swadesh editorial
   Date19-Sep-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
वै श्विक महामारी कोरोना की विकट स्थितियों का सामना करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने की सुखद अनुभूति वाले संकेत करने लगी है... इसे तीन बातों से आसानी से समझा जा सकता है... पहला, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तेजी से वृद्धि... दूसरा, जीएसटी संग्रह का रिकार्ड स्तर पर पहुंचना... तीसरा, शेयर बाजार का 60 हजारी हो जाना... ये कुछ ऐसे प्रारंभिक संकेत और संदेश हैं, जिनको पटरी पर लौटती भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में देखा जाना चाहिए... 2020-21 की राष्ट्रीय तालाबंदी ने हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को 24.4 फीसदी कम कर दिया था, यह बहुत बड़ी क्षति थी... अभी हम 32.4 ट्रिलियन तक बढ़े हैं, यानी तालाबंदी के पूर्व वाली स्थिति में अर्थव्यवस्था को आने में अभी समय लगेगा... फिलहाल अर्थव्यवस्था सुधार की राह पर है, लेकिन अभिभूत होने वाली स्थिति निर्मित नहीं हुई है... अत: प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक वर्ग की चिंता करते हुए लगातार आर्थिक फैसले लेना सरकार के लिए उचित होगा... क्योंकि कोरोना महामारी का पटाक्षेप अभी हुआ नहीं है, ऐसे में आर्थिक परिदृश्य, प्रति व्यक्ति आय, महंगाई की चाल, मानसून की बेरुखी और बदलते राजनीतिक समीकरणों के मान से स्थितियों का अवलोकन जरूरी है... निर्माण, विनिर्माण, खनन, व्यापार, होटल, परिवहन जैसे क्षेत्रों में गत दो-तीन माह में बड़ी तेजी आई है... कृषि क्षेत्र में 4.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है... ये सभी बातें अर्थव्यवस्था के सुधार और उससे जुड़ी उम्मीदों को लेकर हर किसी को आशान्वित कर रही हैं...
कोरोना ने आर्थिक तंगहाली के हालात जिस तरह से शहरों में निर्मित किए, वैसी स्थिति का सामना गांवों को नहीं करना पड़ा... कुछ शहर भी इससे अप्रभावित रहे... ऐसे में जरूरत इस बात की है कि ऐसे गांव-शहरों की उन व्यवस्थाओं, उत्पादों एवं कारोबारी गतिविधियों को चिन्हित करना होगा और उन्हें बढ़ावा देने होगा, जिन्होंने कोरोनाकाल में आर्थिक विभीषिका झेलकर भी आर्थिक मान से अपने पैर डगमगाने नहीं दिए... ध्यान रहें आज स्थितियां फिर आर्थिक रूप से अनुकूल बनने लगी हैं... युवा, कामगार, उद्यमी और व्यापारी सब तैयार हैं आर्थिक मजबूती का दौर लौटाने के लिए... बस सरकार को अपने सकारात्मक खर्चों को तेजी से बढ़ाकर अर्थव्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों का समय रहते अध्ययन और तर्कसंगत समाधान भी करना होगा.., क्योंकि सिर्फ आर्थिक खजाना बढ़ता रहे, लोगों की जेबें खाली रहे, क्रय शक्ति लगातार घटती चली जाए, तब बाजार में चमक लौटाने के स्वप्न कहीं दिवास्वप्न नहीं बन जाएं..? इस पर त्वरित चिंता करनी होगी... क्योंकि आर्थिक तरलता ही बाजार, कारोबार और आर्थिक सुधार का महत्वपूर्ण अंग है...
हमने यह भी देखा है कि भारत की आर्थिक गतिविधियां जैसे ही कोई छूट प्राप्त करती हैं, सकारात्मक असर दिखाने लगती हैं... कोरोनाकाल की पाबंदियों ने उत्पादक, उत्पाद, विक्रेता और क्रेता सभी के हाथ बांध दिए थे, जिसका दुष्परिणाम भी लोगों की आर्थिक स्थिति डांवाडोल होने, दैनिक व प्रति व्यक्ति आय पर भयावह असर हुआ... अब हमारी कारोबारी गतिविधियां तेजी से सुधार की ओर बढऩे लगी हैं... ये जीएसटी संग्रह के बढ़ते दायरे से समझ आ रहा है, क्योंकि आगे हालात और सुधरेंगे, इन सबके पीछे का मूल कारण यह है कि आर्थिक गतिविधियां तेजी से सामान्य होकर उम्मीद के अनुरूप परिणाम देने लगी हैं... दूसरा, जीएसटी चोरी रोकने की उपाय प्रक्रिया भी इसमें मुख्य सहायक कारक रहा है... तभी तो अगस्त 2020 के मुकाबले अगस्त 2021 में जीएसटी संग्रह 30 फीसदी बढ़कर 1.12 लाख करोड़ पर पहुंचा है... हालांकि जुलाई में यह 1.16 लाख करोड़ रुपए था, जून में कोरोना की दूसरी लहर के चलते 1 लाख करोड़ के नीचे रहे, इसके बाद से लगातार यह आंकड़ा 1 लाख करोड़ के पार रहा है... तो क्या इसका कहीं न कहीं कोरोना महामारी से आर्थिक रूप से पीडि़त और प्रताडि़त वर्ग को लाभ नहीं मिलना चाहिए..?
आर्थिक सुधार के परिदृश्य पर जब बात निकलेगी तो महंगाई को कैसे परे रखा जा सकता है..? खाद्य तेलों के साथ पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और सीएनजी के लगातार बढ़ते दाम हर किसी का दम निकाल रहे हैं... सितम्बर शुरुआत में रसोई गैस 25 रुपए महंगी हुई... इसके पहले 17 अगस्त को भी 25 रुपए महंगी हुई थी, यानी 15 दिनों में रसोई गैस के दाम 50 रुपए बढऩा हर किसी को हैरान ही नहीं, परेशान भी कर रहा है... क्योंकि इन सभी की मूल्यवृद्धि का असर आम-खास से लेकर रोजमर्राई जीवन में दो समय की रोजी-रोटी की जुगत भिड़ाने वाले के सामने यक्षप्रक्ष खड़ा कर देती है... 2021 में ही अब तक कुल 190 रु. रसोई गैस पर ही बढ़ चुके हैं... जनवरी 2021 में जो रसोई गैस सिलेंडर 694 रु. का था, वह 25 फरवरी को 794 और 1 जुलाई को 834 और अब 1 सितम्बर को 884 रुपए पर पहुंच चुका है... ऐसी मूल्य वृद्धि से रेहड़ी-फेहरी वाले, चाय दुकान, पकौड़े और खोमचे वालों तक का बजट गड़बड़ा जाता है..! फिर डीजल के मूल्यों में लगातार वृद्धि और 110 पार जाने की स्थिति माल ढुलाई को लगातार महंगा करती है... प्रत्येक वस्तु महंगी हो जाती है... पेट्रोल और सीएनजी में आग झरती तेजी, परिवहन व्यवस्था के साथ ही हर किसी के आर्थिक बजट को गड़बड़ा देती है... इन सभी का असर आर्थिक स्थितियों पर दिखता है और दिख भी रहा है... हालांकि त्योहारी मौसम में खाद्य तेलों की कीमतों को काबू में रखने के लिए केन्द्र सरकार ने पाम तेल, सोयाबीन और सूरजमुखी पर मूल सीमा शुल्क 2.5 प्रतिशत घटा दिया है... इससे संभावना यह बन रही है कि जल्द ही 4 से 5 रुपए प्रति लीटर की कमी आएगी... लेकिन यह वर्तमान आर्थिक हालातों के बीच ऊंट के मुँह में जीरे के समान है... ईंधन के कारण जो महंगाई दर 12.98 फीसदी पर पहुंची हुई है, उसका समाधान भी जीएसटी बैठक में फिलहाल निकला नहीं है... फिर 13 सितम्बर को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा खुदरा महंगाई घटने को लेकर जो आंकड़े दिए गए हैं, वह अगस्त 2020 में 6.69 फीसदी थी, जो अगस्त 2021 में घटकर 5.3 रह गई... जुलाई में यह 5.59 फीसदी पर थी... कुल मिलाकर साग-सब्जियों के दामों में कमी जरूर आई है, लेकिन खाद्य तेलों में 33 फीसदी महंगाई का जो तड़का लगा है, उसकी भरपाई कैसे होगी..?
कोरोना के कारण विश्व की प्रत्येक अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है, जो विकासशील है, उनको छोड़ भी दें तो स्वयं को सम्पन्न अर्थात् विकसित श्रेणी में रखने वाली भारी-भरकम अर्थव्यवस्थाएं भी हिचकोले खा रही है... जब विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं कोरोना से पार पाने के लिए माथापच्ची कर रही थी, तब भारत ने सुधारों की पहल करके आत्मनिर्भर भारत की नींव रखी और कोरोना की आपदा को अवसर में बदलने का भरसक सफल प्रयास किया... उसी का नतीजा है कि आज हम मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में पुन: उभर रहे हैं... क्योंकि केन्द्र सरकार ने समय-समय पर आर्थिक पैकेज व छूट के साथ ही किसान, गरीब-वंचित हर वर्ग को नकदी रुपया, राशन का सहयोग कर अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाए रखने में सफलता पाई... इसमें कोई दो राय नहीं है कि छोटे और मझौले उद्योगों के बजाय राहत और आर्थिक पैकेजों का लाभ बड़ी कंपनियों और बड़े उद्योगों को ज्यादा हुआ है... इसलिए उनका मुनाफा भी बढ़ा... भारत की आर्थिक वृद्धि चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में बढ़कर 20.1 फीसदी हो गई... वर्ष 2020-21 की अप्रैल-जून की चौथी तिमाही में जीडीपी 1.6 प्रतिशत बढ़कर कुल 24.4 फीसदी बढ़ोतरी हुई... इसी दौरान चीन की वृद्धि दर 7.9 फीसदी रही... हमारी उत्पादन, निर्माण और निर्यात की नवाचार नीतियों से स्थितियां सुधार का बेहतर माहौल बना रही है, लेकिन आमजन को सताती महंगाई और जीडीपी अर्थात गैस-डीजल-पेट्रोल की आग झरती तेजी आर्थिक सुधारों की अनुभूति को कसेला कर रही है... महंगाई से मुक्ति और रोजगार सृजन के नवाचार ही आर्थिक सुधारों को तेज व स्थायी करने का निमित्त बनेंगे...