मंत्रिमंडल विस्तार में संतुलन...
   Date09-Jul-2021

vishesh lekh_1  
अंतत: जिस बात का इंतजार था, वह उम्मीद के अनुरूप और उससे भी बढ़कर सामने आया... केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार की दूसरी पारी का यह पहला मंत्रिमंडल विस्तार एवं पुनर्गठन सही मायने में प्रत्येक दिशा में संतुलन साधने के सफल प्रयास के रूप में देखा जा सकता है... क्योंकि मंत्रिमंडल में कुछ पद खाली तो थे, लेकिन इससे भी बढ़कर जरूरी यह था कि इन दो वर्षों में अपने मंत्रालयों में मंत्रियों ने कामकाज का कैसा प्रदर्शन किया..? इसको भी नापने का जरिया मंत्रिमंडल विस्तार के साथ नरेन्द्र मोदी, अमित शाह व जेपी नड्डा की इस त्रिमूर्ति ने बड़े ही रणनीतिक तरीके एवं चतुराई के साथ करके दिखाया... तभी तो एक दर्जन मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर करना कोई आसान बात नहीं थी... लेकिन काम का प्रदर्शन और भविष्य की राजनीति का जो समीकरण केन्द्र से लेकर राज्यों तक में चुनाव के मान से आकार लेगा, उसको ध्यान में रखकर मंत्रियों से इस्तीफे लेने में मोदी सरकार सफल रही... यह इतना त्वरित हुआ कि आंख बंद और खोलने की गति के मान से इस्तीफे सामने आए... जबकि किसी ने अनुमान भी नहीं लगाया था कि विस्तार के लिए इतनी संख्या में मंत्रियों की छुट्टी की जा सकती थी..? अब अगर मंत्रिमंडल पुनर्गठन में 15 केन्द्रीय मंत्री, 28 राज्यमंत्री यानी 43 नए चेहरों द्वारा शपथ लेने के बाद सरकार में कुल मंत्रियों की संख्या 77 हो गई है... इसमें इस बात की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है कि युवा तुर्क नेताओं को प्राथमिकता देने के साथ ही अनुभवशील सांसदों को भी मंत्री पद की महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी दी गई है... सबसे बड़ी कि मंत्रिमंडल में पहली बार 11 महिलाओं यानी मातृशक्ति को ही पर्याप्त स्थान देने की पहल हुई है... अगर मंत्रालयों के दायित्व निर्वाह आवंटन को सामने रखें तो युवा प्रतिभा और अनुभवी लोगों के साथ ही मातृशक्ति पर भरोसे की वह पहल नजर आती है, जिसमें एक सुव्यवस्थित सरकार संचालन की जिम्मेदारी का भाव देखा जा सकता है... आज की तारीख में 50 साल से कम उम्र के 14 मंत्रियों को जिम्मेदारी दी गई है... जिनमें भी 6 को केन्द्रीय मंत्री का दर्जा दिया गया है... अनुभव की बात करें तो 46 ऐसे मंत्री हैं, जो पहले भी केन्द्र में जिम्मेदारी निभा चुके हैं... 23 मंत्री ऐसे हैं, जिन्होंने 3 बार सांसद रहते हुए 10 साल तक का संसदीय कामकाज का अनुभव प्रत्यक्ष रूप से लिया है... कुल मिलाकर कह सकते हैं कि सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार, पुनर्गठन एवं विभागों के बंटवारे में जो संतुलन साधा है, वह राजनीतिक सफलता की कुंजी के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें विकास और समन्वय सर्वोपरि है...
दृष्टिकोण
नियमों का उल्लंघन और सख्ती...
कोरोना महामारी की दूसरी लहर अपने अंतिम पड़ाव पर है, लेकिन इस बीच जो भयावह डर तीसरी लहर का सता रहा है, उसको लेकर केन्द्र व राज्य सरकार के साथ क्या आम जनता भी निपटने की तैयारी में नजर आती है..? क्योंकि जो स्थितियां लगातार निर्मित हो रही हैं, वह देश के 175 से अधिक जिलों में कोरोना के नए अल्फा, बीटा, गामा और डेल्टा वैरिएंट की मौजूदगी सामने आ रही है, वह चिंता बढ़ा रही है... क्योंकि अगर इस स्थिति में जनता ने कोविड-19 के प्रोटोकॉल का अक्षरश: पालन नहीं किया तो स्थिति पुन: हाथ से निकलते देर नहीं लगेगी... तभी तो केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को मंगलवार को पुन: सार्वजनिक रूप से देशवासियों को संबोधित करते हुए कहना पड़ा है कि पर्यटन स्थलों पर उमड़ रही भीड़ वास्तव में कोविड-19 के प्रोटोकॉल का खुला उल्लंघन कर रही है... अगर नियमों के पालन को इसी तरह से ठेंगा दिखाया गया तो सरकार पुन: सख्ती लागू कर सकती है... चिंता की बात इसलिए भी है कि गुरुवार को एक बार पुन: देश में कोरोना के सक्रिय मामले की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है... तभी तो मध्यप्रदेश में बाजारों के लिए अतिरिक्त छूट देने की पहल को राज्य सरकार ने वापस ले लिया... महाराष्ट्र से आने-जाने वाली बसों पर प्रतिबंध आगामी आदेश तक बढ़ा दिया है... कुल मिलाकर कह सकते हैं कि अभी बरसात पूरी तरह से सक्रिय रूप में नजर नहीं आ रही है... उसी का लाभ लेकर लोग घूमने के लिए पर्यटन स्थलों पर तेजी से उमड़ रहे हैं... लेकिन वहां बिना मास्क के बेतरतीब भीड़ नजर आ रही है... ये सारे दृश्य बेचैनी बढ़ाते हैं... तभी तो उत्तराखंड सरकार ने कावड़ यात्रा पर इस बार प्रतिबंध लगा दिया है, जबकि उप्र में 25 जुलाई से कावड़ यात्रा प्रारंभ होगी.. लेकिन इन सब बातों के साथ लोगों की जागरुकता और कोरोना से बचाव के प्रयासों को अमल में लाना जरूरी है..