राजनीतिक रतौंधी के शिकार दिग्विजय सिंह
   Date13-Jan-2022

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डॉ. उत्तम मोहन सिंह मीणा
व रिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजयसिंह ने सोमवार को एक बार पुन: अपनी बदजुबानी से हिंदू धर्म और हिंदू संगठनों पर निशाना साधा। हमेशा से हिन्दू धर्म, परम्पराओं ओर संगठनों के विरोधी रहे दिग्गी स्टेट प्रेस क्लब द्वारा इंदौर में 'हिन्दू और हिंदुत्वÓ विषय पर आयोजित व्याख्यान में बोल रहे थे। जैसी की उम्मीद की जा सकती थी दिग्गी उससे भी संकीर्णता से बोले और हिंदुओं के विरुद्ध अपनी दूषित और कलुषित मानसिकता से अवगत करवाया। पाठकों को स्मरण करवाना चाहेंगे की यह वही दिग्विजयसिंह है जो कुख्यात इस्लामिक आतंकी लादेन को 'ओसामा जीÓ कह कर सम्बोधित करते है। यह वही दिग्गी है जो भारत विरोधी भगोड़े जाकिर नाइक के जलसों में जाकर कलमे पढ़ा करते थे और भारत और हिंदुओं को विश्वभर में बदनाम करने के लिए 'भगवा आतंकवादÓ नाम का फर्जी शब्द और थ्योरी गढ़ दी थी। इंदौर में एक बार फिर अपने अधूरे-अधकचरे ज्ञान से हिन्दू संगठनों पर हमला करते नजर आए।
अपने भाषण में दिग्गी ने कहा कि 'हिन्दू कभी अल्पसंख्यक नहीं हो सकतेÓ जबकि इराक-ईरान-अफगानिस्तान और 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान-पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) भारत से अलग ही इसलिए हुए क्योंकि हिन्दू अल्पसंख्यक हो गए थे। आजादी के बाद भी भारत के आठ राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हो गए है जिसमें कुछ राज्यों में 2 से 5 प्रतिशत ही बचे है। क्या इससे ऐसा प्रतीत नहीं होता कि दिग्विजय और कांग्रेस भारत के और टुकड़े करवाने की साजिश कर रहे है?
दिग्विजय ने कहा कि 'भारत में 800 सालों तक मुसलमानों ने और 200 सालों तक ईसाइयों ने राज किया तब हिन्दू खतरे में नहीं था तो अब कैसे?Ó लेकिन शायद दिग्विजय यह नहीं जानते कि इस कालखंड में हिन्दू प्रतिरोध का क्या इतिहास रहा है, हिंदुओं ने अपने अस्तित्व के लिए सतत् संघर्ष किया और इसीलिए बच पाए। उक्त अवधि में यदि सब कुछ बेहतर था तो दिग्गी यह भी बताए की भारत मे 40000 मंदिरों-देवालयों को किस मजहबी उन्मादियों ने ध्वस्त किया? सोमनाथ, जगन्नाथ, महाकाल, अयोध्या, काशी, मथुरा के विश्वविख्यात हिन्दू तीर्थों को किस जिहादी मानसिकता ने लूटा-तोड़ा? वो कौनसी आसुरी शक्तियां थी जो हिंदुओं के धार्मिक आयोजनों, तीर्थयात्राओं और धार्मिक अनुष्ठानों पर प्रतिबंध अथवा जजिया कर लगाती थी? यदि इस्लामिक और ईसाई शासन में सब कुछ अच्छा था तो फिर क्यों बप्पारावल से लेकर महाराणा प्रताप तक, छत्रपति शिवाजी से महाराज छत्रसाल तक, गुरु गोविंदसिंहजी से नेताजी सुभाषचंद्र बोस सहित हमारे नायकों ने सम्पूर्ण भारत भूमि पर जो संघर्ष किया, बलिदान दिए, धर्मयुद्ध लड़े वो क्या थे? अपने राजनैतिक आका राहुल गांधी के पदचिन्हों पर चलते हुए दिग्गी ने यहां तक कहा कि 'हिंदुत्व का हिन्दू धर्म से कोई संबंध नहीं है।Ó अपनी बात को सिद्ध करने के लिए दिग्गी उन वीर सावरकर की पुस्तक का हवाला दे रहे थे जिनके खिलाफ पूरी कांग्रेस जहर उगलती रहती है। किंचित दिग्विजय उस पुस्तक को पूरा पढ़ते और समझने की कोशिश करते तो उन्हें सावरकरजी का निहितार्थ समझ आ पाता जिसमें वह हिन्दू जीवन पद्धति के सार को ही हिंदुत्व निरूपित करते है। अपने भाषण में दिग्गी भारत के सनातनी जनजातीय समाज की पृष्ठभूमि और मूल स्वभाव के ज्ञानाभाव में जनजातियों को हिन्दू धर्म से अलग बताने से भी नहीं चूके।
वेरियर एल्विन की परंपरा वाली कांग्रेस से जनजातियों के संदर्भ में इससे ज्यादा उम्मीद भी क्या की जा सकती है, जनजातियों के प्रति इसी दृष्टिकोण के चलते दिग्विजय के मुख्यमंत्री काल में पूरे प्रदेश विशेष कर पश्चिमी मध्यप्रदेश में ईसाई मिशनरियां धड़ल्ले से जनजातियों के धर्मांतरण में सफल हो पाई। ब्रिटिश शासन की छत्रछाया में मिशनरियों द्वारा जनजातियों के साथ छल-बल से यह गौरखधंधा चलाया जाता रहा है जिस ओर 'नियोगी आयोगÓ की रपट किसी भी समझदार प्रशासक की नींद उड़ा देगी लेकिन दुर्भाग्य से स्वाधीन भारत में कांग्रेस की गलत नीतियों से यह कुकृत्य चलता रहा जिसका परिणाम मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, पूर्वोत्तर सहित अनेक प्रान्तों में सामाजिक जनांकिकी प्रभावित हुई है। कई राज्यों में इसे जनसंख्या 80 प्रतिशत तक हो गई लेकिन दिग्विजयसिंह को यह नजर नहीं आता है। भारत और हिन्दू विरोधियों के वोट के ध्रुवीकरण के लिए दिग्गी विश्व के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन पर अनर्गल टिप्पणी करने से भी नहीं चुके। यह वही दिग्गी है जिन्होंने बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाया था जबकि इनके कार्यकाल में स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) ने जिहादी आतंक का अपना साम्रज्य खड़ा कर लिया था। अपनी परम्परागत कीचड़ उछालो और भाग जाओ की तथा थूक कर चाटने की राजनीति करते हुए दिग्गी संघ पर बिना किसी आधार के आरोप लगा रहे है। संघ पर गांधी हत्या वाले राहुल गांधी के बयान का हवाला देते हुए दिग्गी यह बताना भूल गए कि न्यायालय के समक्ष इस और इसी तरह के अन्य बयानों पर कांग्रेस नेता कई बार थूक कर चाट चुके है। संघ के अपंजीकृत होने के आरोप दिग्गी ने लगाए जबकि संघ और संघ के समविचारी सभी संगठन प्रचलित विधान के तहत सक्षम अभिकरण के अधीन पंजीकृत है। किसानों और मजदूरों पर संघ की भूमिका पर सवाल उठाते हुए दिग्गी यह भूल गए कि किसानों की सबसे बड़ी आवाज भारतीय किसान संघ और मजदूरों का सबसे बड़ा संगठन भारतीय मजदूर संघ है। समाज जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां संघ के स्वयंसेवक अपनी प्रभावी उपस्थित नहीं रखते हो चाहे वह विद्यार्थियों का क्षेत्र हो चाहे कर्मचारियों का या फिर कला-साहित्य-अकादमिक का। संघ कार्यालय पर पहले तिरंगा न लगाने को लेकर बोलने से पहले दिग्गी को यह समझना चाहिए था कि सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार फ्लैग कोड में संशोधन कर 26 जनवरी 2002 से भारत के सभी नागरिकों को किसी भी दिन राष्ट्र ध्वज को फहराने का अधिकार दिया था। दिग्गी ने संघ पर संविधान के अपमान का भी निराधार आरोप लगाया जबकि संघ भारत के संविधान और संवैधानिक संस्थाओं का पूरा सम्मान करता है। दिग्गी के झूठ के पुलिंदे से निकल कर संघ पर एक और आरोप बाबा साहब आम्बेडकर के अपमान का लगाया जबकि संघ के स्वयंसेवक बाबा साहब आम्बेडकर का उतना ही सम्मान करते हैं, जितना कि वह वीर सावरकरजी या किसी अन्य महापुरुष का करते है। स्वयं बाबा साहब आम्बेडकर संघ के शिविर में आए थे और संघ कार्य की प्रशंसा करते हुए उसके धीमी गति पर चिंता व्यक्त कर चुके है। बेहतर होता दिग्विजय सिंह, बाबा साहब आम्बेडकर से लगाकर दलित नेता और कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी तक के साथ कांग्रेसियों विशेषकर नेहरू-गांधी और तथाकथित गांधी परिवार द्वारा किए गए बुरे व्यवहार पर भी प्रकाश डालते। किंचित वो बताते की 1960 से 1990 तक कांग्रेस ने किस तरह बाबा साहब आम्बेडकर के अस्तित्व को मिटाने की कोशिश की है।
कोरोना महामारी के अंधकारमय समय में भी संघ ने हिन्दू वांग्मय के सूत्र 'नर सेवा, नारायण सेवाÓ को किस प्रकार सार्थक किया है। संघ के स्वयंसेवकों ने सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती आदि के माध्यम से अपने प्राणों को दांव पर लगा कर सात करोड़ लोगों तक किसी न किसी रूप से अपनी सेवा पहुंचाई और यथासामथ्र्य सहयोग किया। संघ के यह सेवा कार्य गतिविधियां केवल महामारी तक सीमित नहीं है अपितु सामान्य दिनों में भी सतत् चलती रहती है। कुलमिलाकर दिग्विजयसिंह अपने किसी भी आरोप के समर्थन में एक भी तथ्य या प्रमाण नहीं दे पाए और न ही किसी घटना का उल्लेख कर पाए। उनका हिन्दू धर्म और संगठनों और दिया गया बयान केवल निम्न स्तर की राजनीति से प्रेरित और हिन्दू विरोधियों के वोट का ध्रुवीकरण करने वाला उपक्रम मात्र है। इन्हीं हरकतों के कारण दिग्विजयसिंह पहले ही अपनी राजनीतिक जमीन खो चुके है, वह 10 वर्षों तक जिस प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे उसी की राजधानी में 2019 के लोकसभा चुनावों में बुरी तरह पराजित हो चुके है। प्रभावशाली मुस्लिम वोट और लंबा अनुभव होने पर भी उन्हें एक ऐसी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने हराया जिनका यह पहला सार्वजनिक चुनाव था। यह भी उल्लेखनीय है कि यह वही साध्वी प्रज्ञा ठाकुर है जिनके विरुद्ध एक षड्यंत्र के तहत फर्जी मुकदमा दर्ज करवाया गया और वर्षों तक जेल में प्रताडि़त किया गया था। इसी मामले में भगवा आतंकवाद की फेक थ्योरी गढ़ी गई थी और इसका मास्टमाइंड दिग्विजयसिंह को ही बताया जाता है।
(लेखक विक्रम विवि उज्जैन में समाज शास्त्र में सहायक प्रध्यापक है)