swadesh editorial
   Date26-Sep-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
चु नावी मैदान में जाने से सालभर या छह माह पूर्व राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन अर्थात् मुख्यमंत्री बदलने का राजनीतिक प्रयोग पहले भी होता रहा है... इसलिए वर्तमान में अगर भाजपा सालभर में मुख्यमंत्रियों के करीब आधा दर्जन चेहरे बदल चुकी है और ऐसे लोगों पर विश्वास जता रही है, जिन्हें चौंकाने वाली दृष्टि से देखा जा रहा है, तो इसमें आश्चर्य जैसा कुछ नहीं, क्योंकि अंतत: किसी भी राजनीतिक दल का अंतिम समय तक प्रयास राज्यों में या तो अपनी सत्ता बचाए रखने या प्राप्त करने का ही होता है और होना भी चाहिए... क्योंकि लोकतंत्र में राजनीतिक रूप से सभी पार्टी या दल अपने तथाकथित राजनीतिक हितों और भविष्य के लाभों को संरक्षित करने के लिए स्वतंत्र हैं... भाजपा की राह पर चलकर कांग्रेस ने पंजाब में सालभर से चल रहे सार्वजनिक बयानी युद्ध और दिल्ली-चंडीगढ़ की दौड़-भाग को विराम देने के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर नया मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को बनाया... जिसे हर किसी ने भाजपा की शैली में कांग्रेस के निर्णय को चौंकाने वाली नकल ठहराया... इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी भी प्रदेश में मुख्यमंत्री कौन होगा..? यह बहुमत प्राप्त उस राजनीतिक दल का विशेषाधिकार है और होना भी चाहिए.., जिस पर जनता ने चुनावी समर में जनादेश की मुहर लगाई थी... बीच कार्यकाल में मुख्यमंत्री बदलना या चुनावी उलटी गिनतियां प्रारंभ होने पर चेहरा बदलना कितना सही था या है..? इसका निर्णय तो जनता आने वाले समय में जनादेश से सुनाने के लिए स्वतंत्र है ही... ऐसा समीकरण और निर्णय भाजपा शासित कर्नाटक, उत्तराखंड, गुजरात और कांग्रेस शासित पंजाब के साथ भविष्य में राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भी बीच में बदलाव होता है तो सभी पर स्वत: पूर्ण रूप से लागू होता है...
सवाल बदलाव की इस हठ से भी बढ़कर यह है कि मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने का यह तथाकथित नया प्रयोग राजनीतिक शुचिता की जो लक्ष्मणरेखा है, उसके लिए कितना सही है..? इस बदलाव में जो भी वर्तमान और भावी कारण सामने रहे हो, लेकिन उस जनता का क्या गुनाह है कि जिसने उस चेहरे के नाम पर जनादेश सुनाया था..? संवैधानिक व्यवस्था के तहत जब जनता बहुमत के द्वारा चुनाव में राज्य का नेतृत्व चुनती है, तब उसके कार्यों, निर्णयों की परख भी तो जनता को ही चुनावी मैदान में करने का अवसर मिलना चाहिए... क्योंकि जिसके नाम पर वोट मांगे और डाले गए... जिसे स्टार प्रचारक एवं मुख्यमंत्री घोषित करके चुनाव लड़ा गया, वह साल, दो साल या चुनाव पूर्व ही नकारा कैसे हो सकता है..? जब किसी भी राज्य में विधानसभा के चुनाव होते हैं तो दो तरह की स्थिति रहती है, एक तो चेहरा घोषित किया जाता है, जैसा कि भाजपा अधिकतम बार राज्यों के विस चुनाव में ऐसा करती है... दूसरा बिना चेहरे के पूरी पार्टी चुनाव लड़ती है... यानी कांग्रेस में आलाकमान के फरमान के तहत दस जनपथ से चुनाव बाद चेहरा थोपा जाता है... याद करें 2018 में मप्र, छग और राजस्थान में कांग्रेस ने युवाओं को आगे करके चुनाव लड़ा, लेकिन बाद में उम्रदराज को मुख्यमंत्री बनाया... फिर तथाकथित क्षेत्रीय दल जिसमें सपा, बसपा, राजद, बीजद, राकांपा, टीडीपी, शिअद, आआपा, नेकां, पीडीपी, टीआरएस, वाईआरएस और टीएमसी में तो हारे या जीते, चेहरा एक ही बना रहता है... ऐसे में संसदीय प्रक्रियाओं का पालन कहां, कितना होता है..? जनता ने जिसके नाम से जनादेश सुनाया, उन्हें अवसर भी मिलता है या नहीं..? इस राजनीतिक पतवार को सियासी संग्राम के बीच अनुभव के चप्पू चलाते हुए हम खूब देखते-सुनते और सहते आए हैं... अत: राज्यों में बदलाव के प्रयोग का जनहित से सीधा कोई जुड़ाव नहीं है..!
बदलाव के इन प्रयोगों के बीच यह ध्यान रखना होगा कि जनता की भावना, जनादेश की मर्यादा एवं संवैधानिक प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर अचानक चेहरा बदलना कहीं हमारे जनादेश को ठेंगा दिखाती आलाकमान की फरमान शैली को ही तो पुष्ट नहीं कर रहा है..? भारतीय संविधान लोकतांत्रिक ढांचे के अंतर्गत किसी भी मुख्यमंत्री को हटाने-बैठाने की एक विधिसम्मत और वैधानिक प्रक्रिया को रेखांकित करता रहा है... चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित है, तो भी उसे विधायक दल की बैठक में विधायक दल के नेता के रूप में चुना जाना जरूरी है... भले ही औपचारिकतावश ऐसा हो... तभी वह मुख्यमंत्री का दायित्व ले सकता है... बिना चेहरे के किसी दल ने चुनाव लड़ा-जीता, तब भी विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से या जिसमें दल-बल ज्यादा, उसके नाम की घोषणा होगी, लेकिन इन सबके परे अगर पार्टी का शीर्ष प्रमुख भी अपने पसंदीदा या करीबी को चाहता है, तब भी विधायक दल की मुहर जरूरी है... अब विचार करें इसका किस पार्टी-दल में कहां और कितना अनुपालन होता है..? जब कोई मुख्यमंत्री विधायक दल का विश्वास खो देता है तो वही विधायक दल पहले नए नेता का चुनाव करते हंै... विधायक दल से नेता के चुनाव और विश्वास खोने-प्राप्त करने की प्रक्रिया कुछ दशकों से मानो आलाकमान के फरमानी आदेश के साथ नत्थी होती नहीं दिख रही है..? याद करें जब दिल्ली में शीला दीक्षित तीसरी बार कांग्रेस को सत्ता में लौटाने में सफल रही, तब भी उनके नाम पर मुहर लगाने में आलाकमान ने चार दिन का समय लिया था..! क्या वह दिल्लीवासियों के जनादेश का खुला अपमान नहीं था..? फिर विधायक दल के निर्णय और नीति पर अंकुश लगाते पर्यवेक्षक दल भी तो कहीं न कहीं उस संवैधानिक संसदीय परंपरा को ही खारिज करते नजर आते हैं..? क्योंकि उन्हें तो आलाकमान का फरमान जो सुनाना है...
चौंकाने वाले निर्णय की आड़ में महाराष्ट्र से लेकर उत्तराखंड तक राजनीतिक प्रयोगशाला बनाना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत तो कतई नहीं मान सकते हैं... क्योंकि यही तो नेहरू-इंदिरा के समय में भी होता रहा... कामराज फार्मूला कौन भुला है? जब बदलाव हेतु किसी राज्य के मुख्यमंत्री को दिल्ली तलब किया जाता तो वह पूर्व मुख्यमंत्री होकर दिल्ली से वह भी पीछे के दरवाजे से लौटता था... विलासराव देशमुख की महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से विदाई दस जनपथ के पिछले दरवाजे से हुई थी और उन्होंने प्रतिक्रिया में यह कहा था कि अब मैं मुख्यमंत्री नहीं रहा... मिस्टर बंटाढार 'दिग्गीÓ के कुशासन के खिलाफ मप्र में उमा भारती के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया... लेकिन हुगलीकांड के पटाक्षेप के बाद भी उनकी वापसी नहीं हो सकी..! चुनाव से छह माह पूर्व महाराष्ट्र-दिल्ली में शरद पवार से लेकर सुषमा स्वराज तक जीत दिलाने वाले चेहरे बनने में विफल रहे हैं... उप्र में 2017 में मोदीजी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने... कांग्रेस में तो मप्र, महाराष्ट्र से लेकर अर्जुन सिंह, शरद पवार, पृथ्वीराज चव्हाण, सुशील कुमार शिंदे, मोतीलाल वोरा भी आलाकमान के फरमान से अपमानित होते रहे... 1980 में अर्जुन सिंह बिना बहुमत के मुख्यमंत्री बने और 1985 में बहुमत होने के बावजूद राज्यपाल बनना पड़ा... कहने का तात्पर्य यह है कि वर्तमान चौंकाने वाले इन नए प्रयोगों से जनता का हित या उनसे जुड़ी कार्य योजनाओं पर फोकस के बजाय संभावित जीत-हार का समीकरण हावी है... जब 3-4 साल एक मुख्यमंत्री सरकार चलाता है, पार्टी के घोषणा-पत्र पर नीतियों और निर्णयों, कार्यों के द्वारा अमल करता है, जब राज्य में वह राजनीतिक फसल को संरक्षित-संवर्धित करता है, तब उसे चुनाव में सियासी फसल काटने से पूर्व चलता करना क्या दर्शाता है..? क्या जनता चेहरा बदलनेभर से वोट दे देती है या सत्ता में वापसी सुनिश्चित कर देती है..? क्योंकि जब जनता अपने जनप्रतिनिधि चुनता है तो उन जनप्रतिनिधियों को भी अपनी पसंद-नापसंद चुनने का अधिकार होना चाहिए... वरना तो सत्ता पाने और बचाए रखने की ललक और नए बदलाव की हठ में जनादेश तो आलाकमान और फरमान के बीच ही पिसता रहेगा, जो संवैधानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा...