swadesh editorial
   Date29-Aug-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
ता लिबान और तालिबानी मानसिकता किसी के हित में नहीं है... क्योंकि तालिबान सिर्फ बर्बर-हिंसक ही नहीं है, मूर्तिभंजक और संस्कृति विध्वंसक के साथ ही इस्लाम की विकृत परिभाषा गढऩे और उस पर बढऩे वाले दुर्दांत आतंकवादी संगठन के रूप में दो दशकों पूर्व जो था, वही है और वैसा ही रहेगा... अफगानिस्तान में 20 वर्षों बाद पुन: भेष बदलकर, हाथों में खंजर लेकर तालिबान तनकर खड़ा है... जो लहूलुहान अफगानिस्तान को अमेरिकी सैन्य शक्ति के कारण मजबूरी में छोड़ गया था... अत: विश्व के 50 से अधिक इस्लामिक देशों में से किसी ने भी तालिबानी कृत्यों और अफगानिस्तान में तख्तापलट मंसूबों को लोकतांत्रिक नहीं ठहराया और ना ही उसका खुलकर समर्थन किया... भारत में पंक्चर जोडऩे वाले या ऑटो-ठेला चलाने वाले किसी मुस्लिम ने तालिबानी कृत्यों के समर्थन में उतरने की हिमाकत नहीं की, बस तथाकथित पढ़े-लिखे कुछ मुस्लिमों जिसमें ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना सज्जाद नौमानी और उप्र के संभल से सपा सांसद डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क जैसों ने ऐसी हिमाकत कर दिखाई... इन्होंने अफगानिस्तान में तालिबानी कृत्यों को क्रांति की संज्ञा देकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम से इसकी तुलना करने का दुस्साहस किया... यह मजहबी धर्मांधता की पराकाष्ठा है..!
इस्लाम की आड़ में अपने, हममजहबी लोगों के रक्तपात, बच्चों-महिलाओं से हैवानियतभरी वहशीपन को जायज ठहराने का पाप भारत में वे मुसलमान कर रहे हैं, जिन्होंने अपना पूर्वज अभी भी बर्बर, आततायी विदेशी लुटेरे आक्रांताओं बाबर, मो. बिन कासिम, गजनवी, गौरी, खिलजी, नादिर शाह, औरंगजेब और अकबर को माना है... जिन्हें अफगानिस्तान में आतंकी संगठन तालिबान का तख्तापलट क्रांति नजर आता है, वे एक दशक पूर्व अरब देशों में हुई क्रांति को जरा याद कर लें, जिसने मध्य पूर्व और उत्तरीय अफ्रीका में लोकतांत्रिक परिवर्तन की लहर दौड़ा दी थी... तब मिस्र, सीरिया, लीबिया, यमन, ट्यूनीशिया में सिलसिलेवार हुई उस जनक्रांति को भारतीय मुस्लिम फिर क्या संज्ञा देंगे..? जिसमें तानाशाहों, बर्बर बादशाहों को निहत्थी जनता ने सड़कों पर दौड़ा-दौड़ाकर मौत के घाट उतारा था... जबकि उनके पास तो तालिबान की भांति आधुनिक हथियार, गोला-बारूद और जखीरा भी नहीं था... बस दशकों की प्रताडऩा और तिल-तिलकर मरने वाली मजबूरीभरी वह जिंदगी थी, जिसमें तानाशाह उन्हें इस्लाम का थोथा खौफ दिखाकर बंधक बनाए बैठे थे... याद कीजिए सीरिया, मिस्र और लीबिया में होस्नी मुबारक से लेकर कर्नल गद्दाफी तक का वह वीभत्स हश्र..? यह थी वास्तव में जनक्रांति, जनता द्वारा तानाशाहों से छीनी गई आजादी... इसलिए भारतीय मुस्लिम बर्बर तालिबान को क्रांतिदूत बताने का पाप करके इस्लाम की शेष साख को बट्टा न लगाए तो बेहतर है...
तालिबान दुष्टता, क्रूरता और भ्रष्टता का पर्याय है... जिसमें महिला, बच्चे, बुजुर्ग व बीमार के लिए भी दुर्दांत दहशतगर्दी और खौफ ही है... बर्बर तालिबान का समर्थन करके भारतीय मुसलमान स्वयं पर ही नहीं, अपने मजहबी सरोकारों पर भी सवालिया निशान लगा रहे हैं... तालिबानी हिंसक बर्बरता पर मौन साधकर भारतीय मुसलमान स्वयं की वैश्विक सर्वस्वीकार्यता का मौका गंवाकर स्वयं को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं... संस्कृति सम्पन्न व कलापोषक अफगानिस्तान और उस पर कुंडली मारकर बैठे बर्बर तालिबान के बीच शह-मात का खेल दशकों से चल रहा है... लेकिन इस मामले में तथाकथित वैश्विक शक्तियां जिसमें ब्रिटेन, रूस, अमेरिका और अब चीन का लक्ष्य सिर्फ अपने वर्चस्व की स्थापना और सामरिक-व्यापारिक-कारोबारी स्वार्थ का संवर्धन रहा है.., तभी तो उन्होंने बारी-बारी से अपने मंसूबों की प्राप्ति के लिए अफगानिस्तान में तालिबानी कृत्यों और क्रूरता का अपने नफा-नुकसान के मान से दुरुपयोग ही तो किया है..? जिसमें अंतत: अफगानिस्तानी आवाम ही छली गई है... क्योंकि जिस रूस ने 2003 में तालिबान को आतंकवादी संगठन घोषित किया था, वही रूस अब चीन-पाक-ईरान के साथ काबुल में अपने दूतावास खोलकर एक-दूसरे का समर्थन कर रहे हैं..! दुनिया में सर्वाधिक शक्तिशाली रहे ब्रिटेन ने 19वीं सदी में अफगानिस्तान को जीतने की मंशा से पैर पसारे.., तालिबानी कृत्यों को बढ़ावा भी दिया, लेकिन अंतत: उसे उलटे पैर लौटना पड़ा था... 1979 के दौर में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया... सोवियत संघ का विध्वंस हो गया, लेकिन उसे यह बात समझने में करीब एक दशक लग गए कि वह अफगानिस्तान में युद्ध नहीं जीत पाएगा... क्योंकि तब अमेरिकी सहयोग से रूस के खिलाफ तालिबानी बर्बर कृत्यों की पराकाष्ठा पार होने लगी थी... अमेरिकी-सऊदी अरब जुगलबंदी ने आर्थिक सहयोग के द्वारा तालिबान को और बर्बर बनाया... 1996 से 2001 के बीच अफगानिस्तान में महिला-बच्चों पर क्रूरता की पराकाष्ठा पार की गई.., तभी से यह कहावत प्रचलित हुई कि तालिबानी हिंसा न करे... तालिबान ने 11 सितंबर 2001 को अमेरिका के न्यूयार्क में वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमला (9/11) करके स्वयं को विश्व चौधरी मानने वाले अमेरिका को खुली चुनौती दी थी... यह था जन्मदाता के भक्षण का प्रमाण...
अमेरिका ने अफगानिस्तान में सेना उतारी, 10,000 सैनिकों को गंवाने के बाद दोहा में 29 फरवरी 2020 को तालिबान के साथ समझौता कर 11 सितंबर 2021 तक तालिबान से वापसी की रणनीति बनाई, लेकिन तालिबानी बर्बरता ने इसके पूर्व ही अफगानिस्तान को कब्जे में लेकर लहूलुहान करने का खेल शुरू कर दिया है... क्योंकि अब अमेरिका को हतोत्साहित करने के लिए चीन-रूस ने तालिबानी संरक्षक बनने की होड़ लगा रखी है... तालिबान का अर्थ ही है 'विद्यार्थीÓ... ऐसे में पाकिस्तानी मदरसों यहां तक कि अब तो भारत के देवबंद से लेकर मदरसों, मस्जिदों, मुल्ला-मौलवियों से थोक में बर्बरता की तालिम लेकर निकल रहे लोग आईएसआई लड़ाके, मुजाहिद्दीन, लश्करे और सैकड़ों तरह के नामों से हिंसा का रक्तपाती खेल खेल रहे हैं... क्योंकि इस्लाम एकजुट कहां है..? डर-भय से बस जबरिया एकजुटता दिखाई जा रही है.., क्योंकि मुसलमान भी 72 फिरकों में जो बँटा है और एक-दूसरे के खून का प्यासा बनकर अमेरिका-चीन के चुंगल में तो कभी पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जरिए गैर मुस्लिमों का खून बहाकर अपनी हिंसक प्यास बुझाता है... तालिबानी क्रूरता की हदें पार करना ही अपना इस्लामिक धर्म मान बैठे हैं...
जब तक अमेरिका अफगानिस्तान में था, तो पाकिस्तान उसके साथ खड़ा रहा... अब अमेरिका के मैदान छोडऩे पर चीन से आर्थिक टुकड़ा पाने के लिए उसकी चिरौरी में लगा है... चीन-रूस-ईरान-जर्मनी के जरिए तालिबान को मान्यता दिलाने के 'नापाकÓ प्रयास हो रहे हैं... चीन की आर्थिक रणनीति में रोड एंड बेल्ट परियोजना को तालिबान सहयोग करेगा... वहीं एनक कॉपर माइन और अमू दरिया ऊर्जा जैसे निवेश क्षेत्र में चीन को अफगानिस्तान में तालिबान के जरिए मजबूती से कदम रखने का मौका दिख रहा है... अफगानिस्तान में प्राकृतिक संसाधनों के भंडार हैं, मेस अयनक का तांबा, कोबाल्ट, कोयला और लौह अयस्क के साथ ही तेल-गैस, कीमती पत्थर और लिथियम जो कि अफगानिस्तान को लिथियम का सऊदी अरब बना सकता है..! इन सभी पर चीन की गिद्ध निगाहें हैं... अफगान की सीमाएं पाकिस्तान, ईरान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान से लगती हैं... यानी चीन इसे भविष्य की सामरिक व भूराजनीतिक जमीन के रूप में देखता है... रूस इसलिए खुश है कि अमेरिका को मुँह की खानी पड़ी है... भारत में अफगानिस्तान से लश्कर, जैश जैसे आतंकियों की गतिविधियां तालिबानी समर्थन से बढ़ेगी... चीन का आक्रामक व्यवहार भारत के संदर्भ में चिंता बढ़ाने वाला हो सकता है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में भी तालिबान पाकिस्तान के रास्ते घुसपैठ बढ़ाएगा... इन सब स्थितियों के बीच दोराहे पर भारत का मुसलमान खड़ा है जो, यह तय नहीं कर पा रहा है कि उसका वास्तविक भला शांतिपूर्ण समृद्ध भारत में है, न कि बर्बर तालिबान में...