swadesh editorial
   Date22-Aug-2021

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ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
भा रतभूमि ही एकमात्र ऐसी पुण्यधरा है, जो हजारों वर्षों से अपने धार्मिक-सांस्कृतिक संस्कारों, अनुशासन, विज्ञान, विकास और नीति-नियमों के द्वारा समय-समय पर विश्व के मार्गदर्शन का निमित्त बनती रही है... क्योंकि इस धरा पर प्रत्येक कालखंड में अलग-अलग विधा, समृद्ध ज्ञान संपदा, अनुशासनप्रिय और संस्कारपूरित पात्रों-नायकों ने जनस्वीकारोक्ति के चरम पर पहुंचकर अपनी संस्कारधानी का न केवल अमिट परिचय दिया, बल्कि उसे चिरकाल तक स्थायी बनाए रखकर समय के मान से परिष्कृत करने वाले जीवंत व प्रेरणादायी उदाहरणों की वृहद शृंखलाओं को भी अपने पीछे छोड़ा है.., जिसमें हर आयु-वर्ग के नायक, नेतृत्वकर्ता शामिल हैं... तभी तो भारतभूमि के संदर्भ में कहा गया है कि -
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र संतति:।।
अर्थात् : समुद्र के उत्तर और हिमालय पर्वत के दक्षिण में जो देश है, उसका नाम भारत है... जहां निवास करने वाली संतति भारतीय कहलाती है...
रामायण सिर्फ धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने का सार है... या आधुनिक भाषा में कहें कि संविधान है... जो रामायण को संस्कृति संरक्षण, समाज-राष्ट्र उत्थान और नेतृत्व के अनुशासन-मर्यादा की शाश्वत प्रतिनिधि के रूप में घर-घर में संविधान की भांति पूजा, वाचा और शिरोधार्य करने की सीख देता है... दुनिया के किसी भी मनुष्य, राज्य और राष्ट्र के पास रामायण से बड़ा लिखित-अलिखित, घोषित-अघोषित कोई संविधान हो नहीं सकता... क्योंकि रामायण ही शासन से लेकर अनुशासन और संस्कारित सफल जीवन निर्वाह की सच्ची संवैधानिक कसौटी है... जब रामायण ही अपने आप में पूर्ण संविधान है, तो उसके विविध पात्रों की प्रेरणा भी किसी संवैधानिक खंड से कम नहीं है...
जब-जब 'रामायणÓ का उल्लेख होता है, तब-तब मर्यादा, अनुशासन, शील, संयम के दो प्रेरणा केन्द्रों माता सीता और प्रभु श्रीराम की छवि, सीख और कार्य हर किसी की आंखों के सामने आकार लेने लगते हैं... रामायण के 7 खंडों अर्थात् कांड को क्रमश: बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, लंका और उत्तर अर्थात् लव-कुश कांड के रूप में देखा जाता है... लव-कुश का पूरा जीवनवृत्त रामायण तक ही सीमित नहीं, बल्कि भारतवर्ष के लिए जीवंत थाती के रूप में देखा जाता है... क्योंकि किसी भी परिवार, समाज और राष्ट्र में उसके भावी भविष्य अर्थात् नौनिहालों के बाल संस्कारों की पाठशाला अथवा धर्म-कर्म क्या हो..? इसकी रामायण का उत्तरकांड अर्थात् लव-कुश का जीवनवृत्त सटीक, सुंदर और शाश्वत परिभाषा सामने रखता है... सच्चे अर्थों में हम 'राम-सियाÓ के 'लव-कुशÓ को बाल संस्कारों की प्रथम संस्कारधानी या पाठशाला पुकारे, तो अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए...
महर्षि वाल्मीकि को हम आदिकवि के रूप में पूजते हैं... उनके द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य 'रामायणÓ में प्रत्येक वृतांत, कथा का सटीक और प्रमाणिक विवरण मिलता है... फिर लव-कुश कांड के निमित्त और परिचायक तो स्वयं महर्षि वाल्मीकि ही हैं, जिन्होंने लव-कुश को प्रत्येक कला में पारंगत किया... लेकिन आधुनिक भारत में रामायण से इतर लव-कुश की वैश्विक पात्रों में चर्चा क्यों नहीं हो पाई..? इस पर चिंतन जरूरी है... क्योंकि भारत का इतिहास क्रमश: मुगलों, अंग्रेजों, ईसाई मिशनरियों, मतांतरित लोगों और विकृत मानसिकता से ग्रस्त लाल झंडाबरदार वामपंथियों ने विकृति की पराकाष्ठा पार करके लिखा... इसलिए हमारे प्रेरणा पुरुष और महानयकों के विषय में इतिहास में जानबूझकर अनेक मिथक और प्रपंचरूपी किंवदंतियां जोड़ी गईं.., ताकि हम हमारे प्रेरणा पुरुषों को लेकर असमंजस में रहे और होते भी रहे... इस भ्रमित मानसिकता से बाहर निकलने की आवश्यकता है, क्योंकि न तो रामायण और न ही उसके पात्र काल्पनिक हैं.., जैसा कि कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने देश के सर्वोच्च न्याय मंदिर में हलफनामा देकर ऐसा धत्कर्म किया था... ऐसी कुंठा से निकलकर ही हम अपने बालकों को लव-कुश जैसे प्रेरणादायी चरित्रों का अनुगामी बनाकर सशक्त समाज-राष्ट्र बना सकते हैं...
अयोध्या छोडऩे के बाद माता सीता ने वनों के बीच तमसा नदी किनारे स्थित महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में निवास किया... यहीं पर लव-कुश का जन्म हुआ था... दोनों भाइयों को विद्या अध्ययन से लेकर संपूर्ण विधाओं का ज्ञान स्वयं महर्षि वाल्मीकि ने प्रदान किया... पांच वर्ष की उम्र में लव-कुश को महर्षि वाल्मीकि ने शिक्षा देना प्रारंभ की... महर्षि के सान्निध्य में दोनों भाइयों ने धनुष विद्या में महारत प्राप्त की... वे विश्व के प्रथम योद्धा थे, जो ध्वनि की गति से धनुष चलाने में निपुण माने जाते थे... बालक होने के बावजूद दोनों भाइयों को किसी भी युद्ध में हराना संभव नहीं था... यह हमने श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के अश्व को लव-कुश द्वारा रोकने के वृतांत एवं युद्ध स्थितियों में देखा-पढ़ा है... क्योंकि स्वयं महर्षि वाल्मीकि ने लव-कुश के साथ एक मानसिक संवाद स्थापित करके उन्हें अपने संपूर्ण ज्ञान, तीरंदाजी, संगीतकला, वीणा वादन, मर्यादा और नीति-अनुशासन का रसपान कराया था...
भारतभूमि मातृ, पितृ, गुरु और समाज-राष्ट्र भक्त बालकों की धन्य धरा रही है... इतिहास में मातृ-पितृ भक्त बालक के रूप में गणेशजी प्रथम स्थान पर आते हैं... ठीक इसी तरह से राजा दशरथ, श्रवण कुमार, श्रीराम और लव-कुश ने भी मातृ-पितृ भक्ति का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया... पितृभक्त देवव्रत भीष्म कहलाए... फिर यज्ञशर्मा, वेदशर्मा की पितृभक्ति कैसे भुलाई जा सकती है... गुरुभक्त के रूप में श्रीकृष्ण-बलराम, एकलव्य से लेकर आरुणि, उपमन्यु, विवेकानंद का कोई सानी नहीं... फिर नारायण भक्ति की चरमसीमा तक पहुंचने वाले भक्त प्रहलाद, ध्रुव को तो हर किसी को याद है ही... ऐसे असंख्य स्वतंत्रता सेनानी रहे, जिन्होंने बाल्यकाल में ही मातृभूमि के लिए स्वयं को आहूत किया था... अत: लव-कुश के जीवनवृत्त को आधुनिक संदर्भों में रखकर विचार और विवेचना जरूरी है कि हमारे नौनिहाल की भक्ति-समर्पण इन कसौटियों पर कहां और कितना खरा है..?
आधुनिकता की चकाचौंध और परिवार टूटने की वीभत्स घटनाओं, गिरते मूल्यों के बीच विचार किया जाना चाहिए कि जब माता-पिता की जोडिय़ां तेजी से बिछुड़ रही हैं, तब बच्चों के सामने यह विकट प्रश्न खड़ा हो जाता है कि वे किसके पक्ष में खड़े हों..? किसके साथ जाएं..? तब हमें लव-कुश के जीवनवृत्त का विचार और कार्य प्रत्येक कालखंड में मार्ग दिखाता है... लव-कुश ने बालक होकर भी परिवार एवं माता-पिता के संबंधों को मजबूती प्रदान करने वाली कड़ी के रूप में काम किया.., क्योंकि उनमें बाल संस्कारों का बीजारोपण प्रारंभ से किया गया... तभी तो लव-कुश ने आश्रम में माता और महर्षि के साथ संवाद की मर्यादा और सीखने की ललक का निरंतर प्रदर्शन किया... बालक होने के बावजूद शत्रुघ्न से लेकर लक्ष्मण, भरत, हनुमान और स्वयं श्रीराम के साथ भी युद्ध के दौरान संवाद की मर्यादा को नहीं खोया... अयोध्या पहुंचने के बाद भी 'सिया-रामÓ के मिलन की मार्मिक प्रेरणादायी कथा के पात्र बनने में वे सफल हुए... लव-कुश का यह सर्व स्वीकार्य कृतित्व महाभारत काल से करीब 3000 वर्ष पूर्व हुआ था... लव ने बाद में उत्तर भारत में शरावती अर्थात श्रावस्ती तो कुश ने दक्षिण भारत में कुशावती में शासन किया... आज हमारे पाठ्यक्रमों में मातृभक्त-पितृभक्त समाज और राष्ट्र हितैषी बालकों के साहसिक प्रसंग एवं उनके नीति-निर्णय शामिल होना चाहिए... बाल संस्कारों का बीजारोपण करने हेतु पाठ्यक्रमों में लव-कुश के कार्य, चरित्र-अनुशासन, प्रतिबद्धता, सीखने की ललक और साहस का आधुनिक दौर के मान से विस्तारित और विश्लेषित चरित्र-चित्रण होना चाहिए, ताकि हमारी आने वाली भावी पीढ़ी के समक्ष एक अनुपम एवं प्रेरणादायी उदाहरण के रूप में हम खड़े हो सकें...