नियमों की तालाबंदी से मुक्ति की प्रतीक्षा में स्कूल व बच्च्े...
   Date08-Aug-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
ह मने अनेक बार इस बात का सशक्त तरीके से इसी स्तंभ में उल्लेख किया है कि - महामारी के खत्म होने की कोई निश्चित तिथि-समय तय नहीं किया जा सकता... क्योंकि अकसर महामारीरूपी त्रासदियां लौटकर आती हैं... पुनरावृत्ति करती है अपने दुष्प्रभाव को थोड़ा शिथिल करके किसी बेहरूपिये की भांति दोगुनी ताकत से घात लगाकर हमलावर व मारक होकर यानी महामारी खत्म होते-होते भी लौटकर आती है, वह भी चकमा देने की शैली में... ऐसा हमने कोरोना की प्रथम व दूसरी लहर के मध्य में देखा व भोगा है... ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कोरोना महामारी की समाप्ति तक क्या स्कूलों को अपने हाल पर ऐसे ही छोड़ दें..? बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनके मानसिक विकास पर कोरोना महामारी का ग्रहण ऐसे ही लगने दें..? फिर हमारी भावी पीढ़ी तैयार करने की रणनीति जो कि स्कूलों के अध्ययन से मजबूत व परिष्कृत होती है, उसका क्या होगा..? इससे भी बढ़कर यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर नई शिक्षा नीति (एनईपी) के सामने क्या कोरोना का यह बैरियर यूं ही तना रहेगा..? फिर हम कोरोना के डर से निर्मित हुई अकर्मण्यता का भार बच्चों को स्कूलों की शैक्षणिक, शारीरिक और मानसिक गतिविधियों से दूर रखकर क्या यूं ही झेलते रहेंगे..?
शिक्षा ही हर तरह का उजास दिखाती है..? लेकिन कोरोना महामारी के कारण पूरे विश्व के सामने शैक्षणिक उजास मद्धम होता नजर आ रहा है... क्योंकि विश्व में कोरोना के कारण 1.2 अरब से अधिक बच्चे कक्षा से बाहर रहे हैं.., जबकि भारत में ई-लर्निंग, तकनीकी संसाधनों व ऑनलाइन तरीकों के चलते 33 करोड़ बच्चों की शिक्षा को सतत जारी रखने में सफलता प्राप्त हुई... यह अपने आपमें कोरोना के मान से उपलब्धि माना जा सकता है.., लेकिन इससे जुड़े दुष्प्रभावों पर भी विचार का यही समय है... करीब 17-18 माह हो चुके हैं स्कूलों को बंद हुए... या कहें बच्चों को स्कूलों में जाए हुए... यानी वे घरों की चारदीवारी के बीच कैद होकर रह गए हैं... बंद स्कूलों का असर बच्चों पर मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव के साथ-साथ शारीरिक विकास में बड़ी बाधा एवं शैक्षणिक नुकसान की भरपाई कभी न होने वाली स्थितियां निर्मित हो रही हैं... कोरोना के कारण स्कूलों की तालाबंदी के चलते जो विद्यार्थी 9वीं से सीधे 11वीं में या फिर से सीधे 12वीं में पहुंचे हैं, क्या उनके शैक्षणिक, व्यवहारिक और शारीरिक ज्ञान की कभी भरपाई संभव है..? क्योंकि शोध और अनुसंधान में यहां तक दावा किया जा रहा है कि स्कूल व बच्चों के बीच हुए इस रिक्त स्थान का दीर्घकाल तक दुष्प्रभाव पडऩा तय है... अत: महामारी की अनिश्चितता के बीच स्कूल खोलने को लेकर व्यापक रणनीति जरूरी है... इसका बच्चों, स्कूलों दोनों को इंतजार है...
हर कोई चाहता है कि बंद विद्यालय पुन: खुलें और शैक्षणिक गतिविधियों के साथ विद्यालय परिसर में बच्चों की सामूहिक प्रार्थना वाले स्वर गुंजायमान हों... इसके लिए जरूरी है कि छात्रों, पालकों और शिक्षकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की पहल सरकार, प्रशासन एवं स्कूल प्रबंधन को बिना विलंब करनी चाहिए... इसके लिए शिक्षक-पालक संघ एवं स्कूल प्रबंधन-अभिभावक को निरंतर संवाद एवं कोरोना प्रोटोकॉल के पालन के साथ प्रत्यक्ष मेल-मिलाप की प्रक्रिया को बढ़ाना होगा... इसकी पहल स्कूल-अभिभावक स्वतंत्र रूप से कर सकें, इसकी अनुमति में नियमों के कोई रोड़े अब न अटकाए जाएं..? अभिभावक और शिक्षक का जुड़ाव इस संकटकाल में स्थितियां अनुकूल करने का सबसे बढिय़ा जरिया बन सकता है..? इसके लिए माता-पिता को स्कूल खोलने की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर सामूहिक पहल करना होगी...
पालकों-अभिभावकों की जिम्मेदारी कोरोनाकाल के दौर में ज्यादा प्रभावी तरीके से सामने आ सकती है... इसके लिए उनकी सक्रियता बढ़ाने के साथ ही अभिभावकों को स्कूलों के प्रति जवाबदेह बनाना होगा... तभी किसी भी तरह की शिक्षा नीति को सफल बनाया जा सकता है... इसमें कोई दो राय नहीं है कि ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान ही पालक-शिक्षक संवाद बढ़ा है... लेकिन हमें अब इस व्यवहार को प्रत्यक्ष रूप से सामने लाना होगा... इसके लिए सप्ताह में नियमित या कहें पालक-शिक्षक संवाद का सतत बना रहना चाहिए... जो अनेक तरह की अड़चनों का मिल-बैठकर समाधान निकाल सकते हैं...
कोरोनाकाल की इस विकट विभीषिका ने हमें यह भी भान कराया है कि अभिभावक-शिक्षक रिश्तों को संस्थागत रूप से यानी गुरुकुल पद्धति के मान से नया आयाम देने की जरूरत है... इसके लिए क्या केन्द्र-राज्य नवाचार को प्रोत्साहित करेंगे..? स्थानीय प्रशासन के फैसलों के अनुसार स्कूल प्रबंधन को निर्णय की स्वतंत्रता देना ही होगी... लेकिन वर्तमान में स्कूल प्रबंधन, अभिभावक व प्रशासन बच्चों के भविष्य एवं उनकी संभावित पीड़ाओं को छोड़कर सिर्फ फीस को लेकर चिंतित नजर आते हैं... या कहें आमने-सामने हैं... कोर्ट-कचहरी एक करने में सबका समय बीत रहा है... ऐसे में केन्द्र-राज्य तो मानों मूकदर्शक बन बैठे हैं... क्या वह बीच का रास्ता नहीं निकाल सकते..?
कोरोना की तीसरी लहर के कारण भविष्य में किस तरह की संकटपूर्ण स्थितियां निर्मित होंगी या नहीं होगी, इसको सामने रखकर खतरा टलने के इंतजार में स्कूल बंद रखना समझदारी नहीं है... अब संपूर्ण देश या राज्य में स्कूल बंद रखने या खुली रखने का अव्यवहारिक निर्णय न लिया जाए... इसके लिए स्थानीय स्तर पर स्कूलों एवं प्रबंधन को स्वतंत्रता दी जाए.., ताकि स्थानीय स्तर पर संकट का आंकलन करके स्कूल खोले जा सकें... यानी कब स्कूल खुलेंगे और उसकी किस तरह की गतिविधियां रहेंगी, इसका निर्धारण स्थानीय स्तर पर पालक-शिक्षक और स्कूल प्रबंधन करे, इसमें सहयोगी की भूमिका प्रशासन को निभानी चाहिए... दिल्ली के सारे नियम प्रत्येक राज्य और प्रत्येक शहर की शिक्षा व्यवस्था के संचालन और अवरुद्ध रखने का कारण नहीं बनना चाहिए...
करीब डेढ़ साल से स्कूल बंद रहने का सबसे बड़ा नुकसान भले ही कोई अपने-अपने स्तर पर आंकलन करके अलग-अलग बयां कर रहा हो, लेकिन वास्तविकता में यह सामूहिक नुकसान है, जिसकी भरपाई के जब तक सामूहिक प्रयास नहीं होंगे, तब तक समाधान नहीं होगा... क्योंकि शिक्षा ही एक ऐसा सशक्त माध्यम है, जो देश-समाज के विकास का द्वार खोलता है... फिर उसमें क्या अमीर-गरीब और क्या सम्पन्न अथवा अभावग्रस्त... हर किसी को शिक्षा मिले, इसके लिए जरूरी है कि हम कोरोना की इस आपदा और इससे जुड़ी संभावित तीसरी लहर के खतरों से बचते हुए स्कूलों को खोलने का मार्ग प्रशस्त करें... सुविधाविहीन पालकों के लिए भी एक प्रभावी और व्यापक रणनीति बनाकर उन्हें सुविधाओं से जोडऩे एवं उन्हें तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराने की पहल करना होगी.., ताकि शिक्षा से वंचित प्रत्येक वर्ग को अपना मौलिक अधिकार प्राप्त हो सके...
सरकारी स्कूलों के साथ ही निजी और उन छोटे स्कूलों की आर्थिक व्यवस्थाएं इस कोरोनाकाल में पूर्णत: गड़बड़ा चुकी हैं... क्योंकि उन्हें अब स्कूल के संचालन, रखरखाव के साथ कोरोना प्रोटोकॉल को लेकर जिस तरह के अतिरिक्त खर्चों का सामना करना पड़ रहा है, उन स्थितियों में केन्द्र-राज्य को कुछ विशेष पहल के जरिए स्कूल प्रबंधन व पालकों के बीच राहत पैकेज अथवा कोई अतिरिक्त छूट से इन समस्याओं के समाधान की पहल करना चाहिए.., ताकि पालक-शिक्षक और स्कूल प्रबंधन फीस भरने, न भरने के आपसी सिरफुटव्वल करने के बजाय इस बात पर चिंतित और एकमत हो सके कि कैसे भी स्कूल खोलने का मार्ग प्रशस्त हो.., क्योंकि तीसरी लहर के इंतजार और उससे लडऩे की कीमत पर स्कूलों में नियमों की तालाबंदी और बच्चों के सर्वांगीण विकास पर ऑनलाइन पढ़ाई की घेराबंदी का दुष्प्रभाव हमारे शिक्षा तंत्र को ध्वस्त न कर दे..?