swadesh editorial
   Date05-Sep-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
कि सी की जाति गलत नहीं होती, जातियां भी गलत नहीं होती और जाति व्यवस्था भी गलत नहीं है... हाँ, जातिवाद गलत है, घातक है... जातियों से जुड़ी ऊंच-नीच की हीन भावना घातक है... जाति और वर्ण व्यवस्था ने तो हमारे सांस्कृतिक राष्ट्र के संचालन में अग्रणीय भूमिका का निर्वाह किया है... विदेशी इस्लामिक आक्रांता की बर्बर आंधी को अवरुद्ध करने में हमारी जाति व्यवस्था सफल हुई... भारत में अंग्रेजों ने जातियों की विकृति निर्मित की और उसी ने जाति व्यवस्था को ध्वस्त करके जातिवाद का विषवमन किया...रही कसर आरक्षण ने जाति व्यवस्था को पूर्णत: जातिवाद की भेंट चढ़ाकर पूरी कर दी...जातियों को लेकर सियासी जोर तो साठ के दशक के बाद ही शुरू हो गया था...डॉ. राममनोहर लोहिया ने तो 'पिछड़ा मांगे सौ में से साठÓ का नारा बुलंद किया था और उसी के जरिए राजनीति में जातियों की घेराबंदी की नई पटकथा लिख दी...देश की राजनीति की धुरी कहलाने वाले उत्तरप्रदेश से कांशीराम ने जातियों का नया घालमेल निर्मित किया और 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारीÓ का नारा बुलंद किया...फिर 90 के दशक के बाद उनकी शिष्या कैसे पीछे रहती, मायावती ने तो बहुजनवाद के नाम पर 'तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो...Ó की विषैली भाषा से जातियों के टकराव का नया सियासी अध्याय शुरू किया...लालू प्रसाद यादव ने जातियों के साथ धर्म का कॉकटेल करके एमवाय (मुस्लिम-यादव) समीकरण के द्वारा 15 साल सत्ता अतिक्रमण करके दिखाया था... फिर मुलायम का समाजवाद भी 'भाई-भतीजावादÓ से कहां आगे बढ़ पाया...हरियाणा-उप्र में जाट आंदोलन और खाप पंचायत का तमाशा किसने नहीं देखा...मायावती का बहुजनवाद तो घृणित राजनीति का जरिया बनकर रह गया...इसके बाद बिहार में 'दलित के साथ-साथ महादलितÓ की परिभाषाएं गढ़ी गई...तुष्टिकरण की हद पार करते हुए आंध्रप्रदेश में 'मुस्लिम-दलित गठजोड़Ó सामने आया...और अब तो केरल में 'मुस्लिम कट्टरपंथी-वामपंथी-चर्च मिशनरीÓ का नापाक गठजोड़ भी सियासत के मैदान में जातियों का बंटाढार करने के षड्यंत्र से नहीं चूक रहे हैं..? तभी तो मनु कहते हैं- जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते। अर्थात : जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। मनु स्मृति में चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र का निर्धारण किया गया...यानी मनु स्मृति में भी जाति के बजाय व्यक्ति के कर्म से सारी गतिविधियां और योग्यता के मापदंड का निर्धारण मिलता है... आजादी के बाद संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने 'जाति मुक्तÓ समाज की कल्पना की थी... इसलिए तब आरक्षण की व्यवस्था भी 10 वर्षों के लिए तय की गई थी..,उद्देश्य था कि जातियों के भंवर से लोगों को निकालकर आरक्षण की बैसाखी पर निर्भर न रखा जाए..,लेकिन आज के दौर में आरक्षण की बैसाखी राजनीति चमकाने का ही नहीं...बल्कि हर स्तर पर जातिवाद को मजबूत करने का कारण बन गई है..! तभी तो 2021 की जनगणना में जातियों की अलग से गिनती को लेकर माहौल गरमाने लगा है... जातिगत जनगणना के फायदे हैं, तो नुकसान भी...इन दोनों के बीच चतुराई से जो समाज व राष्ट्रहित को समानता की तुला पर रखकर आगे बढ़ सकता है, वही जातिवाद के भंवर में डूबने से समाज व देश को बचाने में सफल होगा...क्योंकि आज जातियों का सीधा-सीधा असर आरक्षण की व्यवस्था पर दिखता है... इसे चुनावी हथियार के रूप में पंचायत से संसद तक हमने उपयोग करते भी देखा है...जब जातियों के तथ्यात्मक और आधिकारिक आंकड़े सामने आएंगे तो उस जाति-वर्ग के लोग अपनी संख्या के मान से अधिकार, सुविधाएं और तमाम सत्ताओं में भागीदारी भी मांगना अधिकारपूर्वक प्रारंभ करेंगे... इसके लिए उग्र आंदोलन का रुख करने से भी नहीं चूकेंगे.., ऐसा पहले भी होता रहा है... गुर्जर, मीणा, जाट से लेकर मराठा और अब तो क्षत्रिय राजपूत भी आरक्षण की मांग के लिए आंदोलन कर रुख करते नजर आ रहे हैं... ऐसे में 2021 की जनगणना में जातियों को आंकने-गिनने पर मुहर लगती है तो इसके नफा-नुकसान को ध्यान में रख संभलकर आगे बढऩा होगा..! क्योंकि राजनीतिक दल सबसे ज्यादा जतन इसी का कर रहे हैं कि जातियों की गणना होना ही चाहिए... क्योंकि उन्हें चुनाव के समय जातियों को वोट बैंक के रूप में संभालने, लुभावने वादों से सम्मोहित करने और वोटों के समीकरण के मान से जातियों को एक-दूसरे के खिलाफ भिड़ाने-लामबंद करने का सबसे मजबूत आधार इसमें जो मिलता है... दलों के लिए जातियों का महत्व सिर्फ आरक्षण तक सीमित है, तभी तो न्यायालय की तय गाइडलाइन का लगातार उल्लंघन करके केंद्र से लेकर प्रत्येक राज्य ने एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षण की लक्ष्मण सीमाओं को बार-बार लांघने और इससे भी आगे बढ़कर आरक्षण में आरक्षण, कोटे में कोटा व्यवस्था के जरिए जातियों के भंवर जाल को उलझाने का काम किया है...अगर आरक्षण जैसी व्यवस्था समाप्त हो जाए तो कम से कम राजनीतिक मायने में जातियों का महत्व पूर्णत: निर्मूल हो जाएगा..! फिलहाल हर कोई दल जातियों को अपने पाले में रखने को उत्सुक नजर आता है..? कभी आरक्षण का टुकड़ा फेंककर या आरक्षण व्यवस्था को ध्वस्त करके अथवा कोटे में कोटा का आरक्षण मोहजाल दिखाकर... या फिर क्रीमीलेयर से लेकर उन तमाम हथकंडों से आरक्षण जाल में जातियों को ललचाकर फांसने को... यही तो आरक्षण के जरिए जाति के छलावा है..!
प्रत्येक जाति और प्रत्येक वर्ग को संवैधानिक दायरे के मान से मूलभूत अधिकारों और संसाधनों की प्राप्ति कैसे संभव होगी..? जब उन्हें अवसर, अधिकार और संसाधन मिलेंगे, तभी तो व्यवस्था में सुधार होगा... क्योंकि सामाजिक न्याय पाने का अधिकार सबको है.., इसलिए समय की मांग है कि आरक्षण को सिर्फ 'आर्थिक आरक्षणÓ के रूप में रखा जाए ताकि व्यवस्था सुधार के साथ ही 'जातिवादÓ का दंश देश को खंडित करने का कारण न बने...क्योंकि जब-जब आरक्षण खत्म करने की बात निकलती है तो चालाकी से आरक्षित वर्ग जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकार सम्पन्न, आरक्षण का वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी पर्याप्त दोहन कर चुके लोग ही अब तक आरक्षण के लाभ से वंचित रहे लोगों को भड़काकर, भ्रमित करके उन्हें यह दिखाते-बताते और समझाते हैं कि देखो तुम्हें जो अधिकार बाबा साहेब ने आरक्षण के रूप में दिया था, उसे खत्म करने का षड्यंत्र किया जा रहा है..? बस शुरू हो जाता है आरक्षण खत्म न होने देने के लिए आंदोलन, जो आरक्षण के खिलाफ बोलता है, उसे आरक्षित वर्ग अपना दुश्मन नंबर- 1 घोषित करने में देर नहीं लगाते.., जो आरक्षण का समर्थन करते हैं, उन्हें सवालों के कठघरे में खड़ा करके पूछा जाता है कि क्या आप अकर्मण्यता और अयोग्यता को बढ़ावा देने के पक्षधर हैं..? जबकि स्थिति इसके उलट है.., जिसे समय रहते समझना होगा...आजादी के बाद लागू आरक्षण व्यवस्था के तहत जिनके पूर्वजों ने पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ लिया... स्वयं को अधिकार एवं अर्थ सम्पन्न बनाया... उनकी तीसरी, चौथी और पांचवीं पीढ़ी तक के अधिकार सम्पन्न लोगों ने ही आज आरक्षण व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठने का काम किया है..? ऐसे में आरक्षण के लिए अजा, अजजा, अपिव और क्रीमीलेयर के वास्तविक अधिकारी आज भी संसाधन, सुविधा और आरक्षण के इंतजार में हैं..!
सबसे बड़ा सवाल.., राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यों में मंत्री, सांसद, विधायक, प्रमुख सचिव, सचिव यहां तक कि कमिश्नर, कलेक्टर के पूरे कुनबे आरक्षण प्रक्रिया से एकमुश्त बाहर क्यों नहीं होना चाहिए..? जब किसी परिवार में कोई कलेक्टर, कमिश्नर आरक्षण प्रक्रिया का लाभ लेकर बन चुका है तो उसे स्वत: आरक्षण प्रक्रिया से बाहर माना जाना चाहिए..! ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ न मिलता रहे..! द्वितीय श्रेणी के जो कर्मचारी सरकारी नौकरी में रह चुके हैं, उनके परिवार की दूसरी पीढ़ी को योग्यता संबंधी अंकों का आरक्षण न मिले... यानी उन्हें स्कूल, कॉलेज में प्रवेश कम नंबरों पर आरक्षित वर्ग का मानकर न मिले...हाँ, इन्हें आर्थिक, शैक्षणिक आधार पर पढ़ाई, कोचिंग, आवास सुविधा मिलती रहे... तृतीय, चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को नियम बनने के बाद एक पीढ़ी तक ही अंकों या योग्यता में रियायत संबंधी अंकों की आरक्षण छूट मिले... न्यायालय, चिकित्सा, पुलिस एवं प्रशासन में जिन्होंने द्वितीय श्रेणी तक का ओहदा प्राप्त किया है, उनकी दूसरी पीढ़ी अर्थात अधिकारी के पोता-पोती को आरक्षण संबंधी प्रक्रिया से बाहर रखना होगा... क्योंकि बड़े-बड़े अधिकारी-कर्मचारी अधिकार सम्पन्न होने के चलते अपने बच्चों का ज्ञान और व्यवहार मजबूत करने में सक्षम होते हैं... इन्हीं के बच्चे आरक्षित वर्ग को दो तरह से नुकसान पहुंचाते हैं... एक, उन्हें नंबरों के मान से पीछे छोड़ते हैं...उनकी सीटें हमेशा आर्थिक सम्पन्नता के चलते अधिकारी वर्ग का बच्चा झपट ले जाता है... दूसरा, शैक्षणिक संसाधन, सुविधाएं जुटाने में भी ये आरक्षित संपन्न वर्ग अभावग्रस्त आरक्षित वर्ग से आगे रहता है...परिणामत: बौद्धिक एवं आर्थिक रूप से सम्पन्न आरक्षित वर्ग ही सरकारी संसाधनों एवं आरक्षण सुविधाओं का लाभ लगातार उठाते रहते हैं... अत: एक बार जातियों की जब गणना होगी तो पता चलेगा कि किस जाति-वर्ग के कितने लोग, परिवार इस आरक्षण प्रक्रिया के तहत आर्थिक सम्पन्नता, सरकारी नौकरी, सरकारी सुविधा-संसाधन, राजनीतिक भविष्य और अन्य क्षेत्रों में अपनी सात पीढिय़ों का तारण तो नहीं कर चुके हैं..? ऐसे धनाढ्य आरक्षित वर्ग को आजादी के 75 वर्ष बाद भी आरक्षण की मलाई आगे भी, कैसे भी और क्यों मिले..? यह बात आरक्षित वर्ग के अभावग्रस्त, वंचित उन लोगों को समझाना होगी..,जिन्हें आरक्षण खत्म करने का झूठा भय दिखाकर भड़काया जाता है...आखिर जिन्होंने पूरी पढ़ाई आरक्षण के जरिए सारी सुविधाएं प्राप्त करके.., परीक्षा में कम अंक लाकर भी स्कूल, कॉलेज एवं उच्च शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षित कोटे से प्रवेश पाकर डिग्री हासिल की.., जो बाद में सरकारी नौकरी में लिखित परीक्षा में कम अंक लाकर और साक्षात्कार में निर्धारित योग्यता का प्रदर्शन न करके भी आरक्षण के जरिए नौकरी पाने में सफल हुए... उन्हें अब पदोन्नति में भी आरक्षण देने की आत्मघाती व्यवस्था हेतु राज्य सरकारें होड़ लगाकर आखिर समाज-राष्ट्र को कहां ले जाना चाहती हैं..? क्या यह वंचित आरक्षित वर्ग के हकों पर आरक्षित वर्ग के अधिकार एवं आर्थिक सम्पन्न और आरक्षण का पीढ़ी दर पीढ़ी पुरजोर दोहन करने वाले लोगों का अतिक्रमण जैसा नहीं है..? अत: जिन्हें यह लगता है कि जातियों की जनगणना से जातिवाद और भयावह आरक्षण का दुष्चक्ररूपी आंदोलन देश में विध्वंसकारी हो जाएगा...उन्हें यह बात समझना होगी कि आरक्षण की वास्तविक पात्र आबादी को आरक्षण प्रक्रिया के दायरे में लाने का काम जातियों के स्पष्ट आंकड़े और उससे जुड़ी आर्थिक सम्पन्नता, विपन्नता वाली विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ही कर सकती है...अगर देश में जातियों के भंवर को तोडऩा है, जातिवाद से मुक्त और जातियों की ऊंच-नीच को खत्म करना है तो इसके लिए जरूरी है कि आरक्षित वर्ग के सुदूर ग्रामों, वनों और शहरी झुग्गियों तक में बसे उन वर्गों तक आरक्षण का लाभ पहुंचे.., जो आजादी के बाद से अब तक आरक्षण की उजास प्रक्रिया से अपनी शैक्षणिक व आर्थिक सम्पन्नता का स्वप्न संजोए प्रतिक्षारत हैं... उन्हें ही अब आरक्षण प्रक्रिया में बिना धोखाधड़ी के पूर्ण अवसर मिले... यह जनगणना 2021 में जातियों के वास्तविक आंकड़े एकत्रित करके ही संभव है... अगर हमारे नीति-नियंताओं का जातिगत जनगणना का उद्देश्य पवित्र हैं तो जातियों को गिनने में कोई बुराई नहीं है...