स्वाधीनता का अमृत उत्सव...
   Date15-Aug-2021

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संपादक की कलम से...
शक्तिसिंह परमार
भारत की स्वाधीनता के 75वें वर्ष के अवसर पर अगर हम समुद्र मंथन की भांति 14 रत्नों की प्राप्ति हेतु देश के इस अमृत महोत्सव का आत्ममंथन करें तो ऐसे अनेक विषय सामने आते हैं...जिन पर सरकार व समाज ने आजादी के बाद लगातार प्रयास किए हैं और आगे भी करते रहेंगे तो परिणाम सकारात्मक और शत-प्रतिशत प्राप्त होंगे...आज विदेश नीति के फलक पर भारतीय नेतृत्व दुनिया के सामने अपनी बात आंखों में आंखें डालकर कहने की स्थिति में है...वैश्विक मंचों पर भारत दमदारी से अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक चिंताओं को रेखांकित करने में सफल हो रहा है...
हिन्दुस्थान एक शाश्वत राष्ट्र के रूप में सदैव प्रखर और प्रेरणादायी रहा है..,अत: भारत राष्ट्र की आयु गणना अलग-अलग पड़ाव व कालखंडों के मान से इतिहास के पन्नों में अंकित भी है...विश्व मानचित्र पर अनेक देशों का समय के साथ उद्भव, विकास और विध्वंस हुआ है..,लेकिन भारत का सूर्योमय तेज सदैव प्रदीप्तमान रहा..,क्योंकि भारत एक पौराणिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल के रूप में अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रहा...शक, हुण-दल, पठान, मुगल, पुर्तगाली से लेकर अंग्रेजों के साथ सदियों से संघर्ष के बावजूद अपनी अमिट शाश्वत पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने में यह भारत भूमि सफल हुई है..,तो इसके पीछे इसके सेवकों, उपासकों, नेतृत्वकर्ताओं और वीर प्रसूता जन्मभूमि के लिए हंसते-हंसते प्राणों को न्योछावर करने वाली वह असंख्य हुतात्माओं की जयमाला है..,जो भारत की जय में ही स्वयं की जय स्वीकारता रहा है...अत: संवैधानिक और लोकतांत्रिक दृष्टि से हिन्दुस्थान में जब बात निकलेगी तो भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति का कालखंड जरूर याद किया जाएगा...राष्ट्र पर्व स्वाधीनता दिवस पर भारत अपनी आजादी के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है...किसी भी राष्ट्र की उम्र के मान से 75 वर्षों का कालखंड बहुत बड़ी समयसीमा नहीं है..,लेकिन इस स्वाधीनता को प्राप्त करने और इसे बनाए रखने..,इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए हमने समय-समय पर कितने आंतरिक व बाह्य विकट संकटों और झंझावतों का सामना किया है..? किसी से छुपा नहीं है..,तभी तो भारत की एकता-अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हम राष्ट्रोत्सव पर अपने वीर शहीदों, स्वतंत्रता आंदोलन की कोटि-कोटि उन असंख्य अनाम हुतात्माओं का स्मरण करते हैं...उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं, जिनके प्राण-प्रण, संकल्प एवं जिन्होंने जीवन दांव पर लगाकर कठोर, बर्बर पीड़ा-प्रताडऩा को आत्मसात करके भी भारत माता के भाल पर स्वाभिमान की बिंदी लगाना ही अपना सच्चा राष्ट्रधर्म समझा...उन्होंने भारत को किसी भूमि के भू-भाग अथवा विविधतापूर्ण टुकड़ों के स्थल के रूप में नहीं देखा..,बल्कि जन्मभूमि माँ के रूप में किसी 'राष्ट्र देवताÓ की भांति पूजा और आराध्य माना...तभी तो आज भारत स्वाधीनता के 75 वर्षों के इतिहास पर गर्वित मुस्कान का अधिकारी है..,क्योंकि बच्चे, युवा, जवान, प्रौढ़, बुजुर्ग, बेटी, बहू और माँ सभी ने स्वतंत्रता आंदोलन के उस बर्बरतापूर्ण कालखंड में अपना सर्वस्व न्योछावर कर चरमोत्कर्ष राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया है...उसी का सुफल था कि जिस गोरी सत्ता के विषय में यह कहा जाता था कि उसकी सत्ता का कभी सूर्यास्त नहीं होता..,उन्हीं अंग्रेजों को 15 अगस्त 1947 को भारत से रुखसत होना पड़ा था...यह है भारतीयों की राष्ट्रभक्ति, जो देश को राष्ट्र देवता के रूप में प्रतिस्थापित करती है... हिन्दू सिर्फ धर्म नहीं..,यह जीवन पद्धति है...तभी तो हिन्दुओं की परिवार संकल्पना सीमित नहीं है...हम, हमारा गांव, हमारा परिवार, हमारा राष्ट्र, हमारी भूमि माता, ऐसी इसकी व्याप्ति बढ़ती रहती है...वलयांकित, विस्तृत और वृहद होने वाले वर्तुल के जैसे हम पूरे विश्व को परिवार मानते हैं..,तभी तो हमारा 'वसुधैव कुटुम्बकम्Ó का विचार भाव विश्व को एकसूत्र में जोडऩे का निमित्त था, है और रहेगा...कहा भी गया है कि-
अयं निज: परोवेति गणना लघु चेतसाम्।
उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
अर्थात्- छोटी सोच वाले गणना करते हैं कि- यह मेरा है और यह पराया है..,जबकि उदार चरित्र के लोग संपूर्ण विश्व को अपना कुटुम्ब मानते हैं...ऐसा विचार केवल हिन्दू ही कर सकता है...सबको साथ लेकर चलने वाला हिन्दुत्व का यही भाव तो हमारी स्वाधीनता को अक्षुण्ण बनाए रखकर निरंतर संवर्धित भी कर रहा है...धर्म-अधर्म और नीति-अनीति के लिए महाभारत युद्ध के अनुशासन पर्व से लेकर वाण एवं शांति पर्व में भी 'मंदार पर्वतÓ का उल्लेख मिलता है...चीर और चांदन नदी के मध्य स्थित 'मंदार पर्वतÓ का विष्णु पुराण में वर्णन कुछ इस प्रकार मिलता है-
चीर चांदनयौमध्येमंदारो नाम पर्वत:।
तस्यारोहनमात्रेणनरोनारायणोभवेत्।।
विष्णु पुराण के अनुसार समुद्र मंथन के समय 'मंदार पर्वतÓ का प्रयोग मथनी के रूप में हुआ था...समुद्र मंथन के पश्चात 14 रत्नों के रूप में कामधेनु, ऐरावत हाथी, कौस्तुभमणि, उच्चै:श्रवा घोड़ा, वारूणी कन्या, रंभा अप्सरा, लक्ष्मी, परिजात वृक्ष, मदिरा, कल्पद्रुम, चंद्रमा, अमृत, विष और शंख प्राप्त हुए थे...हम आजादी के 75वें वर्ष में हीरक कालखंड के मान से 15 अगस्त 2022 तक 'अमृत महोत्सवÓ मनाने जा रहे हैं...75 वर्षों में हमने क्या-क्या पाया..? क्या खोया..? और भविष्य की क्या संभावनाएं और चुनौतियां हैं..? आजादी प्राप्ति के बाद इस आजादी को सुरक्षित रखने के लिए क्या-क्या प्रयास किए..? आंदोलन चलाए...? कैसी पीड़ाएं भोगी..? और किस तरह से स्वाधीनता आंदोलन के वीरों का मान बनाए रखने, उनके सपनों को साकार करने के लिए कैसा संघर्ष किया...उसका सिंहावलोकन ही हमें अपनी आजादी को अजर-अमर बनाए रखने का प्रेरणा मार्ग बनेगा...क्योंकि भारत भूमि देवभूमि के रूप में विख्यात है...इसके धर्म-संस्कृति और मूल्य विश्व को जोडऩे के निमित्त हैं...जिसका प्रकटभाव विश्व के लिए सुख-शांति का रहा है...वही भूमि पुन: गुरु के रूप में विश्व को मार्ग दिखाने को तैयार है..! भारत की अस्मिता को बनाए रखने के लिए 21 अप्रैल 1526 को पानीपत का प्रथम भीषण युद्ध हो अथवा 23 जून 1757 में प्लासी का पहला संग्राम या हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप की हुंकार...1857 के स्वातंत्र्य समर से लेकर 1920 का असहयोग आंदोलन, 1930 का महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा (दांडी मार्च) आंदोलन और 1942 में असंख्य क्रांतिकारियों के साथ संपूर्ण भारतीयों का 'भारत छोड़ो आंदोलनÓ...हर दौर में पग-पग पर संघर्षों से भारतीयों सूरवीरों का सामना हुआ...उनसे पार पाकर ही हम आज आजादी का 75वां वर्ष मना रहे हैं...आजादी मिली..,लेकिन उसे खंडित रूप में स्वीकारना उस समय के नेतृत्व की मजबूरी रही होगी...क्योंकि संघर्ष तो सैकड़ों वर्षों तक पूर्ण और अखंड आजादी के लिए ही किया था...क्या पता था कि 15 अगस्त 1947 को लालकिले की प्राचीर से प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू तिरंगा लहराकर जब नियति से सामना वाला संबोधन कर रहे होंगे...उसी दौर में भारत-पाक विभाजन की विभीषिका स्वतंत्रता आंदोलन के बराबर जिंदगियां लील लेगी..! अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद देश में छोटी-बड़ी 580 रियासतों का एकीकरण भी किसी स्वतंत्रता आंदोलन से कम नहीं था...याद करें भोपाल रियासत ने 26 अगस्त 1947 को भारत में विलय की घोषणा कर दी..,लेकिन जिन्ना के करीबी रहे नवाब ने करीब 2 साल बाद 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का भारत में विलय किया...तब कहीं जाकर भोपाल में तिरंगा लहराया...सोचें इतने विलंब के पीछे कितने घातक मंसूबे थे..? हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खाँ ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय को मंजूरी दी..,लेकिन लंबे टालमटोल के बाद 17 सितंबर 1948 को लौहपुरुष सरदार पटेल ने आत्मसमर्पण करवाकर विलय में सफलता पाई...जम्मू-कश्मीर विलय का खेल भी लंबा चला...जूनागढ़ रियासत जनमत संग्रह के द्वारा 9 नवंबर 1949 को भारत का हिस्सा बनी...रा.स्व. संघ के प्रयासों से गोवा मुक्ति आंदोलन को भी कोई कैसे भूल सकता है..? यानी भारत को आजादी प्राप्ति के बाद अपने ही घर में राष्ट्रीय अखंडता के लिए भ्रमित अपनों से लोहा लेना पड़ा...भारत से इतर किसी स्वतंत्र राष्ट्र के सामने इस तरह की विकट स्थितियां शायद ही खड़ी हुई होंगी..? 1025 ईसवी में महमूद गजनवी ने हिन्दू धर्म-संस्कृति की अस्मिता पर चोट करते हुए सोमनाथ मंदिर में पहली बार विध्वंस मचाया और भारी लूटपाट की...यह घृणित खेल आततायियों द्वारा लंबे समय तक रह-रहकर खेला गया...लेकिन देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल ने 1951 में सोमनाथ के जीर्णोद्धार का संकल्प लिया..,1 दिसंबर 1955 को प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने नवनिर्मित सोमनाथ मंदिर को राष्ट्र को समर्पित किया...क्या यह इतना आसान था..? श्रीराम जन्मभूमि पर 500 वर्षों तक चले संघर्षों के बाद अंतत: लोकतांत्रिक व संवैधानिक नियमों के अंतर्गत 5 अगस्त 2020 को जन्मभूमि पर श्री रामलला के भव्य मंदिर निर्माण की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नींव रखी...क्या जन्मभूमि को बंधनों से मुक्ति की यह सफलता सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सूर्योदय जैसी नहीं है..? भारत ने आजादी मिलते ही चीन के साथ कड़ा संघर्ष किया और कर रहा है...हिन्दी-चीनी भाई-भाई के धोखे के चलते चीन से 1962 में तो पाकिस्तान से 1948 में अघोषित और फिर 1965, 1971 और 1999 में घोषित रूप से युद्ध लड़ा और जीता...फिर आएदिन की आतंकवादी दहशतगर्दी हो या फिर सिलसिलेवार बम विस्फोटों से देश का सीना छलनी करने वाले कृत्य, हर स्थिति का सामना करके भारत आज विश्व के सामने खड़ा है...मोपला का नरसंहार हो या दिल्ली के सिख दंगे हो या फिर गोधरा में रामभक्तों का सामूहिक नरसंहार अथवा असम के कोकराझार की हिंसा...ऑपरेशन ब्लूस्टॉर का घटनाक्रम हो या फिर आपातकाल का वह स्याह कालखंड..,हरित क्रांति से लेकर श्वेत क्रांति में भारत ने विश्व को चकित करके दिखाया...1974 में पहला परमाणु परीक्षण या 1975 में पहले अंतरिक्ष उपग्रह की सफलता...चंद्रयान से लेकर मंगलयान तक का सफर और सेना को स्वदेशी सामरिक हथियारों से लैस करने की क्रांतिकारी पहल...हर क्षेत्र में भारत नए आयाम गढ़ता रहा है...इतना सबकुछ होने के बावजूद देश में रह-रहकर राष्ट्रघाती तत्वों के खेल भी प्रपंच रूप में जारी रहे...उसका सामना भी भारत ने करके दिखाया...2014 में 3 दशक बाद स्पष्ट बहुमत वाली कोई गैर कांग्रेसी सरकार सत्तारूढ़ हुई...तीन तलाक के खात्मे से लेकर 18 हजार गांवों में पहली बार बिजली पहुंचना किसी सरकार की जनसरोकार नीति-नीयत पर मुहर है...जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370, 35 ए जैसे बेजा प्रावधानों से 5 अगस्त 2019 को मुक्ति दिलाने का साहसिक कदम भी मोदी सरकार ने उठाया...8 करोड़ से अधिक गरीब महिलाओं को नि:शुल्क रसोई गैस उपलब्ध कराना हो या फिर देश और सरकार के खिलाफ जनता को भड़काने-बरगलाने वाली टुकड़े-टुकड़े गैंग के मंसूबों को विफल करने की रणनीति... कहते का तात्पर्य यही है कि ७४ वर्षों से एक साथ भारत कई मोर्चों पर लोहा लेता रहा है...
भारत की स्वाधीनता के 75वें वर्ष के अवसर पर अगर हम समुद्र मंथन की भांति 14 रत्नों की प्राप्ति हेतु देश के इस अमृत महोत्सव का आत्ममंथन करें तो ऐसे अनेक विषय सामने आते हैं...जिन पर सरकार व समाज ने आजादी के बाद लगातार प्रयास किए हैं और आगे भी करते रहेंगे तो परिणाम सकारात्मक और शत-प्रतिशत प्राप्त होंगे...आज विदेश नीति के फलक पर भारतीय नेतृत्व दुनिया के सामने अपनी बात आंखों में आंखें डालकर कहने की स्थिति में है...वैश्विक मंचों पर भारत दमदारी से अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक चिंताओं को रेखांकित करने में सफल हो रहा है...सीमा सुरक्षा को लेकर भारत-बांग्लादेश के बीच बागड़ लगाना हो या पाकिस्तान की घुसपैठ पर नकेल कसना...चीन को उसी की शैली में जवाब देकर सीमा पर पस्त करने में सफल होना भारत के नए साहसी अवतार का प्रमाण है...सांस्कृतिक और राष्ट्रनिष्ठ मूल्यों के पुनर्निर्माण में नए तरह के सकारात्मक बदलावों की झलक दिख रही है...आजाद भारत में लंबे समय तक हिन्दुओं को दोयम दर्जे का मानकर चलाए गए तुष्टिकरण के मकडज़ाल को तोड़कर 'सबका साथ-सबका विकास और सबका विश्वासÓ का भाव मजबूत करने में सफलता मिली है...शिक्षा किसी भी राष्ट्र के मजबूत निर्माण का आधार है..,इस दिशा में 30 वर्षों बाद आई नई शिक्षा नीति ने भारत को वैश्विक मंच पर लाकर खड़ा करने का खाका खींचा है...कोरोना की विभीषिका झेल रहे विश्व के सामने भारत ने इतनी बड़ी आबादी के बावजूद महामारी नियंत्रण और प्रबंधन की सफलता का उदाहरण प्रस्तुत किया है...दुनिया में सबसे पहले नि:शुल्क टीका पहुंचाकर भारत ने अपनी सर्वे भवन्तु सुखिन: संस्कृति का दर्शन कराया...वैश्विक मंदी और बेरोजगारी के बावजूद भारत ने आर्थिक फलक पर विकसित देशों के साथ व्यापार-कारोबार का नया आयाम तय किया है...खेल में तमाम तरह के बदलावों से ही हम वैश्विक मंच पर नया करने में सफल हो रहे हैं...अंतरिक्ष और विज्ञान के साथ ही सेना की सामरिक दक्षता का नया इतिहास रचा जा रहा है...किसान, गरीब और वंचितों के लिए अंत्योदय के साथ ही समृद्धि की पहल हो रही है...नवाचार का ही यह प्रमाण है कि अब फिल्मी या खेल हस्तियों के बजाय जमीन पर काम करने वाले लोग पद्म पुरस्कारों के लिए खोजे जा रहे हैं...यह सब 75 वर्षों की यात्रा का सार है..,लेकिन अभी भी करने के लिए बहुत कुछ है... कोरोनाकाल में नया भारत दवा-ऑक्सीजन के अभाव में असंख्य जिंदगियों को दम तोड़ते देखने को विवश रहा है...जहरीली शराब प्रत्येक राज्य में दर्जनों जिंदगियां आए दिन लील रही है...जातिवाद का विषघड़ा छलकने लगा है...फिर संसद से जातियों के आरक्षण का संवैधानिक संबल कितना उचित है..? मंदिरों की संपत्तियों पर प्रशासन की कुंडली उचित है..? तो मदरसों-वक्फ बोर्ड और चर्च की संपत्तियों पर सरकारी निगरानी तंत्र बैठाने से कौन रोक रहा है..? जब सबकुछ निजी हाथों में सौंपना राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुकी है..,तब भारी बहुमत से चुनी गई सरकार क्या राजनीतिक प्रबंधन की ही भूमिका निभाती नजर आएगी..? समान नागरिक संहिता लागू करने और बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या के नियंत्रण संबंधी कदम उठाना भी चुनौती से कम नहीं है... संसद को अपराधियों से मुक्त करने, भूखे पेट को भोजन, खेल संस्थानों में पारदर्शिता, किसानों और कृषि की समृद्धि, झोपडिय़ों की जगह पक्के मकान, पानी व शौचालय, महंगाई-गरीबी-बेरोजगारी, सबका साथ और सामाजिक सद्भाव जैसे विषयों पर नीति-नियंताओं को और तेजी से संकल्प के साथ आगे बढऩा होगा..,ताकि भारत की आजादी के 75वें वर्ष का यह राष्ट्रीय उत्सव वास्तव में आने वाली शताब्दी (स्वाधीनता के 100वें वर्ष) के सपनों को साकार करने की मजबूत नींव बन सके...प्रत्येक राष्ट्रवासी आजादी के 75वें वर्ष की इस राष्ट्रोत्सव मंथन बेला में अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के लिए भी समर्पित भाव से तटस्थ-मूकदर्शक नहीं जवाबदेह बनना होगा...क्योंकि राष्ट्रकवि दिनकरजी ने लिखा है-
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध।
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।।
इसी आशा और विश्वास के साथ राष्ट्रवासियों को
स्वाधीनता दिवस के 75वें वर्ष में 'अमृत महोत्सवÓ
बेला की हार्दिक बधाई..,शुभकामनाएं....