कोई भेद नहीं है। काल गणना का दिशा बोध भी मनुष्य को सूर्य ने ही दिया। इसलिए दुनिया की सभी जातियों और सभ्यताओं ने सूर्य को देवता के रूप में पूजा और अपनी-अपनी कल्पनाओं व लोकानुरूप मिथक गढ़े, जो किंवदंतियों के रूप में हमारे पास आज भी सुरक्षित है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में वैदिक काल में सूर्योपासना ज्ञान और प्रकाश के एकीकरण के लिए की जाती थी। तैत्रिय-संहिता में उल्लेख है कि सूर्य के प्रकाश से ही चंद्रमा चमकता है। 'छांदोग्य उपनिषद्Ó में सूर्य को ब्रह्म बताया गया है। गायत्री मंत्र में सूर्य को तेज और बुद्धि का पर्याय माना गया है। रामायण में राम, रावण से युद्ध का श्रीगणेश करने से पहले सूर्य की स्तुति करते हैं। महाभारत में तो कर्ण को सूर्य-पुत्र ही बताया गया है। कनिष्क तथा हुविष्क के सिक्कों पर सूर्य का अंकन है। कुषाणों ने अनेक नयनाभिराम सूर्य प्रतिमाओं का निर्माण कराया। हर्ष के राजकवि मयूर ने सूर्य की वंदना में सौ श्लोकों की रचना की। सूर्य की किरणों से चिकित्सा पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं। यजुर्वेद में स्पष्ट कहा गया है कि अंतरिक्ष में व्याप्त सभी विकिरणों में सूर्य की किरणें ही जीव जगत के लिए लाभदायी हैं। 1582 में अकबर ने एक नए धर्म 'दीन-ए-इलाहीÓ की शुरुआत की थी, जिसमें सूर्य पूजा का ही सर्वाधिक महत्व दर्शाया गया था। वैदिक रूप में सूर्य को काल गणना का कारण मान लिया गया था। ऋतुओं में परिवर्तन का करण भी सूर्य को माना गया। वैदिक समय में ऋतुचक्र के आधार पर सौर वर्ष या प्रकाश वर्ष की गणना शुरू हो गई थी, जिसमें एक वर्ष में 360 दिन रखे गए। वर्ष को वैदिक ग्रंथों में संवत्सर नाम से जाना जाता है। नक्षत्र, वार और ग्रहों के छह महीने तक सूर्योदय उत्तर-पूर्व क्षितिज से, अगले छह माह दक्षिण-पूर्व क्षितिज से होता है। इसलिए सूर्य का काल विभाजन उत्तरायण और दक्षिणायन के रूप में है। उत्तरायण के शुरू होने के दिन से ही रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। यही दिन मकर तथा कर्क राशि से सूर्य को जोड़ता है। इसलिए उस दिन भारत में मकर संक्रांति का पर्व मनाने की परंपरा है। वेदकाल में यह साफ तौर से पता लगा लिया था कि प्रकाश, ऊर्जा, वायु और वर्ष के लिए समस्त भूमंडल सूर्य पर ही निर्भर हैं। वेदकालीन सूर्य में सात प्रकार की किरणें और सूर्य रथ में सात घोड़ों के जुते होने का उल्लेख है। सूर्य रथ का होना और उसमें घोड़ों का जुता होना अतिरंजनापूर्ण लगता है। हालांकि सूर्य रथ की कल्पना काल की गति के रूप में की गई। सात प्रकार की किरणों को खोजने में आधुनिक वैज्ञानिक भी लगे हैं। नए शोधों से ज्ञात हुआ है कि सूर्य किरणों के अदृश्य हिस्से में अवरक्त और पराबैंगनी किरणें होती हैं। भूमंडल को गर्म रखने और जैव रासायनिक क्रियाओं को छिप्र रखने का कार्य अवरक्त किरणें और जीवधारियों के शरीर में रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने का काम पराबैंगनी किरणें करती हैं। वेदकालीन सूर्यलोक में दो देवियों की भी कल्पना की गई है। ये हैं उषा और सूर्या। ऋग्वेद में उषा की वंदना सूर्य के साथ बीस सूक्तों में की गई है। सूर्योदय के समय अंधेरे और उजाले के बीच जो संधिवेला है, वही उषा की प्रतीक है। सौर देवी सूत्रों की ऋग्वेद में पूरे सूक्त में स्तुति की है। भूमंडल को प्रकाशित करने का कारण उषा ही मानी जाती है।
दुनिया के सबसे बड़े मेले सिंहस्थ और कुंभ भी सूर्य के एक निश्चित स्थिति में आने पर लगते हैं। सिंहस्थ का पर्व तब मानाया जाता है, जब सिंह राशि में सूर्य आता है। इसमें स्नान एक निश्चित मुहूर्त में किया जाता है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार देव और दानवों ने समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश प्राप्त किया था। इसे लेकर विवाद हुआ। तब विष्णु ने सुंदरी रूप रखकर देवताओं को अमृत और दानवों को मदिरा पान कराया। राहु ने यह बात पकड़ ली। वह अमृत कलश लेकर भागा। विष्णु ने सुदर्शन चक्र छोड़कर राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया। इससे सिर 'राहुÓ और धड़ 'केतुÓ कहलाया। इस छीना-झपटी में जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरीं, वहां-वहां सिंहस्थ और कुंभ के मेले लगने लगे। इस वैदिक घटना को वैज्ञानिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। इस आख्यान एवं वैज्ञानिक शोध के बीच सामंजस्य बिठाया जा रहा है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. राम श्रीवास्तव का इस सिलसिले में कहना है- 'हमारे सौर मंडल में एमएस 403 का एक तारा है। यह हमारे सूर्य से दस हजार गुना बड़ा सूर्य है। इसे एक ब्लैक होल निगल रहा है। जिस तरह से शेर के मुंह से अपने को छुड़ाने को जानवर भागता है, ठीक उसी तरह यह दस हजार गुना बड़ा सूर्य ब्लैक होल के चारों ओर छूटकर भागने के लिए चक्कर काट रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में जैसे किसी अनारदाने से आतिशबाजी की चिंगरियां निकलती हैं, एमएस 433 के दोनों ओर यह अतिशबाजी निकल रही है। वैज्ञानिकों ने इसके प्रकाश का जब परीक्षण किया तो पाया कि 433 में ऐसे अनेक तत्व हैं, जिन्हें हमारा विज्ञान आज भी नहीं पहचानता। आज भी ऐसे तत्व अन्य किसी तारे में मौजूद नहीं हैं। यह भी एक विचित्र संयोग है, जब सिंहस्थ का मेला लगता है तो एसएस 433 सूर्य के साथ सिंह राशि में बीचोंबीच स्थित रहता है और सिंहस्थ व कुंभ स्नान के समय इससे निकलने वाला प्रकाश तथा आतिशबाजी सीधे पृथ्वी की ओर इंगित रहते हैं। मसलन हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य के अनेक रहस्यों को जानने के साथ मनुष्य के लिए उसकी उपयोगिता भी जान ली थी। इसलिए सिंहस्थ और कुंभ जैसे मेलों की शुरुआत हुई। ऋग्वेद में सूर्यग्रहण का भी उल्लेख है। प्रसिद्ध ऋषि अत्रि सूर्य को सूर्यग्रहण से मुक्त कराने का उपाय भी जानते थे। ऋग्वेद में उल्लेख है कि अंधकार रूपी स्वर्भानू असुर ने सूर्य को ग्रस लिया, तब आत्रि ने उसे अपने प्रताप के ग्रहण से छुड़ाया। ब्रह्माण्ड में घटी इस तरह की घटनाओं के प्रतिफलस्वरूप ही लोक जीवन से पुराकथाओं और मिथकों का जन्म हुआ। इसी तारतम्य में भारतीय संदर्भ में प्रमुख कथा है, 'एक बार गणेशजी भरपूर आहार ग्रहण करने के बाद आराम कर रहे थे। इसी समय उन्होंने सूर्य और चंद्रमा को अपने ऊपर हंसते पाया। इससे गणेश क्रोधित हो गए और उन्होंने कमर में लिपटे अजगर को आदेश दिया की वह ब्रह्माण्ड में पड़े इन पिण्डों को निगल जाए। अजगर ने सूर्य को निगलना शुरू कर दिया और पूरी दुनिया अंधकार में डूब गई। चराचर में हाहाकर मचने लगा। तब भूलोकवासियों ने गणेश से इस संकट से मुक्त कराने की प्रार्थना की। गणेश पिघल गए, लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी कि सूर्य व चंद्र को अपने किए का आभास कराने के लिए वे कुछ निर्धारित दिनों में आंशिक रूप से फिर सूर्य को निगल लिया करेंगे। इस मिथक के आधार पर ही संभवत: सूर्यग्रहण देखने की जिज्ञासा जनमानस में उत्पन्न हुई।
इस कथा के पीछे वैज्ञानिक मत है कि पूर्ण सूर्यग्रहण से करीब 30 सेकंड पहले आकाश में एकदम अंधेरा छा जाता है और सूर्य की किरणें ग्रहण के एक कोने से मुक्त होने लगती हैं, तब आकाश में ऐसी तरंगें फैल जाती हंै, जैसे कि लाखों सांपों के उलझे हुए गुच्छे फैल गए हों। पूर्ण ग्रहण समाप्त होने के बाद ऐसा ही अनुभव होता रहता है। करीब छह हजार साल पहले किए एक पूर्ण सूर्यग्रहण के अध्यन से अनुमान लगाया गया कि दो धुरियां हैं, पहली जिस पर धरती घूमती है और सूर्य का चक्कर लगाती है, दूसरी धुरी जिस पर चंद्रमा धरती का चक्कर लगाता है। जिन बिंदुओं पर आकर वे एक-दूसरे से मिलते हैं, उन्हें राहु और केतु कहा जाता है। ग्रहण का प्रभाव तभी सामने आता है जब सूर्य और चंद्रमा एक सीध में आमने-सामने आकर परस्पर निकट से निकलते हैं। (लेखक वरिष्ठ
साहित्यकार और पत्रकार हैं)